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गिद्धों पर मंडराता नया खतरा: विकास की बिजली कहीं प्रकृति की सफाई व्यवस्था को ही न मिटा दे

ओपिनियन/ पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 सितंबर 2026

एक ऐसा पक्षी, जिसकी कीमत हमें अक्सर समझ नहीं आती

गिद्ध को देखकर शायद ही कोई व्यक्ति खुश होता हो। लेकिन प्रकृति में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। जिस मृत पशु को देखकर इंसान मुंह फेर लेता है, गिद्ध उसे खाकर पर्यावरण को साफ करने का काम करता है। यही कारण है कि गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति की सफाई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर गिद्ध कम होते हैं, तो इसका असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इंसानों और पूरे पर्यावरण पर पड़ सकता है।

गिद्धों की संख्या में 99.5 प्रतिशत तक गिरावट

भारत पहले ही गिद्धों की एक भयानक त्रासदी देख चुका है। 1980 के दशक में देश में गिद्धों की संख्या करीब चार करोड़ मानी जाती थी, लेकिन 2007 तक तीन प्रमुख प्रजातियों की संख्या में लगभग 99.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका सबसे बड़ा कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दर्द की दवा डाइक्लोफेनाक थी। मृत पशुओं के शरीर में मौजूद यह दवा गिद्धों के लिए घातक साबित हुई और देखते ही देखते उनकी आबादी तबाह होने लगी।

सरकार ने बाद में डाइक्लोफेनाक के पशु-चिकित्सा उपयोग पर रोक लगाई और दूसरे खतरनाक दर्दनिवारकों के खिलाफ भी कदम उठाए। लेकिन गिद्धों की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अब उनके सामने एक नया खतरा तेजी से बढ़ रहा है—बिजली के तार और बिजली का ढांचा।

अब बिजली के तार बन रहे हैं मौत का जाल

भारत में बिजली का नेटवर्क लगातार फैल रहा है। गांवों, खेतों, जंगलों और खुले इलाकों तक बिजली पहुंचाना विकास के लिए जरूरी है, लेकिन अगर यही ढांचा पक्षियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया तो यह उनके लिए मौत का जाल बन सकता है। गिद्धों के मामले में खतरा और बड़ा है, क्योंकि उनके पंख बहुत बड़े होते हैं। उड़ते या बैठते समय उनका शरीर एक साथ दो बिजली के तारों या किसी तार और जमीन से जुड़े हिस्से के संपर्क में आ सकता है। यही संपर्क उन्हें करंट का शिकार बना सकता है।

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गिद्ध ऊंची जगहों पर बैठना पसंद करते हैं और खुले इलाकों में भोजन की तलाश करते हैं। जहां नियमित रूप से मृत पशु फेंके जाते हैं, वहां वे बार-बार पहुंचते हैं। अगर ऐसी जगह के आसपास हाई-टेंशन या मीडियम-वोल्टेज बिजली की लाइनें मौजूद हैं, तो खतरा और बढ़ जाता है।

एक छोटा-सा बदलाव कई जानें बचा सकता है

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर समस्या का समाधान बहुत महंगा हो, ऐसा जरूरी नहीं है। एक अध्ययन में उत्तराखंड के देहरादून के पास पशुओं के शव डालने की जगह को हाई-टेंशन बिजली ढांचे से करीब 2.4 किलोमीटर दूर करने का सुझाव और उसके सकारात्मक प्रभाव सामने आए। यानी केवल यह तय करना कि गिद्धों को भोजन कहां मिलेगा और बिजली का ढांचा कहां होगा, कई पक्षियों की जान बचाने में मदद कर सकता है।

यह उदाहरण हमें एक बड़ी बात सिखाता है—विकास और प्रकृति को एक-दूसरे का दुश्मन बनाने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बेहतर योजना और सावधानी से दोनों साथ चल सकते हैं।

बिजली विभागों को सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, पक्षियों के लिए भी सोचना होगा

