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वैभव को बैठाकर रखने की सफाई अब क्यों? जब बल्ला बोल रहा था, तब गंभीर की रणनीति चुप थी

खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026

गौतम गंभीर अब युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को लेकर सफाई दे रहे हैं कि अच्छी फॉर्म में होने के बावजूद उन्हें टीम से बाहर बैठना पड़ा, क्योंकि लंबे समय से अच्छा प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ियों की जगह अचानक किसी युवा खिलाड़ी को मौका नहीं दिया जा सकता। गंभीर का तर्क है कि टीम का संतुलन, ड्रेसिंग रूम की सुरक्षा और लंबे समय से अच्छा प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ियों का सम्मान भी जरूरी है। सुनने में यह बात क्रिकेट की सामान्य रणनीति जैसी लगती है, लेकिन सवाल यह है कि जब वैभव बल्ले से लगातार अपनी क्षमता साबित कर रहा था, तब यही संतुलन और संयोजन इतना भारी क्यों पड़ गया कि 15 साल के उस बल्लेबाज को लगातार मौके के लिए इंतजार करना पड़ा? आज जब वैभव एशियन गेम्स में भारत की खिताबी जीत का हिस्सा बन चुका है और उसके नाम रिकॉर्ड जुड़ चुके हैं, तब गंभीर का यह स्पष्टीकरण स्वाभाविक रूप से उस पुराने फैसले पर सवाल खड़े करता है।

वैभव कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जिसे केवल सोशल मीडिया ने स्टार बना दिया था। उसने मैदान पर प्रदर्शन करके अपनी जगह बनाई थी। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखते ही उसने इतिहास रचा। महज 15 साल की उम्र में भारत के लिए टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाला सबसे कम उम्र का भारतीय बना। इसके बाद उसने पुरुषों के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे कम उम्र में अर्धशतक लगाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। यानी उसके पक्ष में सिर्फ उम्र और प्रतिभा नहीं थी, उसके पक्ष में रन और प्रदर्शन भी थे। इसके बावजूद अफगानिस्तान सीरीज और जापान के खिलाफ एकमात्र टी20 मुकाबले में उसे मौका नहीं मिला। सवाल यह नहीं है कि हर मैच में वैभव को खिलाना ही चाहिए था। सवाल यह है कि जब कोई युवा बल्लेबाज फॉर्म में हो, गेंदबाजों पर दबाव डाल रहा हो और अपनी प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर साबित कर चुका हो, तब उसे लगातार बाहर रखने का फैसला किस आधार पर लिया गया? क्रिकेट में कॉम्बिनेशन जरूरी है, लेकिन कॉम्बिनेशन का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि फॉर्म में चल रहे खिलाड़ी के लिए दरवाजा बंद कर दिया जाए।

गंभीर अब कह रहे हैं कि सोशल मीडिया या बाहरी शोर यह तय नहीं करता कि प्लेइंग इलेवन में कौन खेलेगा। बिल्कुल सही—प्लेइंग इलेवन सोशल मीडिया तय नहीं करता। लेकिन प्लेइंग इलेवन सिर्फ कोच और कप्तान की पसंद से भी नहीं बनती; उसके पीछे खिलाड़ी का प्रदर्शन, फॉर्म, परिस्थितियां और टीम की जरूरत भी होती है। अगर वैभव गेंदबाजों की धज्जियां उड़ा रहा था, अगर वह बड़े मंच पर दबाव के बीच रन बना रहा था और अगर दुनिया भर के क्रिकेट विशेषज्ञ उसकी बल्लेबाजी की चर्चा कर रहे थे, तो उसकी प्रतिभा को नजरअंदाज करने का आधार क्या था? युवा खिलाड़ी को सुरक्षा देने की बात अपनी जगह है, लेकिन कभी-कभी युवा खिलाड़ी को सुरक्षा नहीं, सिर्फ मौका चाहिए होता है। और वैभव के मामले में यही मौका देर से मिला। जब एशियन गेम्स के सेमीफाइनल में उसे श्रीलंका के खिलाफ उतारा गया तो उसने 21 गेंदों पर 38 रन बनाकर दिखा दिया कि वह सिर्फ भविष्य का खिलाड़ी नहीं, वर्तमान में भी मैच का रुख बदलने की क्षमता रखता है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब वही टीम मैनेजमेंट उसके प्रदर्शन को लेकर सार्वजनिक रूप से सफाई दे रहा है। यह सफाई उस समय आ रही है जब वैभव भारत की एशियन गेम्स की सफल खिताबी मुहिम का हिस्सा बन चुका है। फाइनल में उसने नौ गेंदों पर 15 रन बनाए और भारत ने पाकिस्तान को 19 रन से हराकर स्वर्ण पदक बरकरार रखा। वह एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाला सबसे कम उम्र का भारतीय भी बना। ऐसे में सवाल गंभीर से भी पूछा जाना चाहिए और भारतीय क्रिकेट व्यवस्था से भी—अगर वैभव इतना प्रतिभाशाली था कि 15 साल की उम्र में रिकॉर्ड बना सकता था, तो उसे मौके देने में इतनी सावधानी क्यों बरती गई? क्या युवा खिलाड़ी को मौका देने से पहले उसे हर परीक्षा में पहले ही पास होना जरूरी है? अगर ऐसा है तो फिर नए खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जगह मिलेगी कैसे?

गौतम गंभीर का अनुभव और क्रिकेट की समझ अपनी जगह है। लेकिन कोचिंग की असली परीक्षा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए तर्कों से नहीं, मैदान पर लिए गए फैसलों से होती है। वैभव ने अब मैदान पर अपना जवाब दे दिया है। उसने बता दिया कि इंतजार के बावजूद उसका आत्मविश्वास नहीं टूटा और मौका मिलते ही वह प्रदर्शन कर सकता है। इसलिए गंभीर की सफाई को अंतिम शब्द मान लेने के बजाय उस फैसले की समीक्षा जरूरी है, जिसने फॉर्म में चल रहे एक युवा बल्लेबाज को बाहर बैठाए रखा। सवाल गंभीर को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट में उस सोच पर बहस का है जिसमें स्थापित नामों के सम्मान और टीम कॉम्बिनेशन के नाम पर कभी-कभी फॉर्म में चल रहे युवा खिलाड़ी को भी इंतजार करना पड़ता है। वैभव को आखिरकार मौका मिला और उसने खुद को साबित किया। अब सवाल यह है कि जब वह साबित करने के लिए तैयार था, तब उसे बेंच पर बैठाए रखने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?

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