[the_ad id="179"]
Home » National » वंदे मातरम् पर कांग्रेस-NC में फिर टकराव: मुद्दा सिर्फ गीत का नहीं, कश्मीर में ‘बड़ा भाई’ कौन?

वंदे मातरम् पर कांग्रेस-NC में फिर टकराव: मुद्दा सिर्फ गीत का नहीं, कश्मीर में ‘बड़ा भाई’ कौन?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | जम्मू-कश्मीर | 11 सितंबर 2026

जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद अब गठबंधन की पुरानी खींचतान तक पहुंच गया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला श्रीनगर में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान वंदे मातरम् के पूरे संस्करण के समय खड़े रहे। इसके बाद कांग्रेस ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् की पहली दो पंक्तियों तक सीमित रहने की 1937 की नीति के पीछे आजादी के आंदोलन की बहुलता और सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की सोच थी। यानी विवाद अब सिर्फ यह नहीं रह गया कि गीत के दौरान कौन खड़ा हुआ—असल सवाल यह है कि जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और NC के गठबंधन की दिशा कौन तय करेगा?

NC बोली—सरकार अपना काम कर रही है

नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने कोई राजनीतिक फैसला नहीं लिया, बल्कि केंद्र की व्यवस्था के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाई है। पार्टी के प्रवक्ता तनवीर सादिक ने कहा कि संसद से कानून बनने के बाद वंदे मातरम् गाना और उसके दौरान खड़ा होना सरकारी कार्यक्रमों में कानूनी जिम्मेदारी है। उमर अब्दुल्ला ने भी विवाद को बेवजह राजनीतिक रंग देने पर सवाल उठाया और कहा कि यह व्यवस्था सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश पर लागू होती है। यानी NC का संदेश साफ है—सरकारी कार्यक्रम में सरकार वही करेगी जो कानून और तय व्यवस्था कहती है।

कांग्रेस का सवाल—गठबंधन में हमारी बात कहां?

कांग्रेस की परेशानी सिर्फ वंदे मातरम् तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी का कहना है कि गीत के पूरे संस्करण को लेकर उसका एक पुराना राजनीतिक और ऐतिहासिक रुख है। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कहा कि पूरा संस्करण आजादी के आंदोलन के नेताओं की बहुलतावादी सोच से मेल नहीं खाता। यही बात NC के लिए स्वीकार करना आसान नहीं है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में पार्टी अपनी अलग पहचान और अपने फैसलों की स्वतंत्रता को बेहद महत्वपूर्ण मानती है। इसलिए इस विवाद ने गठबंधन के भीतर एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है—क्या कांग्रेस पूरे देश की अपनी राजनीतिक लाइन जम्मू-कश्मीर में भी लागू कर सकती है?

1987 की पुरानी यादें क्यों लौट आईं?

NC और कांग्रेस का रिश्ता नया नहीं है। दोनों दलों ने कई बार साथ काम किया है, लेकिन इनके बीच भरोसे और राजनीतिक नियंत्रण का सवाल भी पुराना है। 1984 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार गिरने और कांग्रेस के समर्थन से नई सरकार बनने की घटना ने NC की राजनीति पर गहरा असर छोड़ा। इसके बाद 1986 में राजीव गांधी और फारूक अब्दुल्ला के बीच समझौता हुआ और 1987 में दोनों दल विधानसभा चुनाव साथ लड़े। उस चुनाव के बाद धांधली के आरोप लगे और चुनावी राजनीति से लोगों के मोहभंग को जम्मू-कश्मीर में आगे की राजनीतिक उथल-पुथल से जोड़कर देखा गया। इसलिए NC के लिए कांग्रेस के साथ रिश्ता सिर्फ चुनावी गणित नहीं है—उसके पीछे कई दशक की राजनीतिक यादें भी हैं।

आज भी दोनों पार्टियों के रास्ते अलग-अलग

2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में NC और कांग्रेस गठबंधन ने बहुमत का आंकड़ा पार किया। NC को 42 सीटें, कांग्रेस को 6 सीटें और सीपीआई(एम) को एक सीट मिली। लेकिन सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने उमर अब्दुल्ला की सरकार में शामिल होने के बजाय बाहर से समर्थन दिया। स्टेटहुड, अनुच्छेद 370 और दिल्ली के साथ रिश्तों जैसे मुद्दों पर भी दोनों दलों की प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देता रहा है। 2025 में स्टेटहुड को लेकर कांग्रेस ने अलग से आंदोलन शुरू किया तो NC ने इस पर नाराजगी जताई। राज्यसभा की सीटों को लेकर भी दोनों दलों में मतभेद सामने आए और आखिरकार भाजपा ने एक सीट जीत ली।

गठबंधन बचा रहेगा, लेकिन सवाल बड़ा है

वंदे मातरम् विवाद शायद अकेले कांग्रेस-NC गठबंधन को तोड़ने वाला मुद्दा न बने, लेकिन यह उस पुराने तनाव को जरूर सामने ले आया है जिसमें कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति और NC की जम्मू-कश्मीर केंद्रित राजनीति आमने-सामने आती रही है। कांग्रेस पूरे देश में अपनी राजनीतिक पहचान और नीतियों को लेकर चलती है, जबकि NC के लिए जम्मू-कश्मीर की पहचान, स्वायत्तता, स्टेटहुड और दिल्ली के साथ संबंध ज्यादा संवेदनशील मुद्दे हैं।

इसलिए असली सवाल वंदे मातरम् से भी बड़ा है—क्या कांग्रेस जम्मू-कश्मीर में अपने सहयोगी से अपनी राजनीतिक लाइन पर चलने की उम्मीद करेगी, या NC अपनी अलग राजनीतिक पहचान और फैसलों की स्वतंत्रता बनाए रखेगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या 1987 की राजनीतिक यादों से निकलकर दोनों पार्टियां आज के गठबंधन को चला पाएंगी, या हर नया विवाद पुराने अविश्वास को फिर जिंदा करता रहेगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *