राष्ट्रीय | मोबनी मजूमदार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 सितंबर 2026
फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान में 4 अगस्त को जो हुआ, उसने विमान सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 36 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा एयरबस ए320 नियो अचानक ऊंचाई खोने लगा और करीब 300 फीट नीचे चला गया। इस दौरान विमान में सवार कम से कम 24 लोग घायल हुए। अब विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो यानी एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद घटना की तस्वीर कुछ साफ हुई है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक विमान के तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम सिर्फ चार सेकंड के भीतर बंद हो गए और कुछ ही सेकंड बाद दोबारा काम करने लगे। यही बात विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है—आखिर तीन अलग-अलग सिस्टम इतनी तेजी से एक साथ कैसे बंद हुए और फिर इतनी जल्दी वापस कैसे चालू हो गए?
चार सेकंड में तीनों सिस्टम बंद, फिर अचानक चालू
एएआईबी की रिपोर्ट के अनुसार विमान के फ्लाइट-कंट्रोल सिस्टम ने सुबह 9 बजकर 32 मिनट 43 सेकंड पर ग्रीन हाइड्रोलिक सिस्टम में खराबी दर्ज की। सिर्फ चार सेकंड बाद, यानी 9:32:47 बजे, ब्लू और येलो हाइड्रोलिक सिस्टम भी बंद हो गए। इसके बाद ऑटोपायलट अलग हो गया और लगातार चेतावनी की आवाज आने लगी। कुछ ही सेकंड बाद विमान की ऊंचाई में तेज बदलाव हुआ। विमान अपनी निर्धारित 36 हजार फीट की ऊंचाई से पहले करीब 372 फीट ऊपर गया और फिर करीब 292 फीट नीचे आया। इसके बाद ब्लू सिस्टम वापस चालू हुआ और कुछ सेकंड में येलो तथा ग्रीन सिस्टम भी काम करने लगे। सिस्टम के वापस आने के बाद विमान के नियंत्रण सामान्य स्थिति में लौट आए।
सबसे बड़ा सवाल—तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम एक साथ क्यों फेल हुए?
यही इस पूरी घटना की सबसे बड़ी पहेली है। पूर्व पायलट कैप्टन शरथ पणीकर ने सवाल उठाया है कि अगर तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम एक-दूसरे से अलग काम करते हैं, तो वे सिर्फ चार सेकंड के अंतर में कैसे बंद हो गए? उनके अनुसार तीनों सिस्टम के फेल होने की स्थिति बेहद गंभीर होती है, क्योंकि विमान के नियंत्रण से जुड़े हिस्सों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। एक अन्य पायलट ने भी सवाल उठाया कि एयरबस की सामान्य ट्रेनिंग में ऐसी स्थिति के लिए विशेष तैयारी नहीं होती, क्योंकि एक साथ तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम के फेल होने जैसी परिस्थिति सामान्य संचालन में बेहद असामान्य मानी जाती है।
यानी असली सवाल यह नहीं है कि सिस्टम फेल हुए या नहीं, क्योंकि रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है। असली सवाल यह है कि पहला सिस्टम क्यों बंद हुआ और उसके सिर्फ चार सेकंड बाद बाकी दोनों सिस्टम क्यों बंद हो गए? अगर इस सवाल का जवाब नहीं मिलता तो घटना की जड़ तक पहुंचना मुश्किल रहेगा।
दूसरा बड़ा सवाल—दिल्ली तक ही क्यों उड़ता रहा विमान?
घटना के बाद विमान के चालक दल ने स्थिति का आकलन किया और दिल्ली जाने का फैसला किया। लेकिन विमानन विशेषज्ञों ने इस फैसले पर भी सवाल उठाए हैं। जब विमान में लोग घायल हो चुके थे, कुछ यात्रियों को चोटें आई थीं और विमान के फ्लाइट-कंट्रोल सिस्टम में गंभीर समस्या सामने आ चुकी थी, तो सवाल उठता है कि क्या विमान को दिल्ली के बजाय रास्ते में किसी नजदीकी हवाई अड्डे पर उतारना ज्यादा सुरक्षित विकल्प हो सकता था?
एक पायलट ने सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कोलकाता या भुवनेश्वर जैसे नजदीकी विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया गया। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय विमान के चालक दल के पास मौसम, विमान की स्थिति, ईंधन, रनवे, चिकित्सा सुविधा और अन्य कई चीजों की जानकारी होती है। इसलिए केवल बाद में देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि फैसला निश्चित रूप से गलत था। जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही होना चाहिए कि उस समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर दिल्ली जाना कितना उचित था।
तीसरा सवाल—विमान अचानक ऊपर गया और फिर नीचे क्यों आया?
