राष्ट्रीय/ आस्था/ पश्चिम बंगाल | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 7 सितंबर 2026
दुर्गा पूजा के पंडालों में अब क्या खाया जाए?
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा शुरू होने से पहले ही खाने को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विभिन्न हिंदू संगठनों और धार्मिक प्रचारकों की ओर से दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन को दूर रखने और केवल शाकाहारी भोजन परोसने की अपील की जा रही है। मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि बंगाल की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में पूजा पंडालों के आसपास खाने-पीने को लेकर किसी तरह की नई पाबंदी या अपील ने धार्मिक आस्था, परंपरा और व्यक्तिगत खान-पान की पसंद को लेकर बहस तेज कर दी है।
विश्व हिंदू परिषद की सलाह के बाद धीरेंद्र शास्त्री की अपील
इस विवाद की शुरुआत 26 अगस्त को विश्व हिंदू परिषद की एक सलाह से हुई। संगठन ने कहा था कि दुर्गा पूजा की पवित्रता बनाए रखने के लिए पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन नहीं रखा जाना चाहिए। इस सलाह को लेकर बहस चल ही रही थी कि रविवार को बागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भी इसी तरह की अपील कर दी। इसके बाद बंगाल में इस मुद्दे पर चर्चा और तेज हो गई है। समर्थक इसे धार्मिक स्थल की मर्यादा से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि विरोध करने वालों का सवाल है कि पूजा पंडालों के आसपास खाने की पसंद तय करने का अधिकार आखिर किसके पास होना चाहिए।
बंगाल की परंपरा में खान-पान का सवाल इतना संवेदनशील क्यों?
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की अपनी अलग सांस्कृतिक परंपराएं हैं और यहां धार्मिक आयोजन के साथ भोजन भी सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यही वजह है कि शाकाहारी और मांसाहारी भोजन को लेकर कोई भी अपील केवल खाने का मुद्दा नहीं रह जाती, बल्कि वह परंपरा, धार्मिक भावना और सामाजिक स्वतंत्रता से जुड़ी बहस में बदल जाती है। सवाल यह है कि क्या किसी विशेष पूजा स्थल के आसपास आयोजक अपनी व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भोजन को लेकर नियम बना सकते हैं? अगर किसी पंडाल की प्रबंधन समिति ऐसा निर्णय लेती है तो उसकी अपनी व्यवस्था हो सकती है, लेकिन क्या पूरे राज्य में एक समान सामाजिक नियम लागू होना चाहिए—यही बहस का मूल सवाल बन गया है।
क्या आस्था के नाम पर खान-पान भी तय होगा?
इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि धार्मिक आयोजन की पवित्रता बनाए रखने और लोगों की व्यक्तिगत पसंद के बीच संतुलन कहां बनेगा? किसी मंदिर या पूजा परिसर के भीतर आयोजकों द्वारा विशेष नियम बनाए जाने की परंपरा अलग बात है, लेकिन पंडालों के आसपास सार्वजनिक जगहों पर क्या खाया जाए, इसे लेकर व्यापक अपील करना अलग विषय है। बंगाल में दुर्गा पूजा लाखों लोगों को एक साथ जोड़ती है और अलग-अलग समुदायों, परिवारों और खान-पान की परंपराओं वाले लोग इसमें हिस्सा लेते हैं। इसलिए इस बहस में धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी जरूरी है और यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी की व्यक्तिगत खान-पान की पसंद को लेकर सामाजिक टकराव पैदा न हो।
सियासत और धर्म के बीच फंसी बंगाल की पूजा
दुर्गा पूजा के आसपास खान-पान का यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब बंगाल में धर्म और राजनीति पहले से ही बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं। यही वजह है कि धार्मिक संगठनों की अपील को केवल भोजन से जुड़ा मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और राजनीतिक असर पर भी चर्चा हो रही है। समर्थक इसे पूजा की गरिमा और धार्मिक अनुशासन का विषय बता रहे हैं, जबकि आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या धार्मिक आस्था की रक्षा के लिए लोगों की खाने की आदतों पर भी दबाव बनाया जाना चाहिए?
फैसला पंडाल का हो या पूरे समाज का?
यह अपील है, कोई ऐसी राज्यव्यापी सरकारी पाबंदी नहीं बताई गई है जिसके तहत पूरे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन पर रोक लगा दी गई हो। इसलिए इस मुद्दे को अपील और विवाद के रूप में देखना जरूरी है, न कि किसी लागू सरकारी प्रतिबंध के रूप में। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दुर्गा पूजा समितियां इन अपीलों पर क्या रुख अपनाती हैं और राज्य सरकार इस बहस को किस तरह देखती है। आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पंडाल के पास क्या खाया जाए—सवाल यह भी है कि धार्मिक आस्था, परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बंगाल किस तरह संतुलन बनाएगा।



