ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। असहमति देशद्रोह नहीं है। सरकार से जवाब मांगना किसी प्रतिबंधित विचारधारा का समर्थन नहीं है। लेकिन आज बहस जिस दिशा में जाती दिखाई दे रही है, वह चिंता पैदा करती है। सुप्रीम कोर्ट में वंदे मातरम् से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान “नक्सलाइट” शब्द पर विवाद हुआ और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने इस शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। इससे पहले 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “दिमागी नक्सल” शब्द का इस्तेमाल करते हुए ऐसे लोगों को “पहचानने और अलग-थलग करने” की बात कही थी, जिन्हें उन्होंने नक्सली मानसिकता वाला बताया।
और बात यहीं खत्म नहीं हुई। 5 सितंबर को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में प्रधानमंत्री ने लाल किले के अपने उसी बयान को फिर उठाया। उन्होंने “दिमागी नक्सल” को “होम्योपैथी की गोली” बताते हुए कहा कि जैसे होम्योपैथी में इलाज शुरू होने पर बीमारी पहले बढ़ती हुई दिखाई देती है, वैसे ही उनके इस बयान के बाद “दिमागी नक्सल” एक-एक करके सामने आने लगे और जनता उनके “असली रंग” देख रही है।
यहीं से असली बहस शुरू होती है। क्या किसी प्रधानमंत्री की आलोचना करने वाले, सरकार के फैसले पर सवाल उठाने वाले या किसी कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले व्यक्ति को विचारधारा के किसी कठोर लेबल में रख देना लोकतांत्रिक बहस का स्वस्थ तरीका है? सरकार के पास अपने फैसलों का बचाव करने के लिए कानून है, तर्क है, संसद है, अदालत है और जनता के सामने अपना पक्ष रखने के तमाम मंच हैं। फिर असहमति का जवाब व्यक्ति की पहचान पर हमला करके क्यों दिया जाए?
सुप्रीम कोर्ट की बहस में यही सवाल और तीखा हो गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानून बनाने की प्रक्रिया पर बहस के दौरान “नक्सलाइट” शब्द का संदर्भ दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि कानून अधिकारी को ऐसी अभिव्यक्ति वापस लेनी चाहिए। बहस के दौरान संजय हेगड़े ने भी कहा कि अपने मन से सोचना नक्सलाइट होना नहीं है। अदालत ने बहस में बढ़ती गर्मी और भावनात्मकता को लेकर हस्तक्षेप किया।
अब जरा इस पूरे घटनाक्रम को एक साथ रखिए। एक तरफ लाल किले से “दिमागी नक्सल” की भाषा आती है। फिर उसी शब्द को कुछ सप्ताह बाद प्रधानमंत्री “होम्योपैथी की गोली” बताते हैं और कहते हैं कि इसके असर से लोग सामने आ रहे हैं। फिर अदालत में कानून और संवैधानिक सवालों पर बहस के बीच “नक्सलाइट” शब्द आ जाता है। क्या यह महज संयोग है, या यह हमारी सार्वजनिक बहस में असहमति को देखने के बदलते तरीके का संकेत है? इस सवाल का जवाब सत्ता और विपक्ष दोनों को देना चाहिए।
क्योंकि शब्दों का महत्व होता है। प्रधानमंत्री के शब्द सामान्य राजनीतिक बयान नहीं होते। उन्हें देशभर में करोड़ों लोग सुनते हैं। लाल किला केवल एक राजनीतिक मंच नहीं है; वह देश के स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मंच है। वहां से जब किसी समूह या विचारधारा को “पहचानने” और “अलग-थलग करने” की बात कही जाती है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि उस परिभाषा का दायरा क्या है और उसे तय कौन करेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से दिए गए राजनीतिक स्पष्टीकरण में कहा गया था कि यह टिप्पणी विपक्षी नेताओं के लिए नहीं, बल्कि माओवादी विचारधारा के समर्थकों और संविधान में विश्वास न रखने वालों के संदर्भ में थी।
