राष्ट्रीय/ सुरक्षा/ अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक को भारत से अमेरिका जाने की अदालत से मिली अनुमति पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया है कि जिस अमेरिकी नागरिक को NIA ने म्यांमार में सशस्त्र समूहों को ड्रोन और हथियारों से जुड़ी ट्रेनिंग देने, जरूरी परमिट के बिना भारत के प्रतिबंधित इलाकों में जाने और म्यांमार सीमा पार करने के मामले में गिरफ्तार किया था, वह अब अपने देश अमेरिका जा रहा है। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम की तुलना अमेरिका से भारत भेजे गए भारतीय नागरिकों के निर्वासन से की है और प्रधानमंत्री पर अमेरिका के दबाव में काम करने जैसे गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए हैं।
मामला मार्च 2026 में सामने आया था। NIA ने वैनडाइक और 6 यूक्रेनी नागरिकों को गिरफ्तार किया था। NIA के अनुसार, ये विदेशी नागरिक दिसंबर 2025 में वैध यात्रा दस्तावेजों के साथ भारत आए थे, लेकिन बाद में गुवाहाटी और मिजोरम पहुंचे और बिना जरूरी Protected Area Permit या Restricted Area Permit के प्रतिबंधित क्षेत्र में गए। जांच एजेंसी के अनुसार, समूह ने मिजोरम से म्यांमार में प्रवेश किया और वहां Myanmar-based Ethnic Armed Groups के लिए ड्रोन युद्ध, ड्रोन संचालन, असेंबली और जैमिंग तकनीक से जुड़ी ट्रेनिंग की योजना बनाई थी। NIA ने यह भी कहा था कि कुछ सशस्त्र समूहों के भारत में सक्रिय उग्रवादी संगठनों से संबंध थे।
NIA की जांच में मामला सिर्फ आव्रजन नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं था। एजेंसी ने शुरुआत में UAPA की धारा 18 के तहत आतंकवादी गतिविधि की साजिश से जुड़े आरोपों में मामला दर्ज किया था। NIA का कहना था कि म्यांमार में सशस्त्र समूहों को प्रशिक्षण देने और ड्रोन से जुड़े सामान की भारत के रास्ते आवाजाही की जांच जरूरी है। एजेंसी ने यह भी दावा किया था कि यूरोप से ड्रोन और उसके उपकरण भारत लाए गए थे।
लेकिन सितंबर में दाखिल चार्जशीट ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। NIA ने 7 विदेशी नागरिकों के खिलाफ Immigration and Foreigners Act, 2025 की धाराओं 21 और 23 के तहत आरोप लगाए, लेकिन पहली चार्जशीट में UAPA की धाराएं शामिल नहीं की गईं। NIA की ओर से अदालत को बताया गया कि UAPA से जुड़े पहलू की जांच अभी जारी है और आगे सबूत मिलने पर supplementary chargesheet दाखिल की जा सकती है। यानी NIA ने आतंक से जुड़े पहलू की जांच बंद होने की बात नहीं कही थी।
इसके बाद 18 सितंबर को विशेष NIA अदालत ने वैनडाइक को default bail दे दी। अदालत ने माना कि जांच की निर्धारित अवधि के भीतर पूरी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी और केवल सीमित आरोपों वाली चार्जशीट दाखिल करके आरोपी के default bail के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि UAPA से संबंधित जांच जारी है।
इसके बाद 25 सितंबर को दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने वैनडाइक और 6 यूक्रेनी नागरिकों को अपने-अपने देश जाने की अनुमति दे दी। अदालत ने उन्हें एक महीने के लिए अमेरिका और यूक्रेन जाने की अनुमति दी और इसके लिए शर्तें भी तय कीं। वैनडाइक अमेरिका गया, जबकि 6 यूक्रेनी नागरिकों को यूक्रेन जाने की अनुमति मिली।
यही वह फैसला है जिस पर कांग्रेस ने सबसे तीखा सवाल उठाया है। पवन खेड़ा ने कहा कि अगर NIA की शुरुआती जांच में इतने गंभीर आरोप थे तो अब UAPA की धाराएं चार्जशीट में क्यों नहीं हैं? उन्होंने पूछा कि क्या अमेरिकी नागरिक होने की वजह से सरकार पर किसी तरह का दबाव है और क्या अमेरिका के साथ संबंधों के कारण मामले का रुख बदला गया। खेड़ा ने यह भी सवाल उठाया कि अगर शुरुआती आरोपों में पर्याप्त आधार था तो अब स्थिति इतनी बदल कैसे गई, और अगर पर्याप्त सबूत नहीं थे तो इतने गंभीर आरोपों में गिरफ्तारी और इतने लंबे समय तक हिरासत की जरूरत क्यों पड़ी।
कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को अमेरिका द्वारा भारतीय नागरिकों के निर्वासन से भी जोड़ा है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 3,567 भारतीय नागरिकों को अमेरिका से वापस भेजा गया और 2026 में जुलाई तक 1,273 भारतीय नागरिकों को निर्वासित किया गया। फरवरी 2025 में 104 भारतीय नागरिकों को लेकर अमेरिकी C-17 सैन्य विमान अमृतसर पहुंचा था। ऐसे में कांग्रेस का सवाल है कि जब भारतीय नागरिकों के साथ अमेरिका में इतनी सख्त निर्वासन प्रक्रिया अपनाई गई, तो भारत में सुरक्षा जांच का सामना कर रहे एक अमेरिकी नागरिक को अपने देश जाने की अनुमति क्यों मिली।
लेकिन इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य भी सामने रखना जरूरी है। वैनडाइक को किसी सरकारी आदेश के जरिए सीधे अमेरिका भेजे जाने का प्रमाण उपलब्ध रिकॉर्ड में नहीं है। उसे पहले अदालत से default bail मिली और उसके बाद अदालत ने विदेश यात्रा की अनुमति दी। इसलिए कांग्रेस का यह कहना कि उसे अमेरिकी दबाव के कारण छोड़ा गया, फिलहाल एक राजनीतिक आरोप है, न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं। उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं है कि अमेरिकी दबाव के कारण अदालत ने यात्रा की अनुमति दी।
फिर भी सवाल गंभीर हैं। अगर UAPA की जांच अभी जारी है, तो विदेश जाने की अनुमति देते समय सुरक्षा एजेंसियों का आकलन क्या था? NIA ने यात्रा की अनुमति का विरोध किया था या नहीं? अगर विरोध किया था तो अदालत ने किन आधारों पर उसे खारिज किया? अगर विरोध नहीं किया था तो क्यों? आरोपी के अमेरिका चले जाने के बाद जांच के लिए उसकी उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी? अगर supplementary chargesheet में गंभीर आरोप सामने आते हैं तो आगे की कार्रवाई कैसे होगी?
एक और बड़ा सवाल यह है कि अगर NIA ने शुरुआत में आतंकवादी साजिश और सशस्त्र समूहों को ट्रेनिंग देने जैसे गंभीर पहलुओं की जांच शुरू की थी, तो निर्धारित अवधि में उस जांच को पूरा क्यों नहीं किया जा सका? अदालत के default bail आदेश में चार्जशीट को “piecemeal” बताया गया था। क्या जांच एजेंसी के पास पर्याप्त समय और संसाधन नहीं थे? क्या जांच में पर्याप्त सबूत नहीं मिले? या जांच अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची थी जहां UAPA के आरोप चार्जशीट में लगाए जा सकें? इन सवालों का जवाब NIA और केंद्र सरकार को देना होगा।
मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि NIA ने खुद कहा है कि जांच पूरी तरह बंद नहीं हुई है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसी ने कहा है कि UAPA से जुड़े अपराधों की जांच आगे जारी रखी गई है और आवश्यकता पड़ने पर supplementary chargesheet दाखिल की जा सकती है। इसलिए अभी यह कहना भी जल्दबाजी होगा कि वैनडाइक को सभी आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है।
लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह है। भारत की जमीन, भारत की सीमा, भारत की सुरक्षा और भारत के कानून से जुड़ा मामला हो तो नागरिक और विदेशी के बीच कानून की समानता पर कोई सवाल क्यों उठना चाहिए? अगर किसी भारतीय नागरिक को विदेश से निर्वासित किया जाता है तो भारत सरकार उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाती है; वहीं भारत में किसी अमेरिकी नागरिक के मामले में ऐसी तस्वीर क्यों दिखाई दे रही है—यह सवाल विपक्ष पूछ रहा है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ अदालत का कानूनी आदेश है, या सरकार और जांच एजेंसी के स्तर पर भी ऐसे फैसले हुए जिनसे इस अमेरिकी नागरिक को भारत से बाहर जाने का रास्ता मिला? अगर सरकार की भूमिका केवल अदालत के आदेश का पालन करने तक थी तो उसे यह बात साफ-साफ बतानी चाहिए। अगर जांच एजेंसी ने विदेश यात्रा का विरोध किया था तो उसके आधार सार्वजनिक होने चाहिए। और अगर जांच एजेंसी ने विरोध नहीं किया, तो देश को इसका कारण जानने का अधिकार है।
क्योंकि मामला सिर्फ एक विदेशी नागरिक के घर लौटने का नहीं है। मामला उन आरोपों का है जिनमें भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचकर सशस्त्र समूहों को ड्रोन और हथियारों से जुड़ी ट्रेनिंग देने की जांच हुई। अदालत ने कानून के तहत राहत दी है, लेकिन सरकार और NIA से सवाल पूछना अभी खत्म नहीं हुआ—आखिर भारत की सुरक्षा के इस मामले में शुरुआत में लगाए गए गंभीर आरोपों और आज की कानूनी स्थिति के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों आया?



