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EVM के खिलाफ वकीलों का आर-पार का ऐलान: सुप्रीम कोर्ट से जंतर-मंतर तक आंदोलन, पेपर बैलेट की वापसी की मांग

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026

EVM के खिलाफ फिर सड़क पर उतरेंगे वकील

भारत में चुनावों में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर विवाद एक बार फिर सड़क से लेकर अदालत तक पहुंचने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता महमूद प्राचा समेत कई वकीलों और नागरिक समूहों ने EVM व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है। आंदोलनकारियों की साफ मांग है कि चुनावों में पेपर बैलेट सिस्टम वापस लाया जाए और जब तक यह मांग पूरी नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रखा जाएगा। इस आंदोलन ने एक बार फिर चुनावी पारदर्शिता, मतदाता के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसे से जुड़े सवालों को सामने ला दिया है।

17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च

आंदोलन के कार्यक्रम के अनुसार 17 सितंबर को दोपहर 2 बजे सुप्रीम कोर्ट के गेट डी, दिल्ली से मार्च निकाला जाएगा। इसके बाद आंदोलन को और बड़ा रूप देने की तैयारी है। आयोजकों ने घोषणा की है कि 10 अक्टूबर से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा। यानी यह केवल एक दिन का प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि आंदोलनकारी इसे लंबी लड़ाई के रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

महमूद प्राचा लंबे समय से उठा रहे हैं EVM का मुद्दा

महमूद प्राचा “मिशन सेव कॉन्स्टिट्यूशन” के राष्ट्रीय संयोजक हैं और पिछले कई वर्षों से EVM को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रक्रिया, EVM और VVPAT से जुड़े कई मामलों में याचिकाएं दायर की हैं। इनमें पेपर बैलेट से चुनाव कराने और EVM-VVPAT की व्यापक जांच जैसी मांगें भी शामिल रही हैं। हालांकि, अदालत ने इनमें से कई मांगों को स्वीकार नहीं किया।

आंदोलनकारियों का दावा—चुनाव में पारदर्शिता जरूरी

EVM विरोधी समूहों का मुख्य तर्क है कि चुनाव जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाता को केवल वोट डालने का अधिकार ही नहीं, बल्कि अपने वोट के सही तरीके से दर्ज और गिने जाने पर भरोसा भी होना चाहिए। आंदोलनकारियों का कहना है कि “एक व्यक्ति-एक वोट” लोकतंत्र की बुनियादी भावना है और चुनावी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी भी मतदाता के मन में संदेह की गुंजाइश न रहे। वे पेपर बैलेट को इस दिशा में ज्यादा भरोसेमंद विकल्प मानते हैं।

भीड़ और चुनावी नतीजों को लेकर भी सवाल

आंदोलन से जुड़े लोगों की ओर से यह तर्क भी दिया जा रहा है कि कई चुनावों में रैलियों और जमीनी समर्थन के दिखाई देने वाले माहौल और अंतिम नतीजों के बीच बड़ा अंतर नजर आया। उनके अनुसार, ऐसे अंतर पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी चुनावी नतीजे और EVM में छेड़छाड़ के बीच संबंध साबित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होते हैं। केवल भीड़ या राजनीतिक माहौल के आधार पर EVM में गड़बड़ी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

विपक्ष पर भी आंदोलनकारियों का हमला

EVM विरोधी वकीलों का एक बड़ा आरोप विपक्षी दलों को लेकर भी है। उनका कहना है कि चुनाव हारने के बाद EVM पर सवाल उठाने वाले कई राजनीतिक दल जमीन पर इस मुद्दे को लेकर लगातार संघर्ष नहीं करते। आंदोलनकारियों का दावा है कि अब वकील, नागरिक संगठन और सिविल सोसाइटी खुद इस मुद्दे को लेकर आगे आ रहे हैं और अदालत तथा सड़क—दोनों जगह अपनी बात रखने की तैयारी कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही EVM पर दे चुका है बड़ा फैसला

