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2016 में राहुल गांधी ने कहा था—‘Paytm मतलब Pay to Modi’… 2026 में UPI शुल्क ने फिर खड़ा कर दिया वही सवाल

ओपिनियन/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026

2016 को याद कीजिए। नोटबंदी के ठीक बाद देश को कैशलेस बनाने का जोरदार अभियान चला। सरकार डिजिटल भुगतान को भविष्य की अर्थव्यवस्था बता रही थी। उसी समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा था—“Paytm मतलब Pay to Modi।” उन्होंने पूछा था कि कैशलेस अर्थव्यवस्था से फायदा सिर्फ कुछ कंपनियों को क्यों मिलेगा, जो हर लेन-देन पर शुल्क वसूलेंगी। उस वक्त सत्ता समर्थक हलकों ने इस बयान को मजाक और राजनीतिक हमला बताकर खारिज कर दिया। लेकिन दस साल बाद तस्वीर बदल गई है।

2026 में यूपीआई के बड़े मर्चेंट लेन-देन पर एमडीआर (Merchant Discount Rate) लगाने की व्यवस्था ने एक बार फिर वही बुनियादी सवाल सामने ला दिया है—डिजिटल भुगतान की व्यवस्था में पैसा कहां से आएगा, फायदा किसे होगा और कीमत कौन चुकाएगा?

यूपीआई की सफलता के बाद अब शुल्क की बारी क्यों?

यूपीआई आज भारत की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान व्यवस्थाओं में शामिल है। चाय की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक लाखों दुकानदार क्यूआर कोड के जरिए भुगतान लेते हैं। इसे भारत की डिजिटल सफलता की कहानी के तौर पर पेश किया जाता है।

14 सितंबर 2026 को सरकार ने अधिसूचना जारी की कि ₹2,000 तक के यूपीआई लेन-देन और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। लेकिन 15 सितंबर को एनपीसीआई ने स्पष्ट किया कि 15 अक्टूबर 2026 से व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) यूपीआई लेन-देन में ₹2,000 से अधिक पर 0.4% एमडीआर लगेगा। ₹75,000 और उससे अधिक पर अधिकतम ₹300 का कैप होगा। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन जैसे क्षेत्रों में फ्लैट ₹5 शुल्क होगा। व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेन-देन पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। छोटे व्यापारी (मासिक ₹1 लाख तक यूपीआई क्यूआर) भी छूट में रहेंगे।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ऐसे बड़े मर्चेंट लेन-देन संख्या में करीब 4 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल मूल्य में उनका हिस्सा लगभग 65-66 प्रतिशत तक हो सकता है। यानी संख्या छोटी है, लेकिन जिस हिस्से पर शुल्क लग रहा है उसमें पैसा बहुत बड़ा है। यहीं से असली सवाल पैदा होता है—जिस यूपीआई को मुफ्त और आसान बनाकर करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान की आदत डाली गई, अब उसी व्यवस्था की लागत का बोझ बड़े व्यापारियों पर क्यों डाला जा रहा है?

अश्नीर ग्रोवर ने सरकार से सीधा सवाल पूछा

भारतपे के पूर्व सह-संस्थापक अश्नीर ग्रोवर ने इस मुद्दे पर बेहद सीधा सवाल पूछा है। उन्होंने कहा—“मैंने दोस्त को 1 लाख यूपीआई किया, कोई पैसा नहीं लगेगा। मैंने एक दुकानदार को 2,500 पेमेंट किया, उसके पैसे लगेंगे? इसका क्या लॉजिक है?”

उन्होंने रिजर्व बैंक के सरप्लस (लगभग ₹2.87 लाख करोड़), सूचीबद्ध बैंकों के मुनाफे (लगभग ₹4.11 लाख करोड़) और एनपीसीआई के प्री-टैक्स सरप्लस (लगभग ₹1,888 करोड़) का हवाला देते हुए पूछा कि जब डिजिटल भुगतान का तंत्र घाटे में नहीं दिखता, तो दुकानदारों से शुल्क लेने की जरूरत क्यों? उन्होंने इसे टैक्स कलेक्शन जैसा बताया और चेतावनी दी कि शुल्क लगने से लोग कैश की ओर लौट सकते हैं।

सरकार कहती है कि ग्राहक से सीधे पैसा नहीं लिया जाएगा और व्यापारी शुल्क ग्राहक पर नहीं डाल सकेंगे। लेकिन व्यापार की सामान्य अर्थव्यवस्था में कोई भी नया खर्च लागत बनता है। कीमत बढ़ सकती है, मुनाफा घट सकता है या व्यापारी भुगतान के दूसरे विकल्पों को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए सरकार को यह बताना चाहिए कि मर्चेंट पर पड़ने वाली लागत का अंतिम असर छोटे कारोबारियों और ग्राहकों पर किस तरह पड़ सकता है।

राहुल गांधी का 2016 वाला सवाल आज और बड़ा क्यों दिख रहा है?

