[the_ad id="179"]
Home » National » 16 लाख वोटरों का हिसाब कौन देगा? बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, चुनाव आयोग की भूमिका कठघरे में

16 लाख वोटरों का हिसाब कौन देगा? बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, चुनाव आयोग की भूमिका कठघरे में

अभिषेक बनर्जी ने उठाए तीखे सवाल—जब नाम काटने की प्रक्रिया पर ही सवाल हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों को तलब क्यों नहीं किया गया? ट्रिब्यूनल में लंबित अपीलों का फैसला कब होगा, मतदाताओं को उनका अधिकार कब मिलेगा?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/कोलकाता | 6 नवंबर 2026

बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद अब केवल चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है। करीब 16 लाख 10 हजार मतदाताओं के नाम कटने और उनकी अपीलों पर फैसले में देरी ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित ट्रिब्यूनल की भूमिका और उसकी कार्यवाही को लेकर है। जिन मतदाताओं को राहत देने के लिए ट्रिब्यूनल बनाया गया, उन्हीं की अपीलों का नतीजा कब आएगा, यह अब तक स्पष्ट नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और न्यायिक प्रक्रिया को सीधे सवालों के घेरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि लाखों मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगने के बजाय प्रभावित मतदाताओं को ही लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझा दिया गया।

16 लाख नाम कटे, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?

इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम एक साथ मतदाता सूची से हटाए गए। विपक्ष का आरोप है कि जिन नामों को हटाने के लिए अपीलें दाखिल की गईं, उनके पीछे कौन था और किस आधार पर इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, इसकी स्पष्ट जानकारी चुनाव आयोग ने नहीं दी।

सवाल यह है कि यदि किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए आपत्ति या अपील की गई थी, तो उस प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? किसने नाम हटाने की मांग की? किन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई हुई? और जिन अधिकारियों ने इस प्रक्रिया को अंजाम दिया, उनकी जवाबदेही किसने तय की?

लोकतंत्र में किसी नागरिक का वोट केवल मतदाता सूची की एक प्रविष्टि नहीं है। यह उसका संवैधानिक अधिकार है। लाखों लोगों के नाम प्रभावित होने पर पारदर्शिता और जवाबदेही और भी जरूरी हो जाती है।

अभिषेक बनर्जी का सवाल—जिम्मेदार अधिकारी को तलब क्यों नहीं किया?

अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उनका कहना है कि उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत अधिकारी पहले SIR प्रक्रिया में चुनाव आयोग के मुख्य पर्यवेक्षक की भूमिका निभा चुके थे। ऐसे में उनसे यह पूछताछ क्यों नहीं की गई कि नाम हटाने की प्रक्रिया में उनकी वास्तविक भूमिका और अधिकार क्या थे?

बनर्जी का सवाल है कि यदि संबंधित पर्यवेक्षक के पास मतदाताओं के नाम हटाने या हटवाने का अधिकार ही नहीं था, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में नाम काटने की प्रक्रिया किसके निर्देश पर और किस कानूनी आधार पर आगे बढ़ी?

यह सवाल केवल एक अधिकारी की भूमिका तक सीमित नहीं है। यह पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की जवाबदेही से जुड़ा है। यदि लाखों नाम हटाने की प्रक्रिया में अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर अस्पष्टता थी, तो आयोग को उसका स्पष्ट विवरण देना चाहिए।

ट्रिब्यूनल बना, लेकिन मतदाता इंतजार में क्यों?

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में ट्रिब्यूनल की व्यवस्था इस उद्देश्य से की गई थी कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ प्रभावित लोग अपील कर सकें और उनके मामलों का निपटारा हो। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल इन अपीलों के निस्तारण की गति और पारदर्शिता को लेकर है।

करीब 16.10 लाख प्रभावित नामों के संदर्भ में दाखिल अपीलों पर कितने मामलों की सुनवाई हुई? कितने मतदाताओं को राहत मिली? कितने आवेदन अभी लंबित हैं? कितने नाम बहाल किए गए? इन सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब जरूरी है।

यदि मतदाताओं को अपने अधिकार की रक्षा के लिए अपील करनी पड़े, लेकिन उस अपील का फैसला ही समय पर न हो, तो न्याय का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?

स्थानीय निकाय चुनाव से पहले बढ़ी चिंता

पश्चिम बंगाल में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए यह विवाद और गंभीर हो गया है। यदि प्रभावित मतदाताओं की अपीलों का निपटारा समय रहते नहीं होता, तो उनके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है।

सवाल है कि ट्रिब्यूनल के फैसले कब आएंगे? जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए जाने का आरोप है, क्या उन्हें चुनाव से पहले मतदाता सूची में वापस जगह मिल पाएगी? क्या अपीलों के निस्तारण की कोई स्पष्ट समयसीमा तय की गई है?

चुनाव का कार्यक्रम आगे बढ़ता रहे और लाखों नागरिक अपने नाम की बहाली का इंतजार करते रहें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।

चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल

SIR के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका पहले से राजनीतिक विवाद के केंद्र में रही है। Form-6 की विवादित घोषणा को लेकर आयोग को अपना रुख बदलना पड़ा। दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों और बाद में सामने आए खुलासों ने आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं।

अब बंगाल में लाखों नामों को लेकर उठे विवाद ने एक और सवाल जोड़ दिया है—क्या मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया वास्तव में पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संचालित हुई?

यदि आयोग का दावा है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक हुई, तो उसे प्रत्येक विवादित कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि प्रक्रिया कानून के अनुसार थी। जिन नागरिकों के नाम कटे हैं, उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ।

सुप्रीम कोर्ट से जवाबदेही की मांग

इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी बहस के केंद्र में है। अदालत ने ट्रिब्यूनल की व्यवस्था बनाई है, इसलिए उसके सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि प्रभावित मतदाताओं की अपीलों का निपटारा केवल कागजी प्रक्रिया बनकर न रह जाए।

अभिषेक बनर्जी और विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर मिलना चाहिए। अदालत को यह स्पष्ट करना होगा कि अपीलों की सुनवाई कहां तक पहुंची है, कितने नाम बहाल हुए हैं और शेष मामलों का निपटारा कब तक होगा।

न्याय में देरी का सबसे बड़ा नुकसान उस नागरिक को होता है, जिसका अधिकार पहले ही विवाद के घेरे में आ चुका है। इसलिए 16 लाख से अधिक प्रभावित नामों का मामला केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि मतदाता के अधिकार और न्याय तक उसकी पहुंच का प्रश्न है।

16 लाख मतदाताओं का वोट किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं!

बंगाल SIR विवाद में अब चुनाव आयोग, प्रशासन और न्यायिक निगरानी—तीनों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हुई, तो आयोग दस्तावेजों के साथ इसे साबित करे। यदि गलतियां हुई हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान हो और प्रभावित मतदाताओं के नाम समय रहते बहाल किए जाएं।

विपक्ष के आरोपों की जांच होना जरूरी है, लेकिन लाखों मतदाताओं के अधिकारों को राजनीतिक बयानबाजी के बीच अनिश्चितकाल तक नहीं छोड़ा जा सकता।

सबसे बड़ा सवाल आज भी कायम है—16 लाख 10 हजार मतदाताओं के नाम किस आधार पर काटे गए, उनकी अपीलों का फैसला कब होगा और जिनके वोट छिनने का आरोप है, उन्हें मतदान का अधिकार कौन और कब लौटाएगा?

लोकतंत्र में चुनाव की तारीख तय करना ही पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि हर पात्र नागरिक को वोट डालने का अवसर मिले। सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सरकार—किसी को भी इस सवाल से बचने का रास्ता नहीं मिलना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *