ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 सितंबर 2026
जब Shark Tank India शुरू हुआ था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इस शो का एक जज खुद एक अलग तरह का ब्रांड बन जाएगा। अलग-अलग शार्क्स की अपनी शैली थी, लेकिन अशनीर ग्रोवर का अंदाज बिल्कुल अलग था। कम बोलना, सामने वाले को ज्यादा बोलने देना और फिर एक ऐसी टिप्पणी कर देना जो अगले दिन सोशल मीडिया पर मीम बन जाए—यही उनकी पहचान बन गई थी। “भाई, क्या कर रहा है तू?” जैसे उनके संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे। किसी बिजनेस आइडिया में उन्हें दम नहीं दिखता था तो वे उसे खूबसूरत शब्दों में लपेटने के बजाय सीधे अपनी राय रख देते थे। किसी को उनका अंदाज रूखा लगता था, किसी को असभ्य, लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे उनकी यही बेबाकी पसंद आती थी। शायद इसलिए Shark Tank में अशनीर की मौजूदगी सिर्फ एक जज की मौजूदगी नहीं रह गई थी, वह शो के मनोरंजन और उसकी पहचान का हिस्सा बन गई थी।
फिर अचानक कहानी बदल गई। अशनीर Shark Tank से बाहर हुए और BharatPe से भी उनका रिश्ता टूट गया। उनके आसपास विवादों का सिलसिला शुरू हुआ, आरोप लगे, जवाब आए और मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंचा। जिस व्यक्ति को करोड़ों रुपये की कंपनी और टेलीविजन की लोकप्रियता के साथ देखा जा रहा था, वह एक ऐसे दौर में पहुंच गया जहां उसे अपने कारोबारी सफर को फिर से खड़ा करना था। लेकिन यहीं उनकी कहानी दिलचस्प हो जाती है। उन्होंने खुद कहा कि कंपनी छीनी जा सकती है, टाइटल छीना जा सकता है, लेकिन स्किल और हिम्मत नहीं छीनी जा सकती। यह बात किसी मोटिवेशनल पोस्ट की लाइन भर नहीं है; उनके मौजूदा कारोबारी सफर को देखें तो इसकी झलक दिखाई देती है। 40 की उम्र के आसपास दोबारा शुरुआत करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब व्यक्ति पहले ही एक बड़ी कंपनी खड़ी कर चुका हो और सार्वजनिक विवादों का सामना कर चुका हो। लेकिन अशनीर ने फिर से शुरुआत की और 2022 में Third Unicorn की नींव रखी।
Third Unicorn का मॉडल भी उनके पिछले अनुभव से अलग दिखाई देता है। कंपनी से जुड़े CrickPe और ZeroPe जैसे fintech प्रोडक्ट्स पर उनका फोकस है और इस बार अशनीर ने बाहरी Venture Capital फंडिंग से दूरी बनाने की बात कही। स्टार्टअप की दुनिया में VC यानी Venture Capital का मतलब होता है कि निवेशक कंपनी में पूंजी लगाता है और बदले में इक्विटी या हिस्सेदारी हासिल करता है। यह मॉडल किसी भी स्टार्टअप को तेजी से बढ़ने में मदद कर सकता है, लेकिन इसके साथ संस्थापक और निवेशक के बीच कंपनी के नियंत्रण, फैसलों और भविष्य की दिशा को लेकर मतभेद की संभावना भी रहती है। BharatPe में Sequoia Capital और Coatue जैसे बड़े निवेशकों की भागीदारी रही थी और बाद में अशनीर तथा कंपनी के निवेशकों के बीच विवाद सार्वजनिक हुआ। यही अनुभव शायद Third Unicorn के मामले में उनके उस फैसले को समझने का एक संदर्भ देता है, जिसमें उन्होंने अपनी पूंजी से कंपनी बनाने की बात कही। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस रास्ते पर पहले बाहरी पूंजी का सहारा था, उस रास्ते पर इस बार वे अपनी शर्तों के साथ चलने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