बिजली की लाइन लगाते समय आम तौर पर हमारी चिंता सुरक्षा, लागत और बिजली की आपूर्ति को लेकर होती है। लेकिन अब समय आ गया है कि इसमें पक्षियों की सुरक्षा को भी शामिल किया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में तारों को इंसुलेट करना, बिजली के खुले हिस्सों के बीच पर्याप्त दूरी रखना, पक्षियों के लिए सुरक्षित बैठने की जगह बनाना और ऐसी जगहों पर बिजली के खतरनाक ढांचे को बदलना जरूरी है।

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विशेष रूप से उन इलाकों में जहां गिद्धों की मौजूदगी अधिक है या जहां पशुओं के शव बड़ी संख्या में डाले जाते हैं, बिजली की लाइनों की अलग से सुरक्षा जांच होनी चाहिए।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि मौतें दिखाई ही नहीं देतीं

बिजली से पक्षियों की मौत का सही आंकड़ा जुटाना भी आसान नहीं है। कई बार मृत पक्षी इंसानों द्वारा हटा दिए जाते हैं या दूसरे जानवर उन्हें खा जाते हैं। इसलिए बिजली से होने वाली पक्षियों की मौतों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। यही कारण है कि इस खतरे को गंभीर बनाने के लिए हजारों पक्षियों के मरने का इंतजार करना बेहद गलत होगा।

अगर किसी क्षेत्र में लगातार गिद्ध करंट से मर रहे हैं, तो वहां पूरी आबादी खत्म होने का खतरा पैदा हो सकता है। एक स्थानीय आबादी के लिए लगातार होने वाली मौतें उसकी वापसी की क्षमता से कहीं अधिक साबित हो सकती हैं।

गिद्ध बचेंगे तो इंसानों को भी फायदा होगा

गिद्धों का बचना केवल वन्यजीव प्रेमियों की चिंता नहीं होनी चाहिए। जब गिद्धों की संख्या तेजी से घटी थी, तब मृत पशुओं के शव लंबे समय तक खुले में पड़े रहने लगे। इससे आवारा कुत्तों की संख्या और रेबीज के खतरे को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आईं। एक अध्ययन ने गिद्धों की कमी और मानव मृत्यु के बीच संबंध की ओर भी इशारा किया था।

इसलिए गिद्धों को बचाना केवल एक पक्षी को बचाना नहीं है। यह प्रकृति, स्वच्छता, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य के बीच संतुलन बचाने की कोशिश है।

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विकास जरूरी है, लेकिन किस कीमत पर?

भारत को बिजली चाहिए, सड़कें चाहिए, उद्योग चाहिए और विकास चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन विकास का मतलब यह नहीं हो सकता कि हम प्रकृति की उन व्यवस्थाओं को ही खत्म कर दें, जिन पर हमारा अपना जीवन टिका है। अगर बिजली का एक तार किसी गिद्ध के लिए मौत बन सकता है, तो उस तार की डिजाइन और सुरक्षा व्यवस्था पर दोबारा विचार करना विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि समझदार विकास की निशानी है।

आज गिद्धों की संख्या पहले ही ऐतिहासिक गिरावट झेल चुकी है। उनके सामने अब बिजली का खतरा बढ़ रहा है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने गिद्ध मरने के बाद हम कार्रवाई करेंगे? असली सवाल यह होना चाहिए कि हम कितने गिद्धों को मरने से पहले बचा सकते हैं।

प्रकृति चेतावनी देती है, इंतजार नहीं करती

गिद्धों की कहानी हमें बार-बार एक ही सबक देती है—प्रकृति के संकेतों को नजरअंदाज करने की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है। पहले रासायनिक दवाओं ने गिद्धों की आबादी को लगभग तबाह कर दिया। अब बिजली का बढ़ता ढांचा नया खतरा बनकर सामने है। अगर अभी से बिजली की लाइनों, कचरा और पशु शव निस्तारण की जगहों तथा गिद्धों के आवास को ध्यान में रखकर योजना बनाई जाए, तो इस संकट को बढ़ने से रोका जा सकता है।

विकास की रोशनी तभी सार्थक है, जब उसके नीचे प्रकृति अंधेरे में न मर रही हो।

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