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27 वोट का अंतर, 25,061 वोटरों की डिलीशन—क्या ये जनता का जनादेश है या सिस्टम का मैनेजमेंट?

सरोज सिंह। पटना 16 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव के सबसे चौंकाने वाले परिणामों में से एक राधा चरण शाह (JDU) और दीपू सिंह (RJD) के बीच की टक्कर रही। आंकड़े बताते हैं कि JDU के राधा चरण शाह को 80,598 वोट मिले, जबकि RJD के दीपू सिंह को 80,571 वोट। अंतर? सिर्फ 27 वोट। एक छोटा-सा गांव भी 27 वोटों में नहीं निपटता, लेकिन यहाँ पूरी विधानसभा सीट का फैसला हो गया। यह लोकतंत्र की खूबसूरती भी हो सकती थी—अगर इसके पीछे सब कुछ निष्पक्ष होता। लेकिन असली कहानी तो अभी शुरू होती है।

कहानी इतनी सीधी नहीं है कि दो उम्मीदवारों के बीच 27 वोटों का संघर्ष हुआ और किसी एक ने संयोगवश जीत दर्ज कर ली। असली घटनाक्रम तो वह है जिसे जानकर लोकतंत्र में यकीन रखने वाले हर नागरिक को झकझोर देना चाहिए। चुनाव आयोग ने इस सीट से 25,061 वोटरों को SIR प्रक्रिया के नाम पर डिलीट कर दिया। जी हाँ! पच्चीस हजार से ज्यादा मतदाता—मानो पूरी की पूरी एक छोटी सिटी—याददाश्त से मिटा दी गई। न सूचना, न जांच, न कोई पारदर्शी प्रक्रिया। एक क्लिक में 25 हजार से अधिक वोटर गायब, और उसका प्रभाव? 27 वोट का नतीजा। क्या इसे संयोग कहा जाएगा या किसी बड़े हिसाब-किताब का हिस्सा?

अब सोचिए, एक तरफ परिणाम का अंतर सिर्फ 27 वोट, और दूसरी तरफ डिलीट किए गए वोटरों की संख्या 25,061। यह अंतर नहीं, बल्कि चुनावी गणित का वह “मैनेजमेंट” है जो लोकतंत्र की रीढ़ पर रोज़ाना चोट करता है। इसमें जीतता कौन है—उम्मीदवार या सिस्टम? और हारता कौन है—पार्टी या जनता? यह तो वही जानते हैं जो राज खोलना नहीं चाहते। लेकिन सवाल जनता का है—जब मतदाता ही अदृश्य कर दिए जाएं, तो फिर परिणाम किसका होता है? जनता का या मशीन का?

बिहार की यह सीट सिर्फ एक उदाहरण नहीं है, बल्कि पूरे देश में चुनावी प्रक्रिया में हो रहे एक खतरनाक बदलाव का प्रतीक बन चुकी है। जब वोटर लिस्ट कैंची से काटी जाए, जब बूथों पर नाम गायब मिले, जब परिवार का एक सदस्य वोट डाल दे और दूसरे का नाम अचानक “डिलीटेड” दिख जाए, जब हजारों लोगों को यह तक न बताया जाए कि वे मतदाता सूची में हैं भी या नहीं—तो ऐसे चुनावों को किस आत्मविश्वास से “जनादेश” कहा जा सकता है? लोकतंत्र में मतदाता की जगह सबसे ऊपर होनी चाहिए, लेकिन आज वह सूची से बाहर खड़ा अपना नाम ढूँढ रहा है।

चुनाव का अर्थ होता है जनता का फैसला, लेकिन अब धीरे-धीरे यह “कैल्कुलेटेड रिजल्ट” जैसा दिखाई देने लगा है। जीत-हार अब न जनता तय कर रही है, न जनता का वोट। फैसला कहीं और हो रहा है, और जनता को सिर्फ परिणाम पढ़कर मान जाना पड़ रहा है। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक क्रम नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मैनेजमेंट मॉडल है जिसमें मशीनें, डेटा और लिस्टें ज्यादा निर्णायक हैं—जनता कम।

अगर लोकतंत्र को बचाना है, तो इन सचाइयों पर बात करनी ही होगी। क्योंकि जब वोटर गायब होता है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। और जब लोकतंत्र कमजोर होता है, तो देश भी कमजोर हो जाता है। आज जरूरत है कि इस सवाल को जोर से उठाया जाए—27 वोट का परिणाम और 25,061 वोटों की डिलीशन—क्या यह जनता का verdict है या सिस्टम का script? सच बोलना पड़ेगा, वरना कल को शायद नाम वोटर लिस्ट से नहीं, लोकतंत्र की किताब से भी डिलीट कर दिया जाए।

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