अशनीर की एक खासियत यह भी रही है कि वे अपनी बात को बहुत ज्यादा राजनीतिक या कॉरपोरेट मिठास में लपेटने के लिए जाने नहीं जाते। Shark Tank में कोई आइडिया उन्हें पसंद नहीं आया तो उन्होंने कई बार सीधे कह दिया कि इसमें दम नहीं है। BharatPe के विवाद में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी लड़ाई लड़ी और कानूनी रास्ता अपनाया। अब UPI पर MDR का विवाद सामने आया तो उन्होंने एक बार फिर अपनी राय सार्वजनिक कर दी। केंद्र सरकार ने ₹2,000 से अधिक के पात्र मर्चेंट UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR की व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है, जबकि ईंधन, रेलवे, टेलीकॉम, बीमा और कुछ अन्य क्षेत्रों के लिए ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर ₹5 का फ्लैट MDR रखा गया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह ग्राहक से लिया जाने वाला UPI चार्ज नहीं है; P2P भुगतान और ₹2,000 तक के मर्चेंट भुगतान मुफ्त रहेंगे। सरकार इसे UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता, सुरक्षा और भविष्य के विस्तार से जोड़ रही है। लेकिन व्यापारी संगठनों और विपक्ष ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। पेट्रोल पंप डीलरों ने तो ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान स्वीकार नहीं करने की चेतावनी तक दी है।
इसी बहस के बीच अशनीर की सरकार पर की गई आलोचना ने फिर सुर्खियां बटोरी हैं। उनके नाम से यह दावा भी सामने आया कि अगर सुभाष चंद्रा से जुड़े ₹22,000 करोड़ के कर्ज को माफ नहीं किया गया होता तो भारत में UPI लंबे समय तक मुफ्त चल सकता था। इस दावे को उनके बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए और इसके आर्थिक आधार तथा पूरे संदर्भ की स्वतंत्र जांच जरूरी है। लेकिन इस बयान ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—आखिर भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत कौन उठाएगा? सरकार का तर्क है कि दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान प्रणालियों में से एक UPI को सुरक्षित, मजबूत और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने के लिए एक राजस्व मॉडल जरूरी है। दूसरी तरफ व्यापारी पूछ रहे हैं कि अगर ग्राहक से पैसा नहीं लिया जा रहा, तो MDR की लागत आखिरकार किसके हिस्से आएगी और छोटे मार्जिन वाले कारोबार पर उसका क्या असर पड़ेगा?
यही वह जगह है जहां अशनीर ग्रोवर की कहानी सिर्फ एक कारोबारी या Shark Tank के पूर्व जज की कहानी नहीं रह जाती। उनकी कहानी में विवाद भी हैं, आलोचनाएं भी हैं और उनके अपने फैसलों पर सवाल भी हैं। लेकिन इसके साथ एक चीज साफ दिखाई देती है—वे सार्वजनिक बहस से पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं हैं। उनके बयान सही हैं या गलत, यह तय करने का आधार उनकी लोकप्रियता या बेबाकी नहीं बल्कि तथ्य और तर्क होने चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि आज जब कारोबारी, संस्थापक और सार्वजनिक चेहरे अक्सर बेहद नपी-तुली भाषा में बोलते हैं, अशनीर का सीधे सवाल उठाने वाला अंदाज उन्हें अलग जरूर बनाता है।
आखिरकार उनकी कहानी का सबसे बड़ा सबक शायद किसी कंपनी का valuation नहीं, बल्कि वापसी की क्षमता है। एक कंपनी से अलग होना, एक लोकप्रिय टीवी शो से बाहर होना या निवेशकों से विवाद होना किसी कारोबारी सफर का अंत नहीं होता। Third Unicorn इस बात का उदाहरण है कि कोई व्यक्ति अपनी पिछली पहचान के बाद भी नई शुरुआत कर सकता है। सेटबैक आपकी कहानी का एक अध्याय हो सकता है, पूरी किताब नहीं। और शायद इसी वजह से अशनीर ग्रोवर आज फिर चर्चा में हैं—कभी Shark Tank के डायलॉग के लिए, कभी BharatPe विवाद के लिए और अब UPI जैसे राष्ट्रीय आर्थिक मुद्दे पर अपनी बेबाक राय के लिए।
कंपनी छिन सकती है, पद छिन सकता है, मंच छिन सकता है—लेकिन अगर कौशल और हिम्मत बची हो, तो वापसी का रास्ता हमेशा खुला रहता है।



