अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 सितंबर 2026
अमेरिका और कनाडा के बीच चल रहे व्यापार विवाद ने भारत के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अमेरिका के साथ बड़े व्यापारिक समझौते करते समय भारत को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है? द हिंदू के संपादकीय में अमेरिका-कनाडा के रिश्तों में पैदा हुए तनाव को भारत के लिए चेतावनी के रूप में देखा गया है। संदेश साफ है—अमेरिका के साथ व्यापार करना जरूरी हो सकता है, लेकिन किसी भी समझौते में एकतरफा निर्भरता से बचना और अपने हितों की सुरक्षा करना उतना ही जरूरी है।
कनाडा से भारत क्या सीख सकता है?
अमेरिका और कनाडा लंबे समय से बेहद करीबी व्यापारिक साझेदार रहे हैं। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। लेकिन इसके बावजूद व्यापार, शुल्क और आर्थिक नीतियों को लेकर तनाव ने यह दिखाया है कि करीबी रिश्ता होने का मतलब यह नहीं कि व्यापारिक हितों में हमेशा समानता बनी रहेगी। जब किसी बड़े देश के पास आर्थिक दबदबा ज्यादा हो, तो वह अपने हितों के मुताबिक शर्तें बदलने की कोशिश कर सकता है। यही वह बिंदु है, जहां भारत को कनाडा के अनुभव से सबक लेने की जरूरत बताई जा रही है।
अमेरिका से दोस्ती अलग, व्यापारिक हित अलग
भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और व्यापार जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। लेकिन विदेश नीति और व्यापार में सिर्फ दोस्ती के भरोसे फैसले नहीं लिए जा सकते। हर समझौते में भारत का अपना आर्थिक हित सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर किसी क्षेत्र में भारत किसी एक देश पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाता है, तो भविष्य में वही निर्भरता दबाव का कारण बन सकती है।
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल—डील किसके फायदे की?
भारत को अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौतों में यह देखना होगा कि उनसे भारतीय उद्योग, किसान, रोजगार और घरेलू बाजार को क्या फायदा मिलेगा। सिर्फ निवेश, बाजार पहुंच या बड़े आंकड़ों को देखकर समझौता करना पर्याप्त नहीं होगा। किस क्षेत्र में भारत क्या दे रहा है, बदले में क्या हासिल कर रहा है और भविष्य में अगर अमेरिका अपनी नीति बदलता है तो भारत के पास विकल्प क्या होंगे—इन सवालों का जवाब पहले से होना चाहिए।
भारत को अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत रखने के साथ-साथ यूरोप, रूस, पश्चिम एशिया और दूसरे बड़े बाजारों के साथ भी संतुलित आर्थिक संबंध बनाए रखने होंगे। यही रणनीति भारत को किसी एक देश के फैसलों से होने वाले बड़े झटके से बचा सकती है।
सबक सीधा है—दोस्ती में भी अपने हित पहले
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों में से एक है और भारत के लिए उसके साथ मजबूत संबंध महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मजबूत रिश्ता तभी टिकाऊ होता है, जब दोनों देशों के हितों का संतुलन बना रहे। भारत को अमेरिका से टकराव नहीं, लेकिन आंख बंद करके निर्भरता भी नहीं चाहिए।
अब असली सवाल यही है—क्या भारत अमेरिका के साथ होने वाली हर बड़ी डील में अपने दीर्घकालिक हितों, घरेलू उद्योग और रणनीतिक स्वतंत्रता को पर्याप्त महत्व दे रहा है? क्योंकि कनाडा का अनुभव यही याद दिलाता है कि बड़े साझेदार के साथ समझौता करते समय भरोसा जरूरी है, लेकिन अपने हितों की सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है।