यही वह जगह है जहां राहुल गांधी का पुराना बयान फिर चर्चा में आता है। 2016 में वे डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल और उससे जुड़े कारोबारी हितों पर सवाल उठा रहे थे। आज वही बहस यूपीआई के स्तर पर पहुंच गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब डिजिटल भुगतान विस्तार के दौर में था और आज यूपीआई करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। इसलिए आज जब शुल्क की बात होती है तो सवाल सिर्फ किसी एक कंपनी या ऐप का नहीं रह जाता। सवाल पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था के मॉडल का हो जाता है।

राहुल गांधी की हर बात को सही साबित करना जरूरी नहीं, लेकिन उन्होंने जिस तरह सत्ता की चमकदार नीतियों के पीछे छिपे आर्थिक सवालों को उठाया, उस भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि, लेकिन जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए

मोदी सरकार यूपीआई को अपनी बड़ी डिजिटल उपलब्धियों में गिनाती रही है। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर बदलाव किया है। लेकिन लोकतंत्र में किसी सरकार की उपलब्धि आलोचना से ऊपर नहीं होती। जितनी बड़ी उपलब्धि, उतनी बड़ी पारदर्शिता जरूरी होती है।

अगर सरकार यूपीआई को डिजिटल इंडिया की सफलता बताती है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि इसके संचालन की वास्तविक लागत कितनी है, कौन उसका भुगतान कर रहा है और प्रस्तावित एमडीआर से किसे कितना फायदा होगा। उपलब्धि का श्रेय सरकार ले सकती है तो लागत और नीति का हिसाब भी सरकार को ही देना होगा।

2,000 रुपये की सीमा पर भी पूरा जवाब चाहिए

अगर ₹2,000 तक का मर्चेंट भुगतान बिना एमडीआर के हो सकता है और उससे ऊपर शुल्क लगाने की जरूरत पड़ती है, तो इस सीमा के पीछे आर्थिक गणना क्या है? क्या ₹1,999 के भुगतान में डिजिटल व्यवस्था पर कोई लागत नहीं आती और ₹2,001 में अचानक लागत बढ़ जाती है? नीति का बचाव भाषण से नहीं, आंकड़ों से होना चाहिए।

UPI किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपीआई को किसी राजनीतिक पार्टी की निजी उपलब्धि की तरह नहीं देखा जा सकता। इसे करोड़ों भारतीय इस्तेमाल करते हैं। यह जनता की सुविधा है, व्यापारियों का माध्यम है और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इसके शुल्क मॉडल पर फैसला भी पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।

किससे शुल्क लिया जाएगा? कितना लिया जाएगा? किस संस्था को मिलेगा? उसका इस्तेमाल कहां होगा? क्या छोटे कारोबारियों पर कोई सीमा या राहत होगी? क्या इस शुल्क का बोझ भविष्य में ग्राहक तक पहुंचेगा? इन सभी सवालों के जवाब जरूरी हैं।

2016 में राहुल गांधी ने कहा था—“Paytm मतलब Pay to Modi।” तब इसे हंसी में उड़ा दिया गया। 2026 में यूपीआई शुल्क की बहस ने डिजिटल भुगतान और उससे जुड़े आर्थिक हितों को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। आज अश्नीर ग्रोवर जैसे कारोबारी खुले तौर पर पूछ रहे हैं कि 1 लाख रुपये दोस्त को भेजने पर शुल्क नहीं, लेकिन 2,500 रुपये दुकानदार को देने पर शुल्क क्यों?

दूरदर्शिता का मतलब यह नहीं कि किसी नेता की हर बात भविष्यवाणी बन जाए। दूरदर्शिता का मतलब है कि जब सत्ता किसी नीति का उत्सव मना रही हो, तब भी कोई यह पूछे कि इसका दूसरा पहलू क्या है? अब सरकार को भाषण नहीं, पूरा हिसाब देना चाहिए। यूपीआई को मजबूत करना है—कीजिए। साइबर सुरक्षा बढ़ानी है—कीजिए। लेकिन अगर इसके लिए व्यापारियों से शुल्क लेना जरूरी बताया जा रहा है, तो सरकार को पूरा आर्थिक हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए।

‘डिजिटल इंडिया’ की कीमत कौन चुकाएगा?

अगर यूपीआई सचमुच भारत की डिजिटल ताकत है, तो इसे ऐसा मॉडल बनना चाहिए जिसमें तकनीक का फायदा जनता और कारोबारियों को मिले, न कि धीरे-धीरे उसकी लागत उन्हीं पर डाली जाए।

2016 में राहुल गांधी ने सवाल पूछा था—फायदा किसका? 2026 में अश्नीर ग्रोवर पूछ रहे हैं—2,500 रुपये के भुगतान पर दुकानदार से पैसा क्यों? और अब सवाल देश पूछ रहा है—अगर यूपीआई इतना सफल है तो उसकी कीमत दुकानदार से क्यों? जो अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों पर ही पड़ेगी।

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