अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 26 अगस्त 2026
ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश अब एक नए मोर्चे पर पहुंचती दिखाई दे रही है। अमेरिका की ओर से ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर भी कड़े प्रतिबंध लगाने की चेतावनी के बीच चीन ने वॉशिंगटन को साफ शब्दों में कहा है कि वह चीन और ईरान के बीच सामान्य आर्थिक एवं व्यापारिक रिश्तों में हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।
बीजिंग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका के ‘अवैध एकतरफा प्रतिबंधों’ का विरोध करता है और अपने वैध अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने मंगलवार को नियमित प्रेस ब्रीफिंग में अमेरिका की प्रतिबंध नीति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन एकतरफा प्रतिबंधों का दृढ़ता से विरोध करता है। उन्होंने कहा कि चीन और ईरान के बीच सहयोग को किसी बाहरी ताकत द्वारा बाधित या प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी, चीन बना बड़ी चुनौती
चीन का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। वॉशिंगटन का उद्देश्य ईरान की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना और उसके लिए विदेशी मुद्रा, ऊर्जा, तकनीक तथा दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंच मुश्किल बनाना है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक प्रस्तावित कार्रवाई में ईरान से जुड़े डिजिटल एसेट्स, तकनीक, सोना, विमानन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों को भी निशाना बनाया जा सकता है।
लेकिन अमेरिका की रणनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ईरान के साथ आर्थिक संबंध रखने वाले देशों पर भी दबाव बनाया जा रहा है। खासकर चीन के मामले में यह टकराव गंभीर हो सकता है, क्योंकि बीजिंग और तेहरान के बीच ऊर्जा और व्यापारिक संबंध काफी महत्वपूर्ण हैं।
चीन के लिए ईरानी तेल बेहद अहम
ईरान के लिए चीन सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में से एक है। उपलब्ध अमेरिकी आंकड़ों के मुताबिