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नेपाल की आपदा से भारत के लिए बड़ा सबक: हिमालय में विकास हो, लेकिन खतरे को नजरअंदाज करके नहीं

ओपिनियन | डॉ. रंजीथ कृष्णन एवं डॉ. जितेंद्र भंडारी (एसोसिएट प्रोफेसर, क्राइस्ट यूनिवर्सिटी) | ABC NATIONAL NEWS | 18 सितंबर 2026

नेपाल में आई हाल की प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हमें उस सच्चाई की याद दिलाई है, जिसे विकास की चर्चा के दौरान अक्सर भुला दिया जाता है। हिमालय कोई सामान्य इलाका नहीं है। यह बहुत पुरानी और पूरी तरह स्थिर पर्वत श्रृंखला भी नहीं है, बल्कि भूगर्भीय रूप से युवा और बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। यहां पहाड़, नदियां, जंगल, ग्लेशियर और मौसम एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस इलाके में सड़कें, पुल, होटल, घर, बाजार और दूसरी निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में जब बहुत ज्यादा बारिश होती है, पहाड़ खिसकते हैं या नदियों का पानी अचानक बढ़ता है, तो नुकसान केवल एक गांव या एक सड़क तक सीमित नहीं रहता। इसका असर लोगों की जिंदगी, रोजगार, व्यापार और पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

नेपाल की यह आपदा हमें सतत विकास यानी Sustainable Development के बारे में गंभीरता से सोचने का मौका देती है। Sustainable Development Goals यानी SDGs को आम तौर पर सरकारी रिपोर्टों, अंतरराष्ट्रीय बैठकों और नीतियों में पढ़ा जाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि इन लक्ष्यों का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है। नेपाल की घटना हमें बताती है कि जलवायु, शहरों की योजना, सड़कें, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण—ये सभी अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं। एक आपदा एक साथ इन सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है।

सबसे पहले बात SDG 13 यानी Climate Action की। हर बाढ़ या भूस्खलन के लिए सीधे जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। लेकिन हिमालयी क्षेत्र में मौसम और पर्यावरण में हो रहे बदलावों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। बारिश के बदलते पैटर्न, ग्लेशियरों में बदलाव और पहाड़ी इलाकों में मौसम की बढ़ती अनिश्चितता पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही है। इसलिए अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। हमें पहले से यह समझना होगा कि कौन से इलाके ज्यादा जोखिम में हैं और वहां किस तरह का निर्माण किया जाना चाहिए।

इसके बाद आता है SDG 11 यानी Sustainable Cities and Communities। पहाड़ी इलाकों में गांव और छोटे शहर अक्सर नदियों और घाटियों के आसपास ही बसते हैं, क्योंकि वहां रहने और निर्माण के लिए जमीन सीमित होती है। सड़कें भी अक्सर इन्हीं रास्तों से होकर गुजरती हैं। पर्यटन बढ़ता है तो होटल, दुकानें और दूसरी सुविधाएं भी बनती जाती हैं। शुरुआत में यह सब विकास और रोजगार का रास्ता दिखाई देता है, लेकिन अगर निर्माण स्थानीय पर्यावरण और खतरे को ध्यान में रखकर नहीं हुआ, तो वही विकास भविष्य में जोखिम बढ़ा सकता है। नदी का रास्ता बदलने या पहाड़ का हिस्सा खिसकने पर सड़क, घर, दुकान और खेत—सब एक साथ प्रभावित हो सकते हैं।

इसी तरह SDG 9 यानी Infrastructure भी महत्वपूर्ण है। किसी इलाके में कितनी सड़कें बनीं, कितने पुल बने या कितनी बिजली परियोजनाएं शुरू हुईं, केवल इससे विकास की पूरी तस्वीर नहीं मिलती। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या ये सुविधाएं प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए तैयार हैं? अगर हर बड़ी बारिश के बाद सड़क टूट जाती है और उसे फिर से बनाना पड़ता है, तो केवल सड़क की लंबाई को विकास का पैमाना नहीं माना जा सकता। पहाड़ों में infrastructure की योजना बनाते समय उसकी मजबूती और आपदा से बचने की क्षमता को शुरुआत से ही ध्यान में रखना जरूरी है।