रिपोर्ट ने घटना की समय-रेखा तो सामने रख दी है, लेकिन विमान की इस अचानक और तेज ऊंचाई बदलने की पूरी वजह अभी स्पष्ट नहीं की है। विमान पहले अपनी तय ऊंचाई से करीब 372 फीट ऊपर गया और फिर करीब 292 फीट नीचे आया। इस दौरान स्टॉल की चेतावनी भी सक्रिय हुई। लेकिन आखिर विमान की गति और ऊंचाई में इतनी तेज हलचल क्यों हुई?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर यानी सीवीआर की पूरी जानकारी और पायलट के नियंत्रण संबंधी इनपुट सामने नहीं आते, तब तक इस सवाल का अंतिम जवाब देना मुश्किल है। जांचकर्ताओं को यह भी देखना होगा कि पायलट ने उस समय विमान को नियंत्रित करने के लिए क्या इनपुट दिए और विमान ने उसके जवाब में कैसी प्रतिक्रिया दी।
क्या एएआईबी की रिपोर्ट ने जवाब से ज्यादा सवाल पैदा कर दिए?
प्रारंभिक रिपोर्ट का उद्देश्य अंतिम निष्कर्ष देना नहीं होता। इसका काम घटना में क्या-क्या हुआ, इसकी शुरुआती तस्वीर सामने रखना होता है। इसलिए यह जरूरी है कि रिपोर्ट में किसी तकनीकी कारण को अंतिम कारण मानने की जल्दबाजी न की जाए। जांच एजेंसी ने विमान से हाइड्रोलिक हिस्से और तरल पदार्थ के नमूने लिए हैं। ईंधन और तेल के नमूनों की भी जांच की जा रही है। विमान के रखरखाव से जुड़े रिकॉर्ड, संचालन संबंधी दस्तावेज और दिल्ली तथा कोलकाता के हवाई यातायात नियंत्रण से जुड़े आंकड़ों की भी जांच हो रही है।
यानी अभी जांच अधूरी है और अंतिम निष्कर्ष आने बाकी हैं।
घटना कुछ सेकंड की थी, लेकिन सवाल बहुत लंबे समय तक रहेंगे
इस पूरे मामले की सबसे डरावनी बात यही है कि पूरी घटना कुछ ही सेकंड में हुई। पहले ग्रीन हाइड्रोलिक सिस्टम में समस्या आई, चार सेकंड बाद ब्लू और येलो सिस्टम भी बंद हुए, ऑटोपायलट अलग हुआ, चेतावनी शुरू हुई, विमान की ऊंचाई तेजी से बदली और फिर सिस्टम एक-एक करके वापस काम करने लगे। इतनी तेजी से घटनाएं हुईं कि चालक दल के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम समय रहा होगा।
लेकिन विमान सुरक्षा में अक्सर यही कुछ सेकंड सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अगर किसी तकनीकी समस्या की असली वजह समय रहते पता चल जाए तो भविष्य में उसे रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। इसलिए इस मामले में किसी एक व्यक्ति या चालक दल को जिम्मेदार ठहराने से ज्यादा जरूरी है कि तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम के एक साथ फेल होने की असली वजह सामने आए।
अब जांच की असली परीक्षा शुरू
इस घटना में सबसे जरूरी बात यह है कि जांच सिर्फ यह बताकर खत्म न हो कि विमान के सिस्टम बंद हुए और फिर चालू हो गए। यह पता लगाना होगा कि वे बंद क्यों हुए, इतनी तेजी से तीनों क्यों बंद हुए, विमान की ऊंचाई इतनी तेजी से क्यों बदली और कुछ ही सेकंड में सिस्टम फिर कैसे सामान्य हो गए। साथ ही यह भी साफ होना चाहिए कि उस समय चालक दल के पास कौन-कौन से विकल्प थे और दिल्ली तक उड़ान जारी रखने का फैसला किन परिस्थितियों में लिया गया।
एक विमान 36 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा हो और कुछ ही सेकंड में उसके तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम बंद हो जाएं, तो इसे सामान्य तकनीकी घटना मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। अंतिम जांच रिपोर्ट को इन सवालों का साफ और तकनीकी जवाब देना ही होगा। क्योंकि विमान में बैठे यात्रियों के लिए वे चार सेकंड सिर्फ आंकड़े नहीं थे—वे उनकी जिंदगी के सबसे खतरनाक कुछ सेकंड थे।




