गुजरात/ बाल पोषण | ABC NATIONAL NEWS | वडोदरा | 24 सितंबर 2026
गुजरात के वडोदरा से बच्चों के पोषण से जुड़ी एक गंभीर खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वडोदरा नगर निगम के 400 आंगनवाड़ी केंद्रों में करीब 5,500 बच्चों को एक सप्ताह से रोज मिलने वाला दूध नहीं मिल रहा है। अमूल की ओर से आंगनवाड़ियों को दूध के पाउच की आपूर्ति 17 सितंबर से रोक दिए जाने की बात सामने आई है।
मामला भुगतान को लेकर पैदा हुए विवाद से जुड़ा बताया जा रहा है। अमूल ब्रांड का संचालन करने वाली गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन वडोदरा की आंगनवाड़ियों को दूध उपलब्ध कराती है। रिपोर्ट के अनुसार, भुगतान से जुड़े मुद्दे के कारण दूध की आपूर्ति रोक दी गई, जिससे आंगनवाड़ी केंद्रों पर आने वाले हजारों बच्चों को रोज मिलने वाला दूध बंद हो गया।
इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज (ICDS) की जिला कार्यक्रम अधिकारी हिरल ठकोर ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि दूध की कीमत बढ़ने के कारण अमूल के साथ उपलब्ध क्रेडिट सीमा खत्म हो गई थी। उनके अनुसार, अमूल के समन्वयकों की ओर से बिल जमा करने में देरी हुई, जिसके चलते ICDS के पास भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा।
यानी एक तरफ बच्चों के लिए दूध की नियमित आपूर्ति की योजना चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ बिल, भुगतान और क्रेडिट सीमा के बीच पैदा हुई प्रशासनिक समस्या का सीधा असर बच्चों पर पड़ा। जिन 400 आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों को रोज दूध मिलना था, वहां अब एक सप्ताह से यह आपूर्ति बंद है।
यह दूध दूध संजीवनी योजना के तहत उपलब्ध कराया जाता है। अमूल के एक अधिकारी ने बताया कि सहकारी संस्था इस योजना के तहत अलग-अलग स्थानीय निकायों को दूध की आपूर्ति करती है। ऐसे में भुगतान से जुड़ी किसी भी देरी का असर सीधे उन आंगनवाड़ी केंद्रों तक पहुंच सकता है जहां बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था की जाती है।
वडोदरा नगर निगम की ओर से कहा गया है कि बिल मिलने पर उनका भुगतान कर दिया जाता है। लेकिन इस दावे और ICDS अधिकारी की ओर से बिल जमा करने में देरी की बात के बीच फिलहाल यही स्पष्ट है कि भुगतान और आपूर्ति के बीच पैदा हुए विवाद का नुकसान बच्चों को उठाना पड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों के पोषण से जुड़ी इतनी महत्वपूर्ण योजना में ऐसी स्थिति बनने ही क्यों दी गई। अगर बिल देर से जमा हुए थे तो प्रशासन को समय रहते इसका समाधान करना चाहिए था। अगर भुगतान में देरी हुई थी तो अमूल और सरकारी विभाग के बीच बातचीत से आपूर्ति जारी रखने का रास्ता निकाला जा सकता था। लेकिन दोनों के बीच तालमेल की कमी का परिणाम यह हुआ कि 5,500 बच्चों का रोज का दूध एक सप्ताह से बंद है।
आंगनवाड़ी केंद्रों का उद्देश्य बच्चों को शुरुआती उम्र में पोषण और दूसरी जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे में दूध जैसी नियमित पोषण व्यवस्था का अचानक रुक जाना केवल भुगतान का प्रशासनिक मामला नहीं माना जा सकता। यह सवाल भी उठता है कि बच्चों के लिए तय पोषण योजना में वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई, ताकि बिल या भुगतान से जुड़ा विवाद होने पर बच्चों की आपूर्ति प्रभावित न हो।
गुजरात में सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन वडोदरा की यह घटना जमीनी स्तर पर योजना के क्रियान्वयन पर सवाल जरूर खड़े करती है। अमूल का भुगतान किसने रोका, बिल जमा करने में देरी क्यों हुई, भुगतान की व्यवस्था पहले से क्यों नहीं की गई और 5,500 बच्चों के लिए वैकल्पिक दूध की व्यवस्था क्यों नहीं हुई—इन सवालों का जवाब सरकार और स्थानीय प्रशासन को देना होगा।
सबसे जरूरी बात यह है कि भुगतान का विवाद अपनी जगह है, लेकिन बच्चों का पोषण किसी भी प्रशासनिक या वित्तीय विवाद के बीच नहीं रुकना चाहिए। 400 आंगनवाड़ी केंद्रों के 5,500 बच्चों का एक सप्ताह तक दूध से दूर रहना व्यवस्था के सामने खड़ा एक सीधा सवाल है—बच्चों के पोषण की योजना में सबसे ऊपर आखिर बच्चा है या भुगतान की फाइल?



