ओपिनियन/शिक्षा/लाइफस्टाइल | डॉ. निपुनिका शाहिद एवं डॉ. अभिनाश झा, फैकल्टी ऑफ आर्ट्स, मीडिया एंड डिजाइन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026
कल्पना कीजिए, एक गांव की लड़की को पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप का ऑनलाइन फॉर्म भरना है। घर में स्मार्टफोन है, इंटरनेट भी चलता है, लेकिन फोन कभी पिता के पास होता है तो कभी भाई के हाथ में। उसे फोन चाहिए तो किसी के खाली होने का इंतजार करना पड़ता है। कई बार अनुमति लेनी पड़ती है और कभी इंटरनेट का डेटा ही खत्म हो जाता है।
यह एक काल्पनिक उदाहरण है, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई दक्षिण एशिया के लाखों-करोड़ों घरों में मौजूद है। स्मार्टफोन घर तक पहुंच गया है, इंटरनेट भी आ गया है, लेकिन क्या घर की बेटी को भी उस पर बराबर का अधिकार मिला है?
आज इंटरनेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। यह पढ़ाई, नौकरी, कारोबार, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं तक पहुंचने का जरिया बन चुका है। ऐसे में डिजिटल दुनिया से दूर रहना केवल तकनीक से दूर रहना नहीं, बल्कि अवसरों से वंचित रह जाना भी है।
आंकड़े बताते हैं, दूरी अब भी बहुत बड़ी है
GSMA की 2026 की मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने के मामले में पुरुषों और महिलाओं के बीच का अंतर 2024 के 33 प्रतिशत से घटकर 2025 में 25 प्रतिशत हुआ। यह सुधार जरूर है, लेकिन इस क्षेत्र में करीब 33 करोड़ महिलाएं अब भी मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर रही थीं।
UNICEF साउथ एशिया के 2024 के विश्लेषण में एक और चिंताजनक तस्वीर सामने आई। किशोर लड़कों के पास मोबाइल फोन होने की संभावना लड़कियों के मुकाबले डेढ़ गुना और स्मार्टफोन होने की संभावना लगभग दोगुनी बताई गई। लड़कियों में बुनियादी डिजिटल कौशल होने की संभावना भी लड़कों से 35 प्रतिशत कम थी।
ये आंकड़े केवल तकनीक की कमी नहीं दिखाते, बल्कि उस असमानता की ओर इशारा करते हैं जिसकी शुरुआत बचपन से हो जाती है। जब लड़कियों को फोन इस्तेमाल करने और डिजिटल कौशल सीखने के कम अवसर मिलते हैं, तो आगे चलकर उनकी पढ़ाई और रोजगार भी प्रभावित होते हैं।
घर में फोन होना, अपने फोन का अधिकार होना नहीं
किसी घर में स्मार्टफोन होना इस बात की गारंटी नहीं कि वहां रहने वाली महिला भी डिजिटल रूप से आत्मनिर्भर है। फोन किसी और का हो सकता है, उसका इस्तेमाल करने का समय कोई दूसरा तय कर सकता है और इंटरनेट का खर्च भी किसी और के नियंत्रण में हो सकता है।
कई महिलाओं को ऑनलाइन फॉर्म भरने, ईमेल भेजने, ऐप डाउनलोड करने या डिजिटल भुगतान करने के लिए परिवार के किसी सदस्य की मदद लेनी पड़ती है। यह निर्भरता धीरे-धीरे उनकी निजी और आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित कर देती है।
2021 में BMJ Global Health में प्रकाशित स्कॉट और उनके सहयोगियों के शोध ने भी दिखाया कि मध्य भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के मोबाइल इस्तेमाल पर पारिवारिक सोच, फोन का मालिकाना हक, डिजिटल जानकारी और घरेलू जिम्मेदारियों का असर पड़ता है।
यानी कई बार महिलाओं पर कोई सीधी पाबंदी नहीं लगाई जाती, लेकिन घर की व्यवस्था ही उनके लिए डिजिटल दुनिया तक पहुंच मुश्किल बना देती है।
पढ़ाई और रोजगार के अवसर भी छिनते हैं
आज पढ़ाई का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों से जुड़ चुका है। ऑनलाइन क्लास, डिजिटल लाइब्रेरी, स्कॉलरशिप के फॉर्म और ऑनलाइन प्रशिक्षण विद्यार्थियों के लिए नए रास्ते खोलते हैं। लेकिन जिस छात्रा को जरूरत के समय फोन ही न मिले, वह इन अवसरों का लाभ कैसे उठा पाएगी?
यही परेशानी नौकरी की तलाश में भी सामने आती है। ऑनलाइन आवेदन, ईमेल, डिजिटल इंटरव्यू और इंटरनेट पर उपलब्ध प्रशिक्षण आज रोजगार की दुनिया का हिस्सा हैं। अपना छोटा कारोबार शुरू करने वाली महिलाएं भी इंटरनेट के जरिए ग्राहकों तक पहुंच सकती हैं।
लेकिन अगर हर छोटे-बड़े काम के लिए उन्हें किसी दूसरे का फोन या मदद चाहिए, तो आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा रह जाता है। डिजिटल दूरी आर्थिक असमानता को और गहरा कर सकती है।
सुरक्षा के नाम पर बेटियों की आजादी क्यों सीमित हो?
ऑनलाइन दुनिया महिलाओं के लिए अवसरों के साथ खतरे भी लेकर आई है। गलत संदेश, ऑनलाइन पीछा करना, फर्जी पहचान, धमकियां और निजी तस्वीरों का दुरुपयोग जैसी घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं।
परिवारों की चिंता समझी जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि गलती करने वाले व्यक्ति पर कार्रवाई करने के बजाय लड़की का फोन और इंटरनेट इस्तेमाल करना क्यों बंद कर दिया जाता है?
