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‘वोट चोरी’ से ‘देशद्रोह’ तक: EC के अंदर 14 बार सवाल, SIR ने बढ़ाया बड़ा संवैधानिक विवाद

राजनीति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026

देश में चुनाव को लेकर चल रही बहस अब सिर्फ “वोट चोरी” के आरोप तक सीमित नहीं रह गई है। बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग, BJP और RSS पर “वोट चोरी” के जरिए संविधान पर हमला करने और “देशद्रोह” करने का आरोप लगाया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के 3 सदस्यों में से 2 चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के भीतर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। मामला नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, Form 6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस के नियंत्रण से जुड़ा है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर “वोट चोरी” होती है तो क्या वह सिर्फ चुनावी गड़बड़ी है, या लोकतंत्र और संविधान पर हमला? राहुल गांधी ने तो इसे सीधे “देशद्रोह” बताया है। उन्होंने कहा कि “वोट चोरी” भारतीय जनता के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला है। लेकिन यह राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप है, कोई न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष नहीं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं और पिछले एक साल में उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

लेकिन विवाद को गंभीर बनाने वाली बात यह है कि सवाल बाहर से नहीं आया। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार, आयोग के ही 2 सदस्यों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें 4 आपत्तियां एक ही दिन दर्ज होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों और आदेशों के बारे में कहा कि उन्हें उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया। आपत्तियां मतदाता जोड़ने, नाम हटाने, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच, SIR और अपीलों की प्रक्रिया से जुड़ी थीं।

सबसे बड़ा सवाल Form 6 पर उठा। नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में जुलाई में ऐसा सवाल जोड़ा गया, जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछली SIR मतदाता सूची में होने के बारे में जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट के अनुसार, विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की और कहा कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया। बाद में संधू ने 13 अगस्त को इस बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए इसे हटाने की मांग की।

इसके बाद सवाल सिर्फ फॉर्म का नहीं रहा, बल्कि वोटर डेटा पर नियंत्रण का हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीयकरण को लेकर चिंता जताई। सवाल यह था कि जिन अधिकारियों के पास कानून के तहत मतदाता सूची संभालने की जिम्मेदारी है, क्या उनके पास अपने क्षेत्र के मतदाता डेटाबेस तक पर्याप्त पहुंच बनी हुई है? अगर जमीन पर मौजूद ERO किसी मतदाता को पात्र मानता है, लेकिन डिजिटल सिस्टम उस फैसले को लागू करने की अनुमति नहीं देता, तो आखिर अंतिम शक्ति किसके पास है? यही सवाल चुनावी पारदर्शिता की बहस को एक नए स्तर पर ले जाता है।

गोवा का 97 मतदाताओं वाला मामला इसी सवाल को और स्पष्ट करता है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय ERO ने 97 मतदाताओं को अंतिम सूची में शामिल करने के योग्य पाया, लेकिन पहले हटाए गए नामों को बहाल करने की सॉफ्टवेयर सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस सुविधा के लिए कई बार पत्र भी लिखे। अगर किसी नागरिक को स्थानीय वैधानिक अधिकारी योग्य मान चुका है, लेकिन तकनीकी व्यवस्था उसके नाम को वापस जोड़ने में बाधा बन जाए, तो यह सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं बल्कि मतदाता के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही का बन जाता है।

पश्चिम बंगाल में भी SIR के बाद मतदाता सूची से जुड़े मामलों की अपील प्रक्रिया पर सवाल दर्ज किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने पूछा कि कुछ अपीलों को किसने अधिकृत किया और इस प्रक्रिया की जानकारी आयोग के सभी सदस्यों को किस स्तर पर दी गई। यानी विवाद का एक सिरा यह है कि किसका नाम वोटर लिस्ट में होना चाहिए, और दूसरा सिरा यह कि उस फैसले को लेने और चुनौती देने की प्रक्रिया किसके नियंत्रण में है।

