क्राइम | ABC NATIONAL NEWS | गाजियाबाद/नई दिल्ली | 25 अप्रैल 2026
गाजियाबाद में हुए जानलेवा हमले के बाद सामने आया सलीम वास्तिक का मामला अब सिर्फ एक हमले की कहानी नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे शख्स का पूरा काला इतिहास बनकर सामने आ रहा है, जो सालों तक अपनी असली पहचान छिपाकर लोगों के बीच घूमता रहा। जांच में सामने आ रही जानकारियों के मुताबिक, सलीम वास्तिक वही व्यक्ति बताया जा रहा है, जिसका नाम 1995 में एक मासूम बच्चे के अपहरण और हत्या जैसे जघन्य अपराध से जुड़ा था। अदालत से सजा मिलने के बाद भी वह जमानत पर बाहर आकर फरार हो गया और फिर उसने अपनी जिंदगी को एक नए चेहरे के साथ जीना शुरू कर दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि फरारी के बाद सलीम ने सिर्फ अपना ठिकाना ही नहीं बदला, बल्कि अपनी पहचान, पेशा और सार्वजनिक छवि भी पूरी तरह बदल ली। कभी मार्शल आर्ट ट्रेनर रहा यह शख्स बाद में मौलवी बन गया और फिर सोशल मीडिया के जरिए खुद को चर्चा में लाने लगा। आरोप है कि उसने जानबूझकर विवादित और भड़काऊ वीडियो बनाकर लोगों के बीच एक नई पहचान बनाने की कोशिश की, ताकि उसका पुराना अपराध दबा रहे और कोई उसके असली चेहरे तक न पहुंच पाए।
सूत्रों के मुताबिक, सलीम के वीडियो और बयान लगातार विवादों में रहते थे। वह अलग-अलग मुद्दों पर तीखे और उकसाने वाले बयान देता था, जिससे वह सुर्खियों में बना रहे। कुछ लोगों का मानना है कि यह सब सिर्फ लोकप्रियता पाने के लिए नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी—ताकि उसका पुराना किडनैपिंग और हत्या का मामला लोगों की नजरों से दूर हो जाए।
लेकिन हालात तब बदल गए, जब उस पर अचानक जानलेवा हमला हुआ। इस हमले ने जैसे उसकी पूरी कहानी पलट दी। अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे सलीम की पहचान की जांच शुरू हुई और यहीं से उसका पुराना रिकॉर्ड सामने आने लगा। पुलिस ने पुष्टि के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया और अब वह फिर से उसी अपराध के लिए कानून के शिकंजे में है, जिससे बचने के लिए वह सालों तक छुपता रहा।
यह मामला कई बड़े सवाल खड़े करता है—क्या कोई व्यक्ति सिर्फ छवि बदलकर इतने लंबे समय तक कानून से बच सकता है? क्या सोशल मीडिया का इस्तेमाल सच छिपाने के लिए किया जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या सिस्टम की कमजोरी ने एक आरोपी को दशकों तक खुले में रहने का मौका दिया?
सलीम वास्तिक फिर से जेल में है और कानून अपना काम कर रहा है। लेकिन उसकी कहानी यह साफ बताती है कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, एक दिन सच सामने आ ही जाता है—और तब न नई पहचान काम आती है, न कोई बनाई गई छवि।




