अंतरराष्ट्रीय/ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 31 जुलाई 2026
जनता का बदलता मूड सबसे बड़ा संकेत
दुनिया के इतिहास में कई युद्ध ऐसे हुए हैं जिन्हें शुरू तो सरकारों ने किया, लेकिन खत्म जनता की राय ने कराया। आज अमेरिका में ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध को लेकर कुछ ऐसा ही माहौल बनता दिखाई दे रहा है। ताजा AP-NORC सर्वे के अनुसार लगभग दो-तिहाई अमेरिकी नागरिक मानते हैं कि यह युद्ध अब सार्थक नहीं रहा। यह आंकड़ा केवल एक सर्वे का परिणाम नहीं है, बल्कि यह बताता है कि अमेरिका की आम जनता लगातार बढ़ते युद्ध, उसके खर्च और उसके परिणामों को लेकर चिंतित है। लोकतांत्रिक देशों में जनता की राय केवल चुनावों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वही सरकार की नीतियों की दिशा भी तय करती है। जब लोग यह महसूस करने लगें कि युद्ध से उन्हें सुरक्षा से ज्यादा आर्थिक और सामाजिक नुकसान हो रहा है, तब सबसे शक्तिशाली सरकारों को भी अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ता है।
युद्ध की असली कीमत बंदूक नहीं, जनता चुकाती है
युद्ध की सबसे बड़ी कीमत कभी केवल सैनिक नहीं चुकाते, बल्कि पूरा देश चुकाता है। अमेरिका ने पिछले पांच महीनों में ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान पर अब तक लगभग 37.5 अरब डॉलर खर्च कर दिए हैं। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपये के बराबर बैठती है। इसके अलावा अमेरिकी प्रशासन ने कांग्रेस से लगभग 87.6 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि की मांग भी की है ताकि युद्ध जारी रखा जा सके, हथियारों का नया भंडार तैयार हो और सेना की तैनाती जारी रहे। यदि इन सभी खर्चों को जोड़ दिया जाए तो यह राशि कई देशों के पूरे साल के बजट से भी अधिक हो जाती है। यह पैसा आखिरकार अमेरिकी करदाताओं की जेब से ही जाता है। यही कारण है कि आज अमेरिका में लोग यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या यह पैसा स्कूलों, अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवाओं, सड़कों और रोजगार पर खर्च नहीं किया जाना चाहिए था?
हर मिसाइल के साथ बढ़ता जा रहा है आर्थिक बोझ
आधुनिक युद्ध अब पहले की तरह केवल गोलियों से नहीं लड़े जाते। एक मिसाइल दागने की कीमत लाखों डॉलर होती है, जबकि उसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली रक्षा प्रणाली उससे भी कई गुना महंगी होती है। ईरान द्वारा छोड़े गए ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए अमेरिका लगातार पैट्रियट और THAAD जैसी अत्याधुनिक इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है। एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत कई मिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। यानी कई बार कुछ हजार डॉलर के ड्रोन को रोकने के लिए लाखों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा विमानवाहक पोत, लड़ाकू विमान, ईंधन, सैनिकों की तैनाती, खुफिया अभियान और समुद्री सुरक्षा पर हर दिन अरबों रुपये के बराबर खर्च हो रहा है। अगर युद्ध इसी तरह लंबा चलता रहा तो इसकी कुल लागत आने वाले महीनों में कई सौ अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।
युद्ध अब केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहा
शुरुआत में यह संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान के बीच था, लेकिन अब इसकी आग पूरे पश्चिम एशिया में फैलती दिखाई दे रही है। जॉर्डन, कुवैत और मिस्र तक हमलों की खबरें सामने आ चुकी हैं। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लगातार बढ़ रहा है। समुद्री जहाजों के लिए बीमा महंगा हो गया है। तेल और गैस की आपूर्ति पर खतरा बढ़ गया है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अपने जहाजों का रास्ता बदलने को मजबूर हैं। यहां तक कि एनबीए जैसे बड़े खेल आयोजनों को भी सुरक्षा कारणों से अपने कार्यक्रम बदलने पड़े हैं। इसका असर केवल अमेरिका या ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा क्योंकि तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी महंगाई को बढ़ा सकती है।
इतिहास बताता है कि लंबे युद्ध कभी आसान नहीं होते
अमेरिका पहले भी वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्ध लड़ चुका है। शुरुआत में हर युद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर शुरू हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ जनता ने सवाल पूछने शुरू कर दिए। हजारों सैनिकों की जान गई, लाखों करोड़ डॉलर खर्च हुए और अंत में अमेरिका को बातचीत और वापसी का रास्ता अपनाना पड़ा। आज ईरान युद्ध को देखकर कई विशेषज्ञों को वही इतिहास दोहराता हुआ दिखाई दे रहा है। सैन्य ताकत किसी देश को युद्ध शुरू करने की क्षमता दे सकती है, लेकिन लंबे समय तक युद्ध चलाने के लिए जनता का समर्थन सबसे जरूरी होता है। जब वही समर्थन कम होने लगे, तब केवल हथियारों के दम पर युद्ध नहीं जीते जा सकते।
क्या अब बातचीत ही एकमात्र रास्ता है?
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अगला हमला कौन करेगा। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया एक और लंबे युद्ध का बोझ उठा सकती है? हर नए हमले के साथ दोनों देशों का आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है, आम नागरिकों की परेशानियां बढ़ रही हैं और पूरी दुनिया की चिंता भी बढ़ती जा रही है। यदि जल्द बातचीत शुरू नहीं हुई तो यह संघर्ष केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी लंबे समय तक प्रभावित करेगा।
जनता की आवाज़ को सुनना ही सबसे बड़ी ताकत
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति हो सकता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता और उसका लोकतंत्र है। यदि वही जनता अब यह कह रही है कि यह युद्ध सार्थक नहीं है, तो यह केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। इतिहास बताता है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे सम्मानजनक तरीके से समाप्त करना ही असली नेतृत्व की पहचान होती है। शायद यही वह समय है जब मिसाइलों की आवाज़ से अधिक महत्व बातचीत की मेज पर रखे जाने वाले पहले प्रस्ताव को दिया जाना चाहिए। क्योंकि अंततः किसी भी युद्ध की सबसे बड़ी जीत शांति ही होती है।




