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UPI शुल्क पर राहुल गांधी का मोदी सरकार पर बड़ा हमला: “ट्रंप के सामने लेट गए PM”, तुरंत फैसला वापस लेने की मांग

राष्ट्रीय/ राजनीति/ अर्थव्यवस्था | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026

UPI शुल्क पर राहुल गांधी ने खोला मोर्चा

₹2,000 से ज्यादा के कुछ UPI मर्चेंट लेन-देन पर 0.4% MDR लगाए जाने के फैसले को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की। कांग्रेस ने इस फैसले को अमेरिका के बढ़ते दबाव से जोड़ते हुए आरोप लगाया है कि सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में भारत के हितों से समझौता कर रही है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी पर बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने ट्रंप के सामने “लेटने और साष्टांग प्रणाम करने” का फैसला कर लिया है। राहुल का दावा है कि UPI पर लगाया जा रहा यह शुल्क भारतीयों से पैसा लेकर अमेरिका को फायदा पहुंचाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

राहुल का आरोप—भारतीयों से ‘UPI टैक्स’ क्यों?

राहुल गांधी ने अपने वीडियो में इस शुल्क को “UPI टैक्स” बताते हुए सरकार से सवाल किया कि आखिर भारतीयों से यह पैसा क्यों लिया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि अमेरिका की ओर से भारत की आर्थिक और व्यापारिक नीतियों पर दबाव बढ़ रहा है और इसी दबाव के बीच सरकार UPI जैसी घरेलू डिजिटल भुगतान व्यवस्था में बदलाव कर रही है।

हालांकि, यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है। सरकार और आरबीआई की ओर से UPI में बड़े मूल्य के मर्चेंट लेन-देन पर MDR शुरू करने के पीछे अलग तर्क दिया गया है। आरबीआई ने इसे UPI की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता और टिकाऊ व्यवस्था से जोड़ा है।

₹2,000 के ऊपर 0.4% MDR ने बढ़ाई चिंता

नई व्यवस्था में ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट UPI लेन-देन पर 0.4% MDR का प्रावधान विवाद का मुख्य कारण बना हुआ है। इसका मतलब यह है कि ₹2,500 के भुगतान पर 0.4% की दर से शुल्क ₹10 होगा, जबकि ₹5,000 के भुगतान पर यह ₹20 होगा—हालांकि वास्तविक भुगतान जिम्मेदारी और शुल्क की अंतिम व्यवस्था संबंधित नियमों पर निर्भर करेगी।

यही वह बदलाव है जिसको लेकर विपक्षी दलों के साथ-साथ कारोबारी वर्ग के कुछ लोगों ने भी सवाल उठाए हैं। चिंता यह है कि अगर व्यापारियों की भुगतान लागत बढ़ती है तो उसका असर कारोबार की लागत और आगे चलकर ग्राहकों पर पड़ सकता है।

अश्नीर ग्रोवर भी उठा चुके हैं यही सवाल

UPI शुल्क को लेकर भारतपे के पूर्व एमडी अश्नीर ग्रोवर भी सरकार से तीखे सवाल पूछ चुके हैं। उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति UPI से अपने दोस्त को ₹1 लाख भेजता है और दूसरा व्यक्ति किसी दुकानदार को QR कोड से ₹2,500 देता है, तो सिस्टम चलाने की लागत को लेकर इतना बड़ा अंतर क्यों होना चाहिए?

ग्रोवर ने RBI के सरकार को दिए गए सरप्लस, बैंकों के मुनाफे और NPCI के वित्तीय आंकड़ों का हवाला देते हुए पूछा है कि आखिर UPI व्यवस्था में ऐसा कौन-सा आर्थिक नुकसान हो रहा है जिसके लिए व्यापारी से शुल्क लिया जाना जरूरी हो गया?

वित्त समिति में भी विपक्षी सांसदों ने उठाया मुद्दा

UPI शुल्क का विवाद अब संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति तक पहुंच चुका है। बुधवार को विपक्षी सांसदों ने समिति की बैठक में इस फैसले पर चिंता जताई और इसे आम लोगों को प्रभावित करने वाला कदम बताया। समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने कहा कि कुछ सांसदों ने यह मुद्दा उठाया और इसे अगली बैठक में भी लिया जा सकता है।

इसका मतलब साफ है—UPI शुल्क पर बहस अब सिर्फ सोशल मीडिया या राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही। संसदीय स्तर पर भी इसके आर्थिक और सामाजिक असर पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस ने UPI को अमेरिका से जोड़कर सरकार को घेरा

कांग्रेस ने इस फैसले को भारत-अमेरिका संबंधों में चल रही व्यापक आर्थिक बातचीत से जोड़ दिया है। पार्टी का कहना है कि अमेरिका लगातार भारत की व्यापार और ऊर्जा नीतियों पर दबाव बना रहा है और मोदी सरकार इस दबाव के सामने झुक रही है।

