Home » Crime » विचारधारा की आड़ में छिपा था मासूम का हत्यारा! 31 साल तक ‘एक्स-मुस्लिम’ का चोला ओढ़कर नफरत परोसने वाले सलीम वास्तिक का खुला काला कच्चा चिट्ठा

विचारधारा की आड़ में छिपा था मासूम का हत्यारा! 31 साल तक ‘एक्स-मुस्लिम’ का चोला ओढ़कर नफरत परोसने वाले सलीम वास्तिक का खुला काला कच्चा चिट्ठा

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अपराध / दिल्ली NCR | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अप्रैल 2026

कानून के हाथ लंबे होते हैं, यह कहावत सलीम वास्तिक के मामले में पत्थर की लकीर साबित हुई है। 31 साल पहले एक 13 साल के मासूम बच्चे की किडनैपिंग और फिर जान लेने वाला यह खूंखार दरिंदा महज एक फरार अपराधी नहीं था, एक बेहद शातिर दिमाग षड्यंत्रकारी था। 1995 में अपहरण और हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने के बाद जब साल 2000 में इसे जमानत मिली, तो इसने न सिर्फ अपनी जगह बदली, बल्कि अपनी पूरी शख्सियत का कायाकल्प कर लिया। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जब इसे गाजियाबाद के लोनी से दबोचा, तो उस ‘वैचारिक नकाब’ के परखच्चे उड़ गए जिसे पहनकर यह सालों से समाज के बीच जहर घोल रहा था। यह गिरफ्तारी उस सिस्टम की जीत है जिसे सलीम अपनी चालाकी से ठेंगा दिखा रहा था।

सलीम वास्तिक की सबसे बड़ी साजिश उसकी वह ‘फेक आइडेंटिटी’ थी, जिसे उसने बहुत सोच-समझकर तैयार किया था। उसने भांप लिया था कि मौजूदा दौर में अगर वह खुद को कट्टर इस्लाम विरोधी और ‘एक्स-मुस्लिम’ के तौर पर पेश करेगा, तो उसे एक खास किस्म का सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण मिल सकता है। उसने सोशल मीडिया को हथियार बनाया और इस्लाम व मुसलमानों के खिलाफ लगातार भड़काऊ और झूठी निंदा शुरू कर दी। उसका मकसद साफ था—हिंदू-मुस्लिमों को आपस में लड़वाना और समाज में ऐसी नफरत फैलाना कि उसकी विवादित छवि ही उसका सुरक्षा कवच बन जाए। वह खुद को एक ‘सुधारक’ और ‘विचारक’ के रूप में पेश कर रहा था, जबकि हकीकत में वह एक मासूम के खून के दाग धोने की नाकाम कोशिश कर रहा था।

हैरानी की बात यह है कि सलीम को यह गुमान हो गया था कि बीजेपी सरकार के दौर में उसकी इस ‘नई छवि’ के कारण कोई उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं करेगा। वह खुलकर वीडियो बनाता था, सार्वजनिक तौर पर जहरीली बयानबाजी करता था और खुद को कानून से ऊपर समझने लगा था। उसने सोचा था कि अगर वह हिंदू-मुस्लिम विमर्श को भड़काएगा, तो उसे ‘सिस्टम का चहेता’ मान लिया जाएगा और 1995 के उस खौफनाक गुनाह की फाइलें कभी दोबारा नहीं खुलेंगी। लेकिन वह यह भूल गया कि एक कातिल की कोई विचारधारा नहीं होती और कानून की नजर में वह सिर्फ एक भगोड़ा अपराधी था। उसकी यह राजनीतिक ढाल बनाने की कोशिश तब ध्वस्त हो गई जब पुलिस ने उसके डिजिटल साक्ष्यों और पुराने आपराधिक रिकॉर्ड का मिलान कर उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया।

यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए कड़ा संदेश है जो अपराध की दुनिया से निकलकर सोशल मीडिया पर ‘वैचारिक लबादा’ ओढ़ लेते हैं। 31 साल तक एक परिवार न्याय के लिए तरसता रहा, जबकि यह कातिल अपनी पहचान बदलकर सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरता रहा। मासूम बच्चे के अपहरण और फिरौती न मिलने पर उसकी हत्या करने वाले इस शख्स ने जिस तरह से धर्म और राजनीति का इस्तेमाल खुद को बचाने के लिए किया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। अब जबकि वह तिहाड़ की दीवारों के पीछे है, उम्मीद है कि अदालत इस ‘भेड़ की खाल में छिपे भेड़िए’ को ऐसी सजा सुनाएगी कि समाज में नफरत फैलाने और कानून के साथ खिलवाड़ करने वाले हर अपराधी की रूह कांप जाए।

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