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श्रीकृष्ण जयंती की शोभायात्रा पर सियासी संग्राम, पी. जयराजन बोले—आरएसएस के राजनीतिक विस्तार की योजना का हिस्सा

सीपीआई(एम) नेता का आरोप—केरल की सड़कों पर पहले मुख्य रूप से श्री नारायण गुरु की जयंती के जुलूस दिखाई देते थे, श्रीकृष्ण जयंती के जुलूसों का विस्तार राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश

राष्ट्रीय | पलक राज | एबीसी नेशनल न्यूज़ | कन्नूर | 5 सितंबर 2026

श्रीकृष्ण जयंती के जुलूस पर जयराजन का बड़ा बयान

केरल में श्रीकृष्ण जयंती के मौके पर निकलने वाली शोभायात्राओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सीपीआई(एम) नेता पी. जयराजन ने आरोप लगाया है कि राज्य में श्रीकृष्ण जयंती के जुलूसों का विस्तार आरएसएस के राजनीतिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। उनके अनुसार इन आयोजनों के जरिए आरएसएस राज्य के परिवारों और समाज के अलग-अलग हिस्सों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। जयराजन ने यह टिप्पणी कन्नूर में की और इसके साथ उन्होंने केरल में धार्मिक-सामाजिक आयोजनों के बदलते स्वरूप को लेकर भी सवाल उठाया।

‘पहले श्री नारायण गुरु के जुलूस दिखाई देते थे’

जयराजन ने कहा कि केरल की सड़कों पर पहले इस तरह के धार्मिक जुलूसों के बजाय श्री नारायण गुरु की जयंती यानी ‘चथया दिनम’ के अवसर पर निकलने वाली शोभायात्राएं प्रमुख रूप से दिखाई देती थीं। उनके मुताबिक समय के साथ श्रीकृष्ण जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाले जुलूसों का विस्तार हुआ है। उन्होंने इस बदलाव को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में देखने के बजाय इसके पीछे मौजूद सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई।

आरएसएस पर राजनीतिक आधार बढ़ाने का आरोप

सीपीआई(एम) नेता का आरोप है कि श्रीकृष्ण जयंती के कार्यक्रमों के माध्यम से आरएसएस परिवारों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने और राजनीतिक आधार तैयार करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यह जयराजन का राजनीतिक आरोप और उनका आकलन है, इसे आरएसएस की ओर से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता। केरल में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग विचार रहे हैं और श्रीकृष्ण जयंती के जुलूस भी इसी व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए हैं।

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धर्म, संस्कृति और राजनीति के बीच खींचतान

केरल में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का राजनीतिक प्रभाव कोई नया विषय नहीं है। अलग-अलग संगठन और राजनीतिक दल ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं। जयराजन का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण जयंती के जुलूसों को सीधे आरएसएस की राजनीतिक रणनीति से जोड़ दिया है। दूसरी तरफ, ऐसे आयोजनों में शामिल लोगों के लिए ये कार्यक्रम धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए सवाल यह भी है कि किसी धार्मिक आयोजन को केवल राजनीतिक नजरिए से देखा जाए या उसके सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू को भी समान महत्व दिया जाए।

केरल की राजनीति में धार्मिक आयोजनों की बढ़ती भूमिका

केरल की राजनीति में धर्म, सामाजिक सुधार आंदोलनों और समुदाय आधारित संगठनों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। श्री नारायण गुरु का सामाजिक सुधार आंदोलन राज्य के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी वजह से जयराजन ने श्रीकृष्ण जयंती के जुलूसों की तुलना श्री नारायण गुरु की जयंती के आयोजनों से की। उनका तर्क है कि सड़कों पर होने वाले सार्वजनिक आयोजनों का स्वरूप समय के साथ बदला है और इस बदलाव को राजनीतिक संगठनों की बढ़ती सक्रियता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

जयराजन के बयान से बढ़ सकती है राजनीतिक बहस

श्रीकृष्ण जयंती के जुलूसों को आरएसएस के राजनीतिक विस्तार से जोड़ने वाला यह बयान आने वाले दिनों में केरल की राजनीति में बहस को और तेज कर सकता है। खासकर ऐसे समय में जब राज्य में भाजपा और आरएसएस अपनी राजनीतिक तथा सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, सीपीआई(एम) की ओर से धार्मिक आयोजनों को लेकर इस तरह का सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि जयराजन के आरोपों पर आरएसएस या भाजपा की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनके पक्ष को शामिल किए बिना इस आरोप को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

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असल सवाल—आस्था या राजनीति?

जयराजन के बयान ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या श्रीकृष्ण जयंती के बढ़ते जुलूस केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का विस्तार हैं या इनके पीछे राजनीतिक संगठन भी अपना सामाजिक आधार मजबूत कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूह अपने नजरिए से देंगे। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केरल में श्रीकृष्ण जयंती के सार्वजनिक आयोजनों को लेकर अब धार्मिक आस्था के साथ-साथ राजनीति की बहस भी जुड़ गई है। सीपीआई(एम) नेता का आरोप इसी राजनीतिक टकराव को सामने लाता है।

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