राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 मई 2026
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान तीखा माहौल देखने को मिला, जब Justice Surya Kant ने एक एनजीओ की जनहित याचिका (PIL) पर सख्त सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान उन्होंने सीधे पूछा, “आपने यह याचिका क्यों दायर की? क्या पूरे देश के पुजारी आप ही हैं? इससे आपको क्या हासिल होगा?” इस टिप्पणी के साथ अदालत ने याचिकाकर्ता की मंशा और भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है, जिस पर पहले सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आ चुका है। अब इस मुद्दे पर दोबारा सुनवाई करते हुए संविधान पीठ ने यह जानना चाहा कि Indian Young Lawyers Association ने 2006 में यह याचिका किस आधार पर दायर की थी और इस धार्मिक मामले में उसकी क्या सीधी भागीदारी है।
सुनवाई के दौरान अन्य जजों ने भी कड़ी टिप्पणियां कीं। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि कोई भी संस्था आस्था का दावा कैसे कर सकती है, क्योंकि आस्था व्यक्ति की होती है, संस्था की नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग किसी देवता में विश्वास नहीं रखते, वे धार्मिक नियमों को चुनौती कैसे दे सकते हैं।
अदालत ने यह भी पूछा कि क्या एनजीओ ने याचिका दायर करने से पहले कोई आधिकारिक प्रस्ताव पारित किया था। जब वकील इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे सके, तो पीठ ने इसे कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की ओर इशारा माना। एक जज ने तो यहां तक कह दिया कि “यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि केवल अखबार में छपे लेखों के आधार पर जनहित याचिका दायर करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह की याचिकाओं से न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है और गंभीर मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है।
इस दौरान अदालत ने साफ संकेत दिया कि जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल सोच-समझकर और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की इन सख्त टिप्पणियों ने न सिर्फ इस मामले को नई दिशा दी है, बल्कि भविष्य में पीआईएल दाखिल करने की प्रक्रिया और मंशा पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।




