राजनीति/ पंजाब | ABC NATIONAL NEWS | चंडीगढ़ | 17 जून 2026
पंजाब विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस ने राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और आम आदमी पार्टी (AAP) को सीधी चुनौती देने की तैयारी तेज कर दी है। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में कांग्रेस अब संगठनात्मक मजबूती, सामाजिक समीकरणों और नेतृत्व की एकजुटता पर विशेष ध्यान दे रही है। पार्टी का मानना है कि यदि वह अपने अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित कर लेती है और जनता के मुद्दों पर आक्रामक तरीके से अभियान चलाती है, तो आगामी चुनाव में सत्ता में वापसी की मजबूत दावेदार बन सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब कांग्रेस लगातार गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष की समस्या से जूझती रही है। कभी मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद सामने आया तो कभी वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए। इन परिस्थितियों का राजनीतिक लाभ आम आदमी पार्टी को मिला, जिसने 2022 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया। अब कांग्रेस नेतृत्व इस स्थिति को बदलने के लिए नई रणनीति पर काम कर रहा है।
इसी वर्ष फरवरी में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पंजाब दौरे के दौरान प्रदेश नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दिया था कि पार्टी के सभी नेताओं को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एक टीम की तरह काम करना होगा। राहुल गांधी का यह संदेश ऐसे समय आया था जब पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने पार्टी में दलित समुदाय के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए थे। चन्नी का कहना था कि पंजाब की राजनीति में दलित समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद कांग्रेस संगठन और नेतृत्व में उसे पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। इस बयान ने पार्टी के भीतर मौजूद मतभेदों को एक बार फिर सार्वजनिक कर दिया था।
कांग्रेस नेतृत्व अब इस बात को समझ चुका है कि यदि उसे पंजाब में AAP के खिलाफ प्रभावी चुनौती पेश करनी है तो पहले संगठन को एकजुट करना होगा। इसी उद्देश्य से लगातार बैठकें आयोजित की जा रही हैं, जिनमें संगठनात्मक ढांचे, चुनावी रणनीति और नेतृत्व के सवालों पर चर्चा हो रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपने और जिला स्तर तक संगठन को सक्रिय बनाने की योजना तैयार की जा रही है।
पार्टी की रणनीति केवल संगठन तक सीमित नहीं है। कांग्रेस पंजाब के किसानों, मजदूरों, दलितों, युवाओं और शहरी मध्यम वर्ग को फिर से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। राज्य में बेरोजगारी, कृषि संकट, नशे की समस्या और उद्योगों के पलायन जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मानना है कि इन मुद्दों पर जनता के बीच असंतोष मौजूद है और यदि उसे सही तरीके से राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए तो कांग्रेस को उसका लाभ मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की राजनीति में अब मुकाबला धीरे-धीरे दो प्रमुख दलों के बीच सिमटता दिखाई दे रहा है। शिरोमणि अकाली दल पिछले कुछ वर्षों में अपना पुराना जनाधार खो चुका है, जबकि बीजेपी अभी भी राज्य में स्वतंत्र रूप से मजबूत राजनीतिक ताकत बनने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में कांग्रेस खुद को AAP के सबसे बड़े विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।
हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पार्टी को केवल AAP की सरकार का मुकाबला ही नहीं करना है, बल्कि अपने अंदर मौजूद गुटों को भी साथ लेकर चलना है। पंजाब कांग्रेस में कई बड़े नेता हैं जिनकी अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। यदि पार्टी इन नेताओं के बीच संतुलन बनाने में सफल नहीं होती तो चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
AAP सरकार भी अपने शासनकाल की उपलब्धियों को जनता के सामने रखकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल सरकार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे जनता के सामने एक विश्वसनीय विकल्प और स्पष्ट विजन भी प्रस्तुत करना होगा।
आने वाले महीनों में कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव, नई नियुक्तियां और जनसंपर्क अभियान देखने को मिल सकते हैं। पार्टी नेतृत्व का लक्ष्य है कि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा की जाए और बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया जाए।
पंजाब की राजनीति फिलहाल एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है, जबकि AAP सत्ता बचाने की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं बल्कि पंजाब की राजनीति की नई दिशा तय करने वाला चुनाव साबित हो सकता है।



