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कैंसर की दवा के नाम पर मौत का कारोबार: ₹1.5 लाख की Keytruda की नकली शीशियों से मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़

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स्वास्थ्य / राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 13 अप्रैल 2026

देश में कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण मानी जाने वाली दवाएं अब खुद एक बड़े खतरे में बदलती नजर आ रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत इन्वेस्टिगेशन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि महंगी और अत्याधुनिक इम्यूनोथेरेपी दवा Keytruda के नाम पर बाजार में बड़े पैमाने पर नकली दवाएं बेची जा रही हैं। यह सिर्फ एक फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध है जो मरीजों की मजबूरी, उनके दर्द और उनके परिवारों की उम्मीदों को बेरहमी से निचोड़ रहा है। करीब ₹1.5 लाख की कीमत वाली इस दवा की नकली शीशियां ऐसे लोगों तक पहुंच रही हैं जो हर हाल में जिंदगी बचाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि उनके हाथ में जो दवा है, वह इलाज नहीं बल्कि एक धोखा है।

इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि नकली दवाओं का यह नेटवर्क बेहद संगठित और सुनियोजित तरीके से काम कर रहा है। जांच में सामने आया है कि अस्पतालों, दवा आपूर्ति चैन और बिचौलियों के बीच एक ऐसा गठजोड़ बन चुका है, जो इस्तेमाल की जा चुकी या खाली पड़ी असली शीशियों को इकट्ठा करता है। इन शीशियों को फिर से पैक किया जाता है, उन पर असली जैसे बैच नंबर और लेबल लगाए जाते हैं और उन्हें दोबारा बाजार में उतार दिया जाता है। आम आदमी या यहां तक कि कई बार डॉक्टर भी इन नकली और असली दवाओं में फर्क नहीं कर पाते। यह पूरा नेटवर्क इतनी सफाई से काम करता है कि इसकी परतें खोलना भी आसान नहीं होता।

कैंसर के मरीजों की स्थिति इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा दर्दनाक है। इलाज के दौरान समय बेहद कीमती होता है और दवाओं की कीमत आसमान छूती है। ऐसे में कई परिवार सस्ते विकल्प या “जुगाड़” के जरिए दवा हासिल करने की कोशिश करते हैं। यही वह मोड़ होता है जहां यह माफिया सक्रिय हो जाता है। मरीजों को थोड़ी कम कीमत पर वही दवा देने का लालच दिया जाता है, लेकिन असल में उन्हें नकली इंजेक्शन थमा दिया जाता है। यह न केवल इलाज को बेअसर कर देता है, बल्कि कई मामलों में मरीज की हालत और ज्यादा बिगड़ सकती है। यानी जिस दवा से जीवन बचने की उम्मीद होती है, वही मौत का कारण बन सकती है।

जांच में यह भी सामने आया है कि अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट की गंभीर खामियां इस पूरे खेल को बढ़ावा दे रही हैं। इस्तेमाल के बाद फेंकी जाने वाली दवा की शीशियां सुरक्षित तरीके से नष्ट नहीं की जातीं, बल्कि वे गलत हाथों में पहुंच जाती हैं। यही शीशियां बाद में इस अवैध कारोबार का सबसे अहम हिस्सा बनती हैं। दवा बनाने वाली कंपनियों की ओर से भी यह कहा गया है कि सप्लाई के बाद पैकेजिंग और वेस्ट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी अस्पतालों की होती है, लेकिन इसी स्तर पर लापरवाही सबसे ज्यादा दिख रही है।

यह मामला केवल एक दवा या एक नेटवर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या मरीजों की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि उनके इलाज के नाम पर भी धोखाधड़ी की जाए? क्या नियामक एजेंसियों की निगरानी इतनी कमजोर है कि इस तरह का संगठित अपराध खुलेआम फल-फूल सके? और सबसे बड़ा सवाल—इस पूरे सिस्टम में आखिर जिम्मेदार कौन है?

इस खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह काला कारोबार और भी गहराता जाएगा। जरूरत है कि दवा सप्लाई चेन की हर कड़ी पर कड़ी निगरानी हो, अस्पतालों में वेस्ट मैनेजमेंट को सख्ती से लागू किया जाए और मरीजों को भी जागरूक किया जाए कि वे दवा केवल अधिकृत स्रोतों से ही खरीदें। क्योंकि यहां सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जिंदगी का सवाल है—और जिंदगी के साथ इस तरह का खिलवाड़ किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

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