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आंदोलन से डर क्यों रहे हैं मोहन भागवत? इतिहास याद कीजिए, सत्ता भी आंदोलनों से बदलती है

आज आंदोलन पर उपदेश देने वाले RSS प्रमुख भूल रहे हैं कि आजादी से लेकर जेपी आंदोलन तक, जनांदोलनों ने ही सत्ता को चुनौती दी; क्या वोट चोरी और मौजूदा राजनीतिक संकट ने संघ की बेचैनी बढ़ा दी है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026

आंदोलन से इतनी परेशानी क्यों, मोहन भागवत जी?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अपने संबोधन में कहा कि समस्याओं का समाधान केवल आंदोलनों से नहीं होता। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि व्यक्ति, समूह या विचारधारा के प्रति शत्रुता से प्रेरित आंदोलन देश को कमजोर करने वाली बाहरी ताकतों को फायदा पहुंचा सकते हैं।

बात सुनने में अच्छी लगती है। समाज में हिंसा नहीं होनी चाहिए, नफरत नहीं फैलनी चाहिए और समस्याओं का समाधान संवाद से निकलना चाहिए। इन सिद्धांतों से किसी को असहमति क्यों होगी?

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हर आंदोलन को संदेह की नजर से देखना चाहिए? क्या सरकार से सवाल पूछना, चुनावी प्रक्रिया पर जवाब मांगना और सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतरना देश को कमजोर करना है? और अगर आंदोलन से समस्याएं नहीं सुलझतीं, तो फिर भारत के राजनीतिक इतिहास को किस नजर से देखा जाएगा?

भागवत जी को इतिहास के उन पन्नों पर भी नजर डालनी चाहिए, जहां आंदोलनों ने सत्ता की दिशा बदल दी। लोकतंत्र में आंदोलन कोई बीमारी नहीं, बल्कि नागरिकों के पास उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकारों में से एक हैं।

आंदोलन नहीं होते, तो भारत आजाद कैसे होता?

भारत की आजादी किसी शासक की मेहरबानी से नहीं मिली थी। इसके पीछे दशकों का संघर्ष, असंख्य बलिदान, जनआंदोलन, किसानों-मजदूरों की भागीदारी, क्रांतिकारियों का साहस और ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक जनप्रतिरोध था।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन ने औपनिवेशिक शासन की वैधता को गंभीर चुनौती दी। इन आंदोलनों के साथ अनेक दूसरे संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी स्वतंत्रता की जमीन तैयार की।

अगर उस दौर में लोगों से कहा जाता कि आंदोलन मत करो, इससे देश कमजोर होगा, विदेशी ताकतों को फायदा मिलेगा और समस्याओं का समाधान बातचीत से निकालो, तो क्या आजादी की लड़ाई उसी रूप में आगे बढ़ पाती?

आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों ने सत्ता की नाराजगी की परवाह किए बिना अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने यह नहीं माना कि शासक का विरोध करना देश का विरोध करना है।

सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं होता। सत्ता से सवाल पूछना राष्ट्रविरोध नहीं होता। और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करना किसी भी लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है।

यही वह बुनियादी फर्क है, जिसे सत्ता और समाज के बीच संवाद की वकालत करने वालों को कभी नहीं भूलना चाहिए।

जेपी आंदोलन ने इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती दी

1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उठा आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का निर्णायक अध्याय बना। भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन के खिलाफ असंतोष से शुरू हुआ यह आंदोलन व्यापक राजनीतिक चुनौती में बदल गया।

इसके बाद 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया। नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा।

आपातकाल के खिलाफ विरोध दबाने की कोशिशों के बावजूद असंतोष समाप्त नहीं हुआ। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

इस बदलाव के पीछे केवल एक आंदोलन नहीं था; राजनीतिक परिस्थितियां, विपक्षी दलों की एकजुटता और मतदाताओं का फैसला भी निर्णायक थे। लेकिन जेपी आंदोलन ने जिस जनचेतना और राजनीतिक प्रतिरोध को आकार दिया, उसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता।

तब सवाल उठता है: अगर आंदोलन राजनीतिक बदलाव का रास्ता खोल सकता है, तो आज आंदोलन करने वालों को यह उपदेश क्यों दिया जाए कि वे समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं?

क्या आंदोलन तब तक अच्छा है, जब तक वह सत्ता को चुनौती न दे? और जैसे ही वह सत्ता के लिए मुश्किल पैदा करने लगे, उसे बाहरी ताकतों की साजिश बताने की आशंका क्यों सामने आने लगती है?