समाधान बेटियों को डिजिटल दुनिया से दूर रखने में नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित तरीके से इसका इस्तेमाल करना सिखाने में है। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल सुरक्षा की शिक्षा, ऑनलाइन उत्पीड़न के खिलाफ आसान शिकायत व्यवस्था और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही जरूरी है।
सुरक्षा और आजादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बेटियों को सुरक्षित इंटरनेट चाहिए, इंटरनेट से दूरी नहीं।
जब जरूरी सेवाएं ऑनलाइन हों, तो महिलाएं पीछे क्यों रहें?
बैंकिंग, सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और कई जरूरी सेवाएं अब इंटरनेट के जरिए उपलब्ध हैं। लेकिन जिस महिला को ऑनलाइन आवेदन करना, ओटीपी समझना या डिजिटल भुगतान करना नहीं आता, उसके लिए ये सुविधाएं कितनी उपयोगी साबित होंगी?
डिजिटल सेवाएं तभी वास्तव में सबके काम आएंगी, जब वे सरल भाषा में उपलब्ध हों और महिलाओं को उनका इस्तेमाल करना सिखाया जाए। सरकारी सहायता केंद्र, स्थानीय भाषाओं में प्रशिक्षण और ऑफलाइन विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि तकनीक की जानकारी न होने के कारण कोई महिला अपने अधिकारों से वंचित न रह जाए।
दक्षिण एशिया की हर महिला की चुनौती एक जैसी नहीं
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। शहरों में रहने वाली महिलाओं की चुनौतियां गांवों की महिलाओं से अलग हो सकती हैं। गरीब परिवारों की लड़कियों को फोन खरीदने में परेशानी होती है, जबकि कई जगह फोन होने के बावजूद उन्हें इस्तेमाल करने की पूरी आजादी नहीं मिलती।
दिव्यांग महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों की लड़कियों के सामने भी अलग तरह की बाधाएं हैं। इसलिए समाधान भी स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार करने होंगे। केवल स्मार्टफोन बांटने या इंटरनेट कनेक्शन बढ़ाने से डिजिटल समानता नहीं आएगी।
बदलाव के लिए क्या करना होगा?
सबसे पहले बेटियों को अपना स्मार्टफोन और इंटरनेट इस्तेमाल करने का वास्तविक अधिकार देना होगा। गरीब परिवारों की लड़कियों को सस्ते स्मार्टफोन, किफायती इंटरनेट और सार्वजनिक डिजिटल केंद्रों की सुविधा मिलनी चाहिए।
स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में डिजिटल प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए, जहां लड़कियां ईमेल भेजना, ऑनलाइन फॉर्म भरना, नौकरी के लिए आवेदन करना, डिजिटल भुगतान और अपनी निजी जानकारी सुरक्षित रखना सीख सकें।
परिवारों की सोच बदलना भी उतना ही जरूरी है। जिस तरह बेटे को पढ़ाई और नौकरी के लिए फोन इस्तेमाल करने का अधिकार मिलता है, उसी तरह बेटी को भी मिलना चाहिए। तकनीक पर अधिकार किसी के लिंग के आधार पर तय नहीं होना चाहिए।
सरकारों को यह भी देखना होगा कि कितनी महिलाओं के पास अपना फोन है, कितनी बिना किसी की मदद के इंटरनेट चला सकती हैं और कितनी डिजिटल सेवाओं का वास्तविक लाभ उठा रही हैं। सफलता का पैमाना केवल बांटे गए स्मार्टफोन या इंटरनेट कनेक्शन नहीं, बल्कि महिलाओं की बढ़ती स्वतंत्रता और भागीदारी होना चाहिए।
डिजिटल क्रांति तभी पूरी होगी, जब बेटियां भी बराबर की भागीदार होंगी
दक्षिण एशिया की बेटियों में प्रतिभा की कमी नहीं है। उनमें पढ़ने, नौकरी करने, कारोबार शुरू करने और दुनिया बदलने की क्षमता है। कमी है तो बराबर अवसरों की।
स्मार्टफोन अपने आप समाज की पुरानी सोच नहीं बदल सकता। इंटरनेट आने से भेदभाव और पाबंदियां भी अपने आप खत्म नहीं होतीं। लेकिन अगर बेटियों को डिजिटल दुनिया से दूर रखा गया, तो उनके सामने आगे बढ़ने के रास्ते और मुश्किल होते जाएंगे।
आज सवाल यह नहीं है कि महिलाएं स्मार्टफोन के दौर के लिए तैयार हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमारा समाज उन्हें इस दौर में बराबरी से आगे बढ़ने देना चाहता है?
जिस घर में बेटा इंटरनेट पर अपना भविष्य तलाश सकता है, उसी घर की बेटी को भी यह अवसर मिलना चाहिए। उसे फोन मांगने के लिए किसी का इंतजार न करना पड़े, अपनी पढ़ाई के लिए किसी की अनुमति पर निर्भर न रहना पड़े और अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचाने में कोई रुकावट न हो।
क्योंकि डिजिटल आजादी का अर्थ सिर्फ हाथ में स्मार्टफोन होना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की ताकत।
जिस दिन दक्षिण एशिया की हर बेटी के हाथ में सिर्फ स्मार्टफोन नहीं, बल्कि उस पर अपना अधिकार भी होगा, उसी दिन इस क्षेत्र की डिजिटल क्रांति सचमुच पूरी होगी।



