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चीन में इंजीनियर भेजने पर Apple खर्च करता था ₹300 करोड़ सालाना! रोज बुक होती थीं 50 बिजनेस क्लास सीटें

बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/ बीजिंग | 28 अगस्त 2026

चीन की फैक्ट्रियों तक पहुंचने के लिए Apple का बड़ा खर्च

Apple कभी अपने अमेरिकी इंजीनियरों को चीन की फैक्ट्रियों तक पहुंचाने पर हर साल करीब 3.5 करोड़ डॉलर यानी लगभग ₹300 करोड़ खर्च करता था। कंपनी के इंजीनियर चीन में मौजूद अपने कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ मिलकर iPhone और दूसरे Apple उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया को बेहतर बनाने और उत्पादन बढ़ाने में सीधे काम करते थे। यह सिर्फ कर्मचारियों को एक देश से दूसरे देश भेजने की सामान्य यात्रा नहीं थी, बल्कि Apple के डिजाइन और चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के बीच बेहद करीबी तालमेल का हिस्सा थी।

रोजाना 50 बिजनेस क्लास सीटें बुक होती थीं

Apple और चीन के बीच चलने वाले इस बड़े पैमाने के काम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2019 में United Airlines की सैन फ्रांसिस्को से शंघाई जाने वाली उड़ान पर Apple रोजाना करीब 50 बिजनेस क्लास सीटें बुक करता था। एयरलाइन ने उस समय Apple को अपने सबसे महत्वपूर्ण कॉरपोरेट ग्राहकों में दिखाते हुए प्रचार सामग्री भी जारी की थी। इस एक रूट से United Airlines को Apple से करीब 3.5 करोड़ डॉलर सालाना राजस्व मिलता था। यानी Apple की चीन पर निर्भर मैन्युफैक्चरिंग व्यवस्था का असर सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं था, बल्कि एयरलाइंस और दूसरे कारोबारों तक भी दिखाई देता था।

हजारों सीटें, लगातार चीन आते-जाते थे कर्मचारी

एक साल में रोजाना 50 सीटों का मतलब करीब 18,000 बिजनेस क्लास सीटें सिर्फ एक रूट पर होता है। Apple की चीन जाने वाली टीमों में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होते थे। इनमें प्रोसेस इंजीनियर, डिजाइनर, ऑपरेशंस मैनेजर और प्रोडक्ट की विश्वसनीयता जांचने वाले इंजीनियर शामिल थे। ये कर्मचारी चीन की फैक्ट्रियों में मौजूद रहकर उत्पादन की प्रक्रिया को देखते, समस्याओं को समझते और नए Apple डिवाइस का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कराने में स्थानीय टीमों के साथ काम करते थे।

Tim Cook के मुताबिक डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग साथ-साथ चलते थे

Apple के CEO Tim Cook ने भी अतीत में इस मॉडल की अहमियत समझाते हुए कहा था कि Apple का काम सिर्फ अमेरिका में कोई उत्पाद डिजाइन करके उसे चीन भेज देना नहीं था। उनके मुताबिक Cupertino और चीन के बीच बेहद करीबी साझेदारी जरूरी थी। यानी Apple के उत्पादों की सफलता में सिर्फ डिजाइन या तकनीक का योगदान नहीं था, बल्कि डिजाइनरों और चीन में काम कर रहे मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञों के बीच लगातार बातचीत और सहयोग भी महत्वपूर्ण था।

1997 से चीन में बढ़ता गया Apple का मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क

रिपोर्ट में Dan Wang की किताब ‘Breakneck’ के हवाले से Apple के चीन में मैन्युफैक्चरिंग विस्तार का बड़ा चित्र सामने आता है। बताया गया है कि Apple ने चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां 1997 के आसपास तेज करनी शुरू कीं, जब Steve Jobs दोबारा कंपनी की कमान संभाल चुके थे। समय के साथ चीन Apple की ग्लोबल सप्लाई चेन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और कंपनी के बड़े पैमाने पर उत्पादन का आधार चीन में तैयार हुआ।

Apple के साझेदारों की फैक्ट्रियों में लाखों लोग काम करते थे

चीन में Apple का मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि Apple के मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर्स, जिनमें Foxconn जैसी कंपनियां शामिल हैं, की उत्पादन लाइनों पर करीब 14 लाख लोग काम करते थे। इन फैक्ट्रियों में Apple के लिए बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस तैयार किए जाते थे। यही विशाल औद्योगिक नेटवर्क Apple को दुनिया भर के बाजारों के लिए करोड़ों डिवाइस तेजी से तैयार करने में मदद करता था।

कोरोना महामारी ने बदल दिया Apple का चीन मॉडल

फिर आया COVID-19 का दौर और Apple की चीन में काम करने की शैली में बड़ा बदलाव आया। कड़े सीमा प्रतिबंधों के कारण अमेरिका में मौजूद Apple के बहुत से इंजीनियर करीब दो साल तक चीन नहीं जा सके। जिस कंपनी के इंजीनियर पहले लगातार अमेरिका और चीन के बीच यात्रा करते थे, उसे अचानक दूर से अपने उत्पादन नेटवर्क को संभालने का रास्ता अपनाना पड़ा।

चीन में मौजूद इंजीनियरों की जिम्मेदारी बढ़ी

अमेरिकी इंजीनियरों की आवाजाही रुकने के बाद Apple को चीन में मौजूद इंजीनियरों पर ज्यादा भरोसा करना पड़ा। स्थानीय टीमों ने उत्पादन प्रक्रिया को संभालने में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही Apple ने तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया ताकि अमेरिका में बैठे कर्मचारी भी चीन की फैक्ट्रियों में चल रहे काम को दूर से देख और समझ सकें। वीडियो कॉल, iPad और ऑगमेंटेड रियलिटी जैसे तकनीकी साधनों की मदद से फैक्ट्री फ्लोर की निगरानी और समस्या समाधान का काम किया जाने लगा।

भारत बन रहा है Apple का नया बड़ा मैन्युफैक्चरिंग सेंटर

चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की कोशिश में Apple ने भारत में भी अपने उत्पादन को तेजी से बढ़ाया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत में करीब 5.5 करोड़ iPhone असेंबल किए गए, जबकि एक साल पहले यह संख्या लगभग 3.6 करोड़ थी। इसका मतलब है कि Apple के कुल वैश्विक iPhone उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई तक पहुंच गई थी।

चीन अभी भी सबसे बड़ा केंद्र, लेकिन भारत की भूमिका बढ़ी

भारत में उत्पादन तेजी से बढ़ने के बावजूद चीन अभी भी Apple के लिए सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बना हुआ है। लेकिन अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापार तनाव, टैरिफ और सप्लाई चेन को अलग-अलग देशों में फैलाने की रणनीति ने Apple को भारत की तरफ और तेजी से बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। खासकर अमेरिकी बाजार के लिए बनाए जाने वाले iPhone का एक बड़ा हिस्सा अब भारत में तैयार किया जा रहा है।

Apple की कहानी सिर्फ iPhone की नहीं, बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की भी है

Apple का चीन से भारत की ओर बढ़ता मैन्युफैक्चरिंग विस्तार सिर्फ एक कंपनी की रणनीति में बदलाव नहीं है। यह इस बात का संकेत भी है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन को एक ही देश पर निर्भर रखने से बचना चाहती हैं। कभी Apple के सैकड़ों इंजीनियर हर महीने चीन की फैक्ट्रियों में पहुंचते थे और एक ही एयरलाइन रूट पर रोजाना 50 बिजनेस क्लास सीटें बुक होती थीं। आज वही Apple भारत में करोड़ों iPhone तैयार कर रहा है। चीन अभी भी बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत तेजी से उस वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग कहानी में अपनी जगह मजबूत कर रहा है।

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