ओपिनियन | राजनीति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026
एक साल पहले राहुल गांधी ने जो सवाल उठाया था, उसे राजनीतिक हमला बताया गया। BJP ने तीखी प्रतिक्रिया दी और चुनाव आयोग ने उनके आरोपों को चुनौती देते हुए शपथपत्र और संबंधित मतदाताओं की जानकारी मांगी। लेकिन राहुल गांधी अपने आरोप पर कायम रहे। 8 अगस्त 2025 को बेंगलुरु की “वोट अधिकार रैली” में उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग अगर पिछले 10 साल की इलेक्ट्रॉनिक मतदाता सूचियां और चुनाव से जुड़ी वीडियोग्राफी उपलब्ध करा दे, तो वे अपने “वोट चोरी” के आरोप को साबित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर पूरा इलेक्ट्रॉनिक डेटा मिल जाए तो वह यह साबित कर देंगे कि नरेंद्र मोदी वोट चोरी के जरिए प्रधानमंत्री बने।
तब राहुल गांधी के इस बयान पर BJP और चुनाव आयोग की तरफ से सवाल उठे। चुनाव आयोग ने उनसे अपने आरोपों को शपथपत्र के साथ रखने और संबंधित मतदाताओं की जानकारी देने को कहा। BJP ने भी उनके दावों को खारिज किया। यानी उस समय पूरा विवाद राहुल गांधी के आरोप बनाम चुनाव आयोग और BJP के जवाब के रूप में सामने आया। लेकिन अब कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि चुनावी व्यवस्था पर सवाल सिर्फ बाहर से नहीं आ रहे। अब चुनाव आयोग के भीतर से ही सवालों का रिकॉर्ड सामने आया है।
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की जांच के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें 4 आपत्तियां एक ही दिन दर्ज होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR की प्रक्रिया से जुड़ी थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” तक बताया।
यहीं राहुल गांधी के पुराने सवाल को फिर से पढ़ने की जरूरत पड़ती है। राहुल कह रहे थे—“डेटा दो।” उनका तर्क था कि चुनावी डेटा सामने आएगा तो मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की जांच की जा सकेगी। आज द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया है कि चुनाव आयोग के 3 सदस्यीय ढांचे के 2 आयुक्तों ने खुद कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित सवाल उठाए। यानी राहुल गांधी के 2025 के हर आरोप को ये 14 आपत्तियां अपने आप साबित नहीं करतीं, लेकिन मतदाता डेटा, चुनावी प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर उन्होंने राहुल के पुराने सवाल को जरूर एक नया और गंभीर संदर्भ दे दिया है।
सबसे बड़ा सवाल Form 6 पर उठा। नए मतदाता के पंजीकरण के इस फॉर्म में जुलाई में ऐसा सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक से उसके, उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछली SIR मतदाता सूची में नाम होने के बारे में जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन जरूरी है। संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। बाद में संधू ने 13 अगस्त को इस बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की।
अब सवाल सीधा है—अगर आयोग के 3 में से 2 आयुक्त किसी बदलाव को नियमों के खिलाफ बता रहे थे, तो वह बदलाव हुआ कैसे? किसने फैसला लिया? किस स्तर पर मंजूरी हुई? उन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई? क्या उनका जवाब रिकॉर्ड में है? और अगर जवाब है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाना चाहिए? मतदाता सूची किसी पार्टी, नेता या अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं है। यह उस नागरिक की सूची है जिसके आधार पर उसका मतदान का अधिकार लागू होता है।
मामला Form 6 तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के “क्रमिक केंद्रीयकरण” पर चिंता जताई। सवाल यह था कि जिन राज्य और स्थानीय अधिकारियों के पास मतदाता सूची संभालने की वैधानिक जिम्मेदारी है, उनकी डिजिटल पहुंच कहीं सीमित तो नहीं की जा रही। दोनों आयुक्तों ने चुनावी IT व्यवस्था और मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण को लेकर कैबिनेट सचिव तक पत्राचार किया। यानी सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कागज पर नाम कौन जोड़ रहा है। सवाल यह है कि डिजिटल सिस्टम के भीतर असली नियंत्रण किसके हाथ में है।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला इस सवाल को और गंभीर बनाता है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय ERO ने 97 मतदाताओं को दस्तावेजों के आधार पर सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया, लेकिन पहले हटाए गए नामों को बहाल करने की सॉफ्टवेयर सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस सुविधा को सक्रिय करने के लिए कई बार पत्र लिखे। सवाल सिर्फ 97 लोगों का नहीं है। सवाल यह है कि अगर कानून के तहत फैसला लेने वाला अधिकारी किसी नागरिक को योग्य मानता है, तो क्या डिजिटल सिस्टम उस फैसले को रोक सकता है?
यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी का “डेटा दो” वाला सवाल और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। मतदाता सूची कोई साधारण सरकारी डेटाबेस नहीं है। उसमें किसी नागरिक का नाम होना उसके मतदान के अधिकार का आधार है। अगर नाम गलत तरीके से हट गया, अगर पात्र व्यक्ति का नाम तकनीकी वजह से नहीं जुड़ा, या अगर स्थानीय अधिकारी और केंद्रीय सिस्टम के बीच फैसला अटक गया, तो प्रभावित होने वाला सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है—एक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है।
पश्चिम बंगाल में भी SIR से जुड़े नाम जोड़ने और हटाने के बाद की अपील प्रक्रिया पर सवाल दर्ज किए गए। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, संधू ने पूछा कि कुछ अपीलों को किसने अधिकृत किया और इस प्रक्रिया की जानकारी आयोग के सभी सदस्यों को किस स्तर पर थी। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
अब यहां ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत रूप से किसी चुनावी गड़बड़ी के दोषी साबित हो चुके हैं। ऐसा निष्कर्ष स्वतंत्र जांच या न्यायिक निर्णय के बिना नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यह तथ्य जरूर सार्वजनिक रिकॉर्ड में आया है कि उनके नेतृत्व वाले 3 सदस्यीय आयोग के 2 आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं और रिपोर्ट के अनुसार कई फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया बताया। इन आपत्तियों का जवाब देना अब केवल राजनीतिक मांग नहीं, सार्वजनिक पारदर्शिता का सवाल है।
सरकार की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 2023 के कानून के तहत बनी चयन व्यवस्था से हुई है, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। ज्ञानेश कुमार की मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति पर राहुल गांधी ने फरवरी 2025 में असहमति दर्ज की थी। अब आयोग के भीतर सामने आई 14 आपत्तियों के बाद चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी निर्णय प्रक्रिया को लेकर पहले से चली आ रही राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।
लेकिन चुनाव आयोग का जवाब भी सामने है। आयोग ने 23 सितंबर को कहा कि किसी बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार, SIR सहित उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और उसके आधिकारिक आदेश कानून के अनुरूप हैं। आयोग ने यह भी कहा कि कुछ आंतरिक टिप्पणियों को अलग से देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
लेकिन यहीं सबसे असहज सवाल खड़ा होता है—अगर 14 आपत्तियां सामान्य संस्थागत चर्चा थीं, तो उनमें “अनधिकृत” और “अवैध” जैसे शब्द क्यों आए? अगर अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए, तो उन आपत्तियों के बाद क्या सुधार किए गए? अगर सब कुछ कानून के अनुसार हुआ, तो उन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने में समस्या क्या है? देश को यह जानने का अधिकार है कि उसके वोट से जुड़ी व्यवस्था के भीतर आखिर हुआ क्या था।
और यही वह जगह है जहां राहुल गांधी के पुराने बयान को सिर्फ राजनीतिक नारे के रूप में खारिज करके आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। 2025 में उन्होंने डेटा मांगा था। चुनाव आयोग ने उनके आरोपों को चुनौती दी थी। BJP ने भी सवाल उठाए थे। आज 2026 में चुनाव आयोग के भीतर से 2 आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां सामने आई हैं। यह राहुल गांधी के हर आरोप को अपने आप सिद्ध नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि मतदाता डेटा और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवाल को अब सिर्फ एक राजनीतिक भाषण कहकर टाला नहीं जा सकता।
अब असली सवाल “राहुल गांधी बनाम BJP” का भी नहीं है। सवाल है—जनता के वोट की निगरानी करने वाली संस्था खुद कितनी पारदर्शी है? अगर आयोग के भीतर 2 सदस्य बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे हैं, अगर Form 6 में बदलाव को लेकर “अनधिकृत” और “अवैध” शब्द रिकॉर्ड में आते हैं, अगर मतदाता डेटाबेस के केंद्रीयकरण पर सवाल उठते हैं और अगर सॉफ्टवेयर की वजह से पात्र मतदाताओं के नाम दर्ज नहीं हो पाते, तो इन सभी सवालों का एक-एक जवाब जनता के सामने आना चाहिए।
राहुल गांधी ने कहा था—“डेटा दो, हम साबित कर देंगे।” तब उनसे सबूत मांगा गया। आज चुनाव आयोग के भीतर से ही 14 आपत्तियों का रिकॉर्ड सामने है। यह अभी वोट चोरी का न्यायिक प्रमाण नहीं है, लेकिन यह उस पारदर्शिता की मांग को और मजबूत करता है जिसे राहुल गांधी लगातार उठाते रहे हैं। अब राजनीतिक बयान बहुत हो चुके। ज्ञानेश कुमार हों, आयोग हो या सरकार—सबसे सीधा रास्ता एक ही है: पूरा रिकॉर्ड सामने रखिए, डेटा सार्वजनिक कीजिए, 14 आपत्तियों का जवाब दीजिए और देश को खुद तय करने दीजिए कि चुनावी व्यवस्था में क्या हुआ। क्योंकि लोकतंत्र में वोट जनता का है—और जनता को अपने वोट की पूरी कहानी जानने का अधिकार भी है।