अन्ना आंदोलन और 2014 की राजनीति

2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। जन लोकपाल की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना और तत्कालीन यूपीए सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव पड़ा।

इस आंदोलन से निकले राजनीतिक विमर्श ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। आम आदमी पार्टी का गठन भी इसी दौर की राजनीतिक पृष्ठभूमि में हुआ।

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बड़ी जीत मिली और केंद्र में सरकार बनी। उस चुनाव के परिणामों के पीछे अनेक कारण थे—यूपीए सरकार के खिलाफ असंतोष, महंगाई, भ्रष्टाचार के आरोप, भाजपा का चुनाव अभियान और मोदी का नेतृत्व। अन्ना आंदोलन को अकेले इस जीत का कारण बताना इतिहास को सरल बनाना होगा। फिर भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने उस समय के राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया था, इससे इनकार करना कठिन है।

यानी आंदोलन केवल विरोध दर्ज करने का तरीका नहीं होते। वे जनता की प्राथमिकताएं बदल सकते हैं, नए राजनीतिक विकल्प पैदा कर सकते हैं और चुनावी राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।

विडंबना यह है कि जिस राजनीतिक दौर में आंदोलनों से उपजे असंतोष ने सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार की, उसी देश में आज आंदोलन की उपयोगिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

क्या मौजूदा आंदोलन से सत्ता को डर लग रहा है?

आज चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), वोट चोरी के आरोपों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्ष इन मुद्दों पर जवाबदेही मांग रहा है और युवाओं की भागीदारी भी चर्चा में है।

ऐसे माहौल में भागवत की आंदोलन संबंधी टिप्पणी को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनका संबोधन अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि RSS या सरकार किसी आंदोलन से भयभीत है। लेकिन यह सवाल उठाना पूरी तरह जायज है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों के प्रति दृष्टिकोण क्या होना चाहिए।

यदि आरोप गलत हैं, तो तथ्यों के साथ जवाब दीजिए। यदि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो पारदर्शिता से भरोसा मजबूत कीजिए। यदि किसी आंदोलन में गलतियां हैं, तो उनकी पहचान कीजिए। लेकिन आंदोलन करने वालों को देश की स्थिरता के लिए खतरा बताने से पहले यह भी देखिए कि उनकी शिकायतों में कितना दम है।

लोकतंत्र में सवालों का जवाब सवाल पूछने वालों को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता।

सत्ता बदले तो संस्थाओं की जवाबदेही का सवाल भी उठेगा

भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन एक सामान्य लोकतांत्रिक संभावना है। आज भाजपा सत्ता में है, कल कोई दूसरी पार्टी भी सरकार बना सकती है। यह फैसला जनता करती है, किसी संगठन की इच्छा नहीं।

यदि भविष्य में कांग्रेस की सरकार आती है, तो उसे भी संविधान और कानून के दायरे में काम करना होगा। राहुल गांधी या कोई अन्य नेता किसी संस्था के खिलाफ कार्रवाई करना चाहे, तो उसके लिए कानूनी आधार और संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी होगी। राजनीतिक बदले की कार्रवाई को लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं माना जा सकता।

लेकिन इसी सिद्धांत का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है: कोई संगठन कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे सार्वजनिक सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता।

RSS को लेकर उसकी संगठनात्मक संरचना, कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और संपत्तियों पर सार्वजनिक बहस होती रही है। संघ की संपत्तियों को लेकर खरबों रुपये के दावों की पुष्टि के लिए विश्वसनीय वित्तीय दस्तावेज और संपत्ति संबंधी रिकॉर्ड जरूरी हैं। बिना प्रमाण किसी निश्चित रकम को तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

फिर भी बुनियादी सवाल कायम है: देश के सार्वजनिक जीवन में इतना प्रभाव रखने वाले किसी भी संगठन की वित्तीय व्यवस्था और संपत्ति से जुड़े सवालों पर पारदर्शी जानकारी उपलब्ध क्यों नहीं होनी चाहिए? इस सवाल का जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, दस्तावेजों और कानून के आधार पर दिया जाना चाहिए।

आंदोलन से नहीं, अन्याय से डरना चाहिए

मोहन भागवत जी, आंदोलन हमेशा सही हों, यह जरूरी नहीं। आंदोलनों में गलतियां हो सकती हैं, राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल कर सकते हैं और कभी-कभी विरोध हिंसा में भी बदल सकता है। लेकिन इन आशंकाओं के आधार पर सभी आंदोलनों को संदेह की नजर से देखना भी गलत है।

लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सत्ता चलाने का अधिकार। सरकार बहुमत से बनती है, लेकिन बहुमत का अर्थ यह नहीं कि सरकार सवालों से मुक्त हो गई।

अगर जनता को लगे कि उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही, संस्थाएं जवाब नहीं दे रहीं और शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा, तो सड़क पर उतरना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। इस अधिकार का सम्मान करना चाहिए, न कि उसे बाहरी ताकतों के संभावित फायदे से जोड़कर कमजोर करना चाहिए।

भारत की आजादी से लेकर जेपी आंदोलन और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक, इतिहास यही बताता है कि जनप्रतिरोध राजनीति को बदल सकता है। लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात में नहीं है कि सत्ता कितने बड़े आंदोलन को रोक सकती है, बल्कि इसमें है कि वह जनता की असहमति को कितनी गंभीरता से सुनती है।

क्योंकि आंदोलन से सत्ता जरूर बदल सकती है, लेकिन जनता की आवाज को अनसुना करने की कीमत लोकतंत्र को चुकानी पड़ती है। और किसी भी संगठन या सरकार के लिए इससे बड़ा सबक नहीं हो सकता।

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