कांग्रेस ने इसी संदर्भ में राहुल गांधी का पुराना राजनीतिक हमला भी याद दिलाया है और आरोप लगाया है कि सरकार अमेरिकी दबाव में भारत के डिजिटल और आर्थिक हितों से समझौता कर रही है।

लेकिन अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर UPI शुल्क और अमेरिका को किसी सीधे भुगतान के बीच संबंध स्थापित नहीं हुआ है। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है, जिसे सरकार के आधिकारिक स्पष्टीकरण और शुल्क व्यवस्था के वास्तविक वित्तीय ढांचे के साथ देखना होगा।

आरबीआई का तर्क—UPI को लंबे समय तक चलाना जरूरी

आरबीआई ने बड़े मूल्य के मर्चेंट लेन-देन पर MDR शुरू करने को UPI की दीर्घकालिक स्थिरता से जोड़ा है। यानी नियामक का तर्क यह है कि विशाल स्तर पर चल रहे डिजिटल भुगतान नेटवर्क को आर्थिक रूप से टिकाऊ रखने के लिए बड़े मूल्य के लेन-देन से जुड़ी लागत का एक मॉडल होना चाहिए।

यहीं सरकार और विपक्ष के तर्क अलग हो जाते हैं। सरकार इसे UPI को लंबे समय तक मजबूत रखने की आर्थिक व्यवस्था बता रही है, जबकि विपक्ष इसे आम जनता और व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ के रूप में देख रहा है।

RSS से जुड़े संगठन ने भी उठाए सवाल

इस विवाद की खास बात यह है कि UPI के MDR प्रस्ताव पर केवल विपक्षी दल ही सवाल नहीं उठा रहे। रिपोर्ट के अनुसार, RSS से जुड़े एक संगठन ने भी ₹2,000 से अधिक के UPI लेन-देन पर MDR का विरोध किया है।

यानी इस मुद्दे पर बहस का दायरा राजनीतिक दलों से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह साफ करे कि नई शुल्क व्यवस्था क्यों जरूरी है और इससे छोटे कारोबारियों तथा ग्राहकों पर कितना असर पड़ेगा।

क्या UPI की मुफ्त पहचान खत्म होने वाली है?

UPI की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि आम आदमी बिना अतिरिक्त भुगतान शुल्क की चिंता किए डिजिटल लेन-देन कर सकता था। अब ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट भुगतान को लेकर नई MDR व्यवस्था ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या UPI धीरे-धीरे “मुफ्त डिजिटल भुगतान” से “भुगतान की लागत वाली व्यवस्था” की तरफ बढ़ रहा है।

अगर व्यापारी पर शुल्क आता है तो वह इसे खुद वहन करेगा या ग्राहक से कीमत बढ़ाकर वसूलेगा—यह आने वाले समय का महत्वपूर्ण सवाल होगा।

राहुल गांधी की मांग—फैसला तुरंत वापस हो

राहुल गांधी ने साफ तौर पर सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। कांग्रेस इसे सिर्फ एक शुल्क का मुद्दा नहीं बल्कि आम भारतीय की जेब और भारत की डिजिटल संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बना रही है।

दूसरी ओर सरकार और आरबीआई का तर्क है कि बड़े मूल्य के मर्चेंट लेन-देन पर MDR की व्यवस्था UPI के लंबे समय तक टिकाऊ संचालन के लिए जरूरी है।

अब लड़ाई सिर्फ 0.4% की नहीं

UPI शुल्क का विवाद अब एक बड़े सवाल में बदल चुका है—भारत की सबसे सफल डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत कौन उठाएगा?

क्या इसका बोझ भुगतान कंपनियां और बैंक उठाएंगे? क्या व्यापारी इसे वहन करेंगे? क्या ग्राहक तक इसकी कीमत पहुंचेगी? और क्या सरकार यह भरोसा दिला सकती है कि छोटे कारोबारियों पर इसका अनावश्यक असर नहीं पड़ेगा?

राहुल गांधी का हमला और संसद में विपक्षी सांसदों की आपत्ति इस विवाद को और तेज कर चुकी है। अब मोदी सरकार के सामने सिर्फ 0.4% MDR को समझाने की चुनौती नहीं है—उसे यह भी बताना होगा कि UPI पर शुल्क लगाने की जरूरत क्यों पड़ी और इस फैसले का असली आर्थिक लाभ किसे मिलेगा।

जिस UPI को भारत की डिजिटल ताकत के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया, क्या अब उसी UPI की कीमत आम भारतीय और छोटा दुकानदार चुकाएगा? यही सवाल अब देश के सामने है।

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