राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 सितंबर 2026
मणिपुर में हिंसा के कारण विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए राहत शिविरों में मौतों की खबर पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने राहत शिविरों में रह रहे आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों यानी Internally Displaced Persons (IDPs) की सुरक्षा और उनके सम्मानजनक जीवन को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राहत शिविरों में बड़ी संख्या में हुई मौतों पर हैरानी जताई और मणिपुर के मुख्य सचिव को अदालत के सामने यह बताने का निर्देश दिया कि इन मौतों की जांच और जिम्मेदारी तय करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विशेष रूप से उन सूचनाओं का उल्लेख किया जो न्यायमूर्ति गीता मित्तल समिति की रिपोर्ट के माध्यम से सामने आई थीं। अदालत ने सवाल उठाया कि जब समिति ने राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की मौतों, जिनमें कथित तौर पर कुछ अप्राकृतिक मौतें भी शामिल थीं, से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई थी, तो उसके आधार पर अब तक महत्वपूर्ण कार्रवाई क्यों नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी से यह स्पष्ट करने को कहा कि इन मामलों में जांच, आपराधिक कार्रवाई और शिविरों में रह रहे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
अदालत की चिंता केवल मौतों की जांच तक सीमित नहीं रही। पीठ ने राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी गरिमा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया। हिंसा के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए हजारों लोग लंबे समय से राहत शिविरों में रह रहे हैं। ऐसे में शिविरों में उनकी बुनियादी जरूरतों, सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े इंतजामों को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में राज्य प्रशासन को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई कि राहत शिविरों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के साथ किसी भी स्तर पर समझौता न हो।
पीठ ने मणिपुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण यानी Manipur State Legal Services Authority को भी निर्देश दिया कि राहत शिविरों में हुई मौतों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR की जांच तेजी से आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। अदालत का निर्देश इस बात पर केंद्रित है कि यदि किसी मौत के मामले में आपराधिक पहलू सामने आता है तो जांच में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। साथ ही विस्थापित लोगों को कानूनी सहायता और उनके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय हिंसा के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा है। हिंसा के बाद बनाए गए राहत शिविरों में रहने वाले लोगों की स्थिति लगातार चिंता का विषय रही है। घर, रोजगार और सामान्य जीवन से दूर इन शिविरों में रहने वाले लोगों के सामने सुरक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और भविष्य को लेकर कई तरह की चुनौतियां रही हैं। अदालत के सामने अब विशेष रूप से यह सवाल है कि राहत शिविरों में हुई मौतों को लेकर उपलब्ध जानकारी पर प्रशासन ने किस स्तर पर कार्रवाई की और क्या जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रभावी जांच की गई।
न्यायमूर्ति गीता मित्तल समिति का उल्लेख भी इस सुनवाई को महत्वपूर्ण बनाता है। समिति ने मणिपुर में हिंसा से प्रभावित लोगों की स्थिति और राहत से जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने समिति से सामने आई मौतों की जानकारी को गंभीरता से लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है। इसका अर्थ है कि अदालत अब केवल राहत व्यवस्था की स्थिति नहीं, बल्कि उन लोगों की मौतों को लेकर प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई की स्थिति भी जानना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार के सामने अब यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी है कि राहत शिविरों में हुई मौतों की कितनी FIR दर्ज हुईं, उनमें से कितने मामलों में जांच आगे बढ़ी, किन मामलों में अप्राकृतिक मौत की आशंका सामने आई और प्रभावित परिवारों को क्या सहायता दी गई। साथ ही यह भी बताना होगा कि वर्तमान में राहत शिविरों में रह रहे लोगों की सुरक्षा के लिए क्या अतिरिक्त इंतजाम किए गए हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि हिंसा से विस्थापित लोगों की जिम्मेदारी केवल उन्हें अस्थायी आश्रय देने तक सीमित नहीं हो सकती। राहत शिविरों में रहने वाले लोग भी समान रूप से जीवन, सुरक्षा और सम्मान के अधिकार के हकदार हैं। अब निगाहें मणिपुर के मुख्य सचिव की रिपोर्ट और राज्य प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले अगले कदमों पर रहेंगी।