इसी बीच आपके साझा किए गए “VIP/Important voter” वाले स्क्रीनशॉट ने बहस को और संवेदनशील बना दिया है। स्क्रीनशॉट में BLOs और BLO Supervisors को अपने-अपने मतदान केंद्रों पर रहने वाले “VIP/Important” मतदाताओं की सूची तैयार करने और उन्हें ERO-NET पर मैप करने का निर्देश दिखाई देता है। दूसरे संदेश में मंत्री और उनके परिवार, पार्षद, जज, वकील, नौकरशाह, IAS, IPS, मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं जैसे लोगों को चिन्हित करने की बात दिखाई देती है। हालांकि इन स्क्रीनशॉट की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हुई है, इसलिए इन्हें चुनाव आयोग का प्रमाणित आदेश नहीं कहा जा सकता। लेकिन अगर ऐसी प्रक्रिया वास्तव में आधिकारिक चुनावी तंत्र का हिस्सा है, तो उसका उद्देश्य, कानूनी आधार और डेटा के इस्तेमाल की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

क्योंकि चुनाव में VIP वोट और आम वोट की कोई अलग संवैधानिक कीमत नहीं है। मंत्री का वोट हो या मजदूर का, अधिकारी का वोट हो या छात्र का, पत्रकार का वोट हो या किसान का—पात्र मतदाता के रूप में हर वोट समान है। इसलिए किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ मतदाताओं को “VIP” या “Important” के रूप में अलग से दर्ज किया जा रहा है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुविधा है या इसका मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर कोई दूसरा प्रभाव भी पड़ता है।

अब चुनाव आयोग के जवाब को भी इसी संदर्भ में देखना जरूरी है। आयोग ने कहा है कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां किसी भी संस्था के भीतर सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324, कानून और संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत काम करता है तथा उसके पिछले एक साल के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि ECINet में डेटा सुरक्षा व्यवस्था है और ERO तथा DEO अपनी वैधानिक शक्तियों के तहत काम करते हैं।

यानी आज की तस्वीर में 2 बातें एक साथ मौजूद हैं। एक तरफ आयोग के 2 सदस्यों की 14 लिखित आपत्तियों का रिकॉर्ड सामने आया है। दूसरी तरफ आयोग कह रहा है कि ये संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए “वोट चोरी” या “देशद्रोह” जैसे गंभीर निष्कर्षों पर पहुंचने से पहले यह देखना जरूरी है कि इन आपत्तियों में उठाए गए सवालों का संस्थागत रिकॉर्ड क्या कहता है और वास्तव में कौन-से फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए।

लेकिन सवाल अब सिर्फ इतना नहीं रह गया कि “वोट चोरी हुई या नहीं?” उससे पहले का सवाल कहीं ज्यादा बुनियादी है—मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? किसके पास डेटा बदलने की शक्ति है? स्थानीय ERO और केंद्रीय डिजिटल व्यवस्था में टकराव हो तो फैसला किसका होगा? किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट जाए तो उसे वापस जोड़ने की व्यवस्था कितनी तेज और स्पष्ट है? और अगर चुनाव आयोग के भीतर ही 2 सदस्य किसी प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति दर्ज करते हैं, तो उन आपत्तियों का जवाब जनता के सामने कितना आना चाहिए?

राहुल गांधी ने इसी पूरे विवाद को “वोट चोरी” से आगे ले जाकर “देशद्रोह” का नाम दिया है। लेकिन देशद्रोह का आरोप राजनीतिक बयान और कानूनी निष्कर्ष—इन दोनों में अंतर है। अभी उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्थापित नहीं होता कि किसी चुनाव का परिणाम अवैध तरीके से बदला गया या किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में वोट चोरी की गई। इतना जरूर सामने आया है कि चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची और चुनावी डिजिटल व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल और लिखित आपत्तियां दर्ज हुई हैं।

इसलिए असली सवाल शायद यह है—क्या “वोट चोरी” की जांच सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाएगी, या उन 14 आपत्तियों का एक-एक जवाब रिकॉर्ड के साथ सामने आएगा? क्योंकि अगर वोट किसी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, तो उस वोट तक पहुंच तय करने वाली मतदाता सूची की प्रक्रिया भी पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। “वोट चोरी” सच है या राजनीतिक आरोप—यह दस्तावेज और जांच तय करेंगे। लेकिन चुनाव आयोग के भीतर उठे 14 सवालों का जवाब मिलना लोकतंत्र के भरोसे के लिए जरूरी है।

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