राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | लद्दाख | 11 सितंबर 2026
लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर केंद्र सरकार ने फिलहाल साफ कर दिया है कि न तो लद्दाख को राज्य बनाया जाएगा और न ही विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया जाएगा। इसके बदले लद्दाख के लिए संविधान के तहत एक ऐसी नई और अनोखी चुनी हुई संस्था बनाने की तैयारी है, जिसका मॉडल देश में कहीं और नहीं है। लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने कहा कि इस नई संस्था के पास कानून बनाने, प्रशासन चलाने और वित्तीय फैसले लेने की शक्तियां होंगी। हालांकि इस संस्था का नाम क्या होगा और इसकी पूरी व्यवस्था कैसी होगी, यह अभी तय नहीं हुआ है।
राज्य नहीं, लेकिन अधिकार जरूर मिलेंगे!
सरकार की योजना को आसान भाषा में समझें तो लद्दाख में एक ऐसी चुनी हुई व्यवस्था बनाने की बात हो रही है, जो स्थानीय लोगों को ज्यादा अधिकार देगी। इसमें जनता के प्रतिनिधि चुने जाएंगे और उन्हें कानून, प्रशासन तथा वित्त से जुड़े फैसलों में अधिकार मिलेंगे। लेकिन यह व्यवस्था राज्य सरकार जैसी नहीं होगी और न ही इसमें सामान्य विधानसभा होगी। मुख्य सचिव ने साफ कहा है कि लद्दाख के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया जाएगा, जो देश में अभी कहीं मौजूद नहीं है। यानी राज्य का दर्जा नहीं, लेकिन स्थानीय लोगों को ज्यादा राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार देने की कोशिश जरूर हो रही है।
लद्दाख के नेताओं ने बैठक पर ही उठाए सवाल!
सबसे बड़ा विवाद अब इसी नई व्यवस्था को लेकर है। गृह मंत्रालय और लद्दाख के नेताओं के बीच इस प्रस्ताव पर बातचीत हुई, लेकिन बैठक के बाद कुछ लद्दाखी नेताओं और नागरिक संगठनों ने इसे ‘समय और पैसे की बर्बादी’ तक बता दिया। उनका सवाल सीधा है—जब राज्य का दर्जा नहीं देना है और विधानसभा भी नहीं देनी है, तो नई संस्था के पास मिलने वाले अधिकार आखिर कितने प्रभावी होंगे? लद्दाख के नेताओं का यह भी कहना है कि केंद्र के गृह मंत्रालय और लद्दाख प्रशासन की सोच में पूरी तरह तालमेल नजर नहीं आ रहा। ऐसे में जिस नई व्यवस्था को समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है, उस पर सवाल अभी से उठने लगे हैं।
अब असली सवाल—ताकत कितनी मिलेगी?
लद्दाख के लिए बनने वाली नई व्यवस्था की असली परीक्षा उसके नाम या ढांचे से नहीं, बल्कि उसकी ताकत से होगी। क्या चुने हुए प्रतिनिधि स्थानीय विकास, जमीन, रोजगार, प्रशासन और वित्त से जुड़े बड़े फैसले खुद ले सकेंगे? क्या उनके फैसलों को वास्तविक अधिकार मिलेगा या अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार और प्रशासन के पास ही रहेगा? अगर नई संस्था को कानून बनाने और वित्तीय फैसले लेने की शक्ति दी जाएगी, तो उसकी सीमाएं क्या होंगी? और सबसे अहम सवाल—लद्दाख के लोगों की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक मांगों का यह मॉडल कितना समाधान कर पाएगा?
अब केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नई व्यवस्था बनाना नहीं, बल्कि लद्दाख के लोगों को यह भरोसा दिलाना है कि यह व्यवस्था उनके अधिकारों को सच में मजबूत करेगी। क्योंकि अगर नाम और ढांचा नया हो, लेकिन असली ताकत पहले जैसी ही रहे, तो सवाल उठना तय है—क्या यह लद्दाख की मांग का वास्तविक समाधान है, या राज्यhood की मांग को टालने का एक नया रास्ता?