लेकिन लोकतंत्र में समस्या तब पैदा होती है जब “विचारधारा” और “असहमति” के बीच की रेखा धुंधली होने लगे। कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना कर सकता है और फिर भी संविधान में पूरा विश्वास रख सकता है। कोई कानून की आलोचना कर सकता है और फिर भी देश के कानून का सम्मान कर सकता है। कोई अदालत में सरकार के फैसले को चुनौती दे सकता है और फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हो सकता है।
भारत का संविधान सरकार को सवालों से ऊपर नहीं रखता। बल्कि संवैधानिक व्यवस्था की खूबसूरती ही यही है कि सत्ता के फैसले भी अदालत में चुनौती दिए जा सकते हैं। संसद में बहस हो सकती है। मीडिया सवाल पूछ सकता है। नागरिक विरोध कर सकता है। वकील कानून की वैधता पर सवाल उठा सकता है। यही लोकतंत्र है।
और इसलिए सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं है जब कोई सरकार की आलोचना करता है। सबसे खतरनाक स्थिति तब होगी जब सवाल पूछने से पहले नागरिक यह सोचना शुरू कर दे कि कहीं उसे “नक्सल”, “देशद्रोही” या किसी और खांचे में न डाल दिया जाए।
यहां सरकार के समर्थकों का पक्ष भी समझना जरूरी है। BJP और सरकार की ओर से लगातार यह कहा गया है कि “दिमागी नक्सल” का इस्तेमाल माओवादी या नक्सली विचारधारा के समर्थकों के लिए किया गया था, न कि हर विपक्षी या आलोचक के लिए। प्रधानमंत्री के 15 अगस्त के भाषण में भी नक्सलवाद और माओवाद से जुड़ी हिंसा और उसके प्रभाव का संदर्भ था। इसलिए हर आलोचक को स्वतः इस शब्द का निशाना बताना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन सवाल फिर भी बचता है—क्या सरकार के सबसे ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति को सार्वजनिक बहस में ऐसे लेबल इस्तेमाल करने चाहिए, जिनका असर उनके मूल राजनीतिक संदर्भ से कहीं आगे जा सकता है? यही वह सवाल है जिस पर गंभीर लोकतांत्रिक बहस होनी चाहिए।
क्योंकि सत्ता स्थायी नहीं होती। आज सत्ता में जो लोग हैं, कल विपक्ष में हो सकते हैं। आज जिन पर लेबल लगाया जा रहा है, कल वही सवाल सत्ता के सामने खड़े हो सकते हैं। और इतिहास में हर सरकार से बड़ा संविधान रहा है। हर नेता से बड़ा लोकतंत्र रहा है।
इसलिए सवाल किसी एक नेता का नहीं है। सवाल भाषा का भी है, लोकतांत्रिक संस्कृति का भी है और उस भारत का भी है जहां नागरिक को सरकार से असहमति रखने का अधिकार है। अगर सवाल का जवाब तर्क से दिया जा सकता है तो लेबल की जरूरत क्यों पड़े? अगर आलोचना गलत है तो तथ्य सामने रखिए। अगर आरोप झूठा है तो दस्तावेज सामने रखिए। अगर कानून सही है तो संविधान और कानून की धाराएं सामने रखिए। लेकिन सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देना बहस को कमजोर करता है।
लोकतंत्र में सबसे मजबूत जवाब वह नहीं होता जो विरोधी को चुप करा दे। सबसे मजबूत जवाब वह होता है जो विरोधी के सवाल का तथ्य और तर्क के साथ उत्तर दे। “दिमागी नक्सल”, “नक्सलाइट” जैसे शब्द किसी व्यक्ति की बात का उत्तर नहीं हैं। वे अधिकतम एक राजनीतिक लेबल हो सकते हैं। असली जवाब तब होगा जब सवाल का जवाब दिया जाएगा। क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक का दिमाग बंद कराने के लिए कोई “होम्योपैथी की गोली” नहीं होती—वह सवाल करता है, बहस करता है और अपने अधिकार के साथ खड़ा रहता है।