आपदा का असर यहीं खत्म नहीं होता। बाढ़ आने पर पीने के पानी के स्रोत और शौचालय जैसी सुविधाएं खराब हो सकती हैं। इससे SDG 6 यानी साफ पानी और स्वच्छता प्रभावित होता है। आपदा के बाद बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ता है, जो SDG 3 यानी स्वास्थ्य से जुड़ा है। पर्यटकों की संख्या कम होने पर होटल, टैक्सी, दुकान और छोटे कारोबार प्रभावित होते हैं। इससे रोजगार और स्थानीय आय पर असर पड़ता है, जो SDG 8 यानी रोजगार और आर्थिक विकास से जुड़ा है। जंगल, नदियां और पहाड़ी पर्यावरण प्रभावित हों तो SDG 15 यानी जमीन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में आ जाती है।

यही कारण है कि किसी आपदा को केवल “बाढ़” या “भूस्खलन” की घटना मानना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे और आगे कई दूसरे सवाल जुड़े होते हैं। एक तरफ लोगों की जान और घर प्रभावित होते हैं, दूसरी तरफ सड़कें, बिजली, पर्यटन, व्यापार और सरकारी बजट पर दबाव बढ़ता है। सरकार को राहत और पुनर्निर्माण पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। इसका असर दूसरी विकास योजनाओं पर भी पड़ सकता है। बार-बार होने वाली आपदाएं infrastructure को भी महंगा बना देती हैं, क्योंकि भविष्य में मजबूत निर्माण, बेहतर engineering, maintenance और insurance की जरूरत बढ़ती है।

भारत के लिए नेपाल की यह घटना और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत और नेपाल केवल पड़ोसी देश नहीं हैं। दोनों देशों के बीच नदियां, व्यापार, पर्यटन, धार्मिक यात्राएं, ऊर्जा और लोगों के बीच गहरे संबंध हैं। नेपाल से निकलने वाली या वहां से होकर आने वाली कई नदियां आगे चलकर भारत के मैदानी इलाकों में पहुंचती हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हिमालयी नदियों के व्यवहार का सीधा असर देखा जाता रहा है। नदी सीमा नहीं देखती। पहाड़ से आने वाला पानी किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रुकता नहीं है।

भारत को अपने अनुभवों से भी सीखना होगा। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों में बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़े जोखिमों ने कई बार सड़क, बिजली, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। इसलिए नेपाल में दिखाई दे रही समस्या भारत के लिए बिल्कुल नई नहीं है। असली सवाल यह है कि इन घटनाओं से हमने कितनी सीख ली है और क्या वह सीख हमारी विकास योजनाओं में दिखाई देती है।

इस पूरे मामले में SDG 17 यानी Partnerships for the Goals बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत, नेपाल और चीन के बीच राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन हिमालय और उसकी नदियां इन सीमाओं को नहीं मानतीं। इसलिए बारिश, नदी के पानी, ग्लेशियर, मौसम और संभावित आपदा से जुड़ी जानकारी को साझा करना बेहद जरूरी है। अगर ऊपर के इलाके में भारी बारिश या नदी के जलस्तर में अचानक बदलाव की जानकारी समय पर नीचे के इलाकों तक पहुंच जाए, तो लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण समय मिल सकता है। यह केवल कूटनीति का विषय नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा का भी सवाल है।

नेपाल की आपदा इसलिए SDGs के लिए एक वास्तविक परीक्षा है। सवाल यह नहीं है कि हमारी रिपोर्ट में Sustainable Development कितनी अच्छी तरह लिखा गया है। सवाल यह है कि क्या सड़क बनाते समय पहाड़ की क्षमता देखी गई? क्या होटल बनाते समय नदी का खतरा समझा गया? क्या बिजली परियोजनाओं में बदलते मौसम और नदी के व्यवहार को ध्यान में रखा गया? क्या लोगों को समय पर चेतावनी मिल सकती है?

भारत के लिए संदेश सीधा है। हिमालय में विकास रोकना समाधान नहीं है और विकास की जरूरत से इनकार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन ऐसा विकास भी सही रास्ता नहीं हो सकता जो आज सुविधा दे और कल खतरा बढ़ा दे। सड़कें बनें, रोजगार बढ़े, पर्यटन आए और बिजली परियोजनाएं विकसित हों—लेकिन इन सबके साथ पर्यावरण और आपदा के जोखिम को भी विकास की लागत का हिस्सा माना जाए।

आखिरकार SDGs की असली सफलता किसी सरकारी रिपोर्ट या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में नहीं, बल्कि उस दिन दिखाई देगी जब अगली बड़ी बारिश आएगी और कम लोग प्रभावित होंगे, infrastructure कम टूटेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पिछली आपदा की तुलना में कम नुकसान होगा। नेपाल की त्रासदी हमें यही याद दिलाती है कि हिमालय में भविष्य का विकास केवल तेज नहीं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ भी होना चाहिए।

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