हालांकि इस आंदोलन के बीच यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख EVM के खिलाफ नहीं है। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM की जगह पेपर बैलेट वापस लाने और सभी VVPAT पर्चियों की गिनती कराने की मांग को खारिज कर दिया था। अदालत ने EVM व्यवस्था को चुनाव प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाला वैध और व्यावहारिक माध्यम माना था। कोर्ट ने बिना ठोस आधार के EVM पर “ब्लाइंड डिस्ट्रस्ट”, यानी आंख बंद करके अविश्वास, को भी उचित नहीं माना।

नवंबर 2024 में भी अदालत ने याचिका ठुकराई

नवंबर 2024 में भी EVM से जुड़ी एक याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के बाद EVM पर उठने वाले आरोपों के पैटर्न पर टिप्पणी की थी। अदालत ने उस स्थिति की ओर इशारा किया था जिसमें जीतने पर EVM सही और हारने पर EVM में छेड़छाड़ की बात कही जाती है। अदालत का संदेश साफ था कि चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाने के लिए ठोस आधार और प्रमाण जरूरी हैं।

VVPAT को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा VVPAT सत्यापन व्यवस्था को भी बरकरार रखा है। अदालत ने सभी मतदान केंद्रों पर EVM के वोटों को VVPAT पर्चियों से पूरी तरह मिलाने की मांग स्वीकार नहीं की। मौजूदा व्यवस्था के तहत निर्धारित संख्या में मतदान केंद्रों पर VVPAT सत्यापन किया जाता है। चुनाव आयोग भी लगातार EVM को सुरक्षित और छेड़छाड़ से बचाने वाली व्यवस्था बताता रहा है।

अब अदालत बनाम आंदोलन नहीं, भरोसे की असली परीक्षा

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा पहलू है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का कहना है कि मौजूदा EVM-VVPAT व्यवस्था पर्याप्त सुरक्षा और सत्यापन उपलब्ध कराती है। दूसरी तरफ आंदोलनकारी वकील कह रहे हैं कि लोकतंत्र में केवल तकनीकी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, मतदाता का भरोसा भी उतना ही जरूरी है। उनका कहना है कि यदि लोगों के मन में संदेह है तो व्यवस्था को और पारदर्शी बनाने के उपाय किए जाने चाहिए।

17 सितंबर और 10 अक्टूबर पर सबकी नजर

अब 17 सितंबर का सुप्रीम कोर्ट मार्च और 10 अक्टूबर से प्रस्तावित जंतर-मंतर का अनिश्चितकालीन धरना इस पूरे विवाद को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला सकता है। आंदोलनकारी साफ कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई तब तक चलेगी जब तक पेपर बैलेट की वापसी नहीं होती। दूसरी ओर अदालत के मौजूदा फैसले और चुनाव आयोग की स्थिति EVM के पक्ष में है।

लोकतंत्र में सवाल उठाना जरूरी, लेकिन जवाब भी प्रमाण से होना चाहिए

EVM का विवाद केवल मशीन का विवाद नहीं है। यह चुनावी प्रक्रिया में भरोसे का सवाल है। लोकतंत्र में सवाल उठाने का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी गंभीर आरोप को प्रमाण के साथ सामने रखा जाए। आने वाले दिनों में असली बहस यही होगी कि क्या पेपर बैलेट वास्तव में EVM से ज्यादा पारदर्शी और सुरक्षित विकल्प है, या मौजूदा EVM-VVPAT व्यवस्था को और मजबूत बनाना ही बेहतर रास्ता है?

17 सितंबर का मार्च और 10 अक्टूबर से जंतर-मंतर का धरना अब इस सवाल को सड़क पर लेकर आने वाला है—क्या भारत के चुनावों में भरोसा EVM से बनेगा या फिर लोकतंत्र का पुराना पेपर बैलेट सिस्टम वापस आएगा?

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