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इतिहास के आईने में: नेहरू और पटेल ने कैसे जोड़ा भारत, और सावरकर कैसे बने लोकतंत्र के विरोधी

इतिहास/ शिक्षा/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026

दिसंबर 1946 में संविधान सभा की पहली बैठक हुई। कैबिनेट मिशन प्लान के अनुसार सभा में कुल 389 सदस्य थे—प्रांतों से 292, चीफ कमिश्नर प्रांतों से 4 और रियासतों के लिए 93 सीटें आरक्षित। 9 दिसंबर 1946 को जब पहली बैठक संविधान हॉल में हुई, तो रियासतों का एक भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। रियासतें संविधान सभा से दूर खड़ी थीं। उनके बिना न तो संविधान पूरा हो सकता था, न स्वतंत्र भारत।

रियासतों का भारत के करीब 40 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर कब्जा था और आबादी का लगभग एक-चौथाई से 28 प्रतिशत हिस्सा वहाँ बसता था। विभाजन में भारत ने जो खोया, रियासतों के एकीकरण से उससे कहीं ज्यादा जोड़ा गया—लगभग 5 लाख वर्ग मील क्षेत्र और 8.65 करोड़ आबादी। यह काम आसान नहीं था। ग्वालियर, कोटा, अलवर जैसी कुछ रियासतें सहयोग की ओर थीं, लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर, ट्रैवनकोर, भोपाल और इंदौर जैसी कई रियासतें स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान से जुड़ने का सपना देख रही थीं।

नेहरू की साहसिक चेतावनी

जवाहरलाल नेहरू उस समय ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष थे। उन्होंने रियासतों के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को आवाज दी और राजाओं की निरंकुशता के खिलाफ मोर्चा खोला। अप्रैल 1946 के आसपास उन्होंने साफ ऐलान किया कि जो रियासतें संविधान सभा में शामिल नहीं होंगी, उन्हें भारत का दुश्मन माना जाएगा। नेहरू रियासतों को “प्रतिक्रिया और अक्षमता के गढ़” कहते थे। उनका रुख स्पष्ट था—लोकतंत्र और एकता के बिना भारत अधूरा रहेगा। ग्वालियर सहित कई जगहों पर उनके भाषणों ने राजाओं पर दबाव बनाया।

पटेल की लौह कूटनीति

जून 1947 में स्टेट्स डिपार्टमेंट का गठन हुआ। सरदार वल्लभभाई पटेल को जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके साथ वी.पी. मेनन थे। मेनन ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन का व्यावहारिक फॉर्मूला तैयार किया—रियासतें केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार के तीन विषयों पर भारत संघ को अधिकार सौंपें। बाकी आंतरिक मामलों में स्वायत्तता का आश्वासन दिया गया।

पटेल ने साम, दान, दंड और भेद की रणनीति अपनाई। उन्होंने राजाओं से सीधी बातचीत की, उन्हें भोज पर बुलाया, और साफ चेतावनी भी दी। लॉर्ड माउंटबेटन ने भी जुलाई 1947 में प्रिंसेज चैंबर में रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने की सलाह दी। परिणाम चौंकाने वाला था। 15 अगस्त 1947 तक लगभग 562-565 रियासतों में से ज्यादातर ने एक्सेशन साइन कर लिया। केवल तीन प्रमुख रियासतें—जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर—बाकी रहीं। जूनागढ़ में जनमत और विद्रोह के बाद विलय हुआ, हैदराबाद में सितंबर 1948 में ऑपरेशन पोलो चला और जम्मू-कश्मीर में महाराजा हरि सिंह ने आक्रमण के बाद अक्टूबर 1947 में एक्सेशन साइन किया।

नेहरू ने राजनीतिक दबाव और जन आंदोलन का माहौल बनाया। पटेल ने उसे जमीन पर उतारकर प्रशासनिक एकीकरण पूरा किया। दोनों के मतभेद थे, लेकिन लक्ष्य एक था—भारत का बिखराव रोकना। पटेल को अक्सर “आयरन मैन” कहा जाता है, लेकिन नेहरू की दूरदर्शिता और दबाव के बिना यह काम इतना तेज और व्यापक नहीं हो पाता।

सावरकर का भारत-विरोधी रुख

उसी समय वी.डी. सावरकर और हिंदू महासभा का रुख बिल्कुल उलटा था। सावरकर हिंदू रियासतों को “हिंदू शक्ति के केंद्र” और “हिंदू राष्ट्र का आधार” बता रहे थे। 1944 में जयपुर के शासक को लिखे पत्र में उन्होंने खुलेआम कहा कि महासभा हिंदू राज्यों की प्रतिष्ठा, स्थिरता और शक्ति की रक्षा करेगी—कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और मुसलमानों के खिलाफ। वे रियासतों में लोकतंत्र की माँग को उनके “विनाश” के रूप में देखते थे। सुधारों की बात करते हुए भी वे राजाओं की निरंकुश सत्ता को बचाना चाहते थे।

महासभा ने कई हिंदू रियासतों से समर्थन और संसाधन लिए। अलवर, कोटा, ग्वालियर जैसी जगहों पर उनकी सक्रियता रही। सावरकर की दृष्टि में हिंदू राजा “हिंदू राज की परंपरा के रक्षक” थे। वे लोकतांत्रिक संविधान सभा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले एकीकरण के खिलाफ खड़े थे। आज उनके भक्त अखंड भारत का नारा लगाते हैं, लेकिन तब वे लोकतांत्रिक भारत के स्वरूप के ही खिलाफ थे। वे राजाओं की सत्ता को प्राथमिकता दे रहे थे, जबकि नेहरू और पटेल पूरे देश को एक लोकतांत्रिक संघ बनाने की लड़ाई लड़ रहे थे।

यह इतिहास साफ बताता है कि भारत की एकता नेहरू और पटेल की दूरदर्शिता, साहस और कूटनीति का परिणाम थी। सावरकर उस समय रियासतों की स्वायत्तता और राजाओं की शक्ति के पक्ष में खड़े थे। नेहरू-पटेल ने देश को जोड़ा, सावरकर ने उस प्रक्रिया का विरोध किया। यही इतिहास का आईना है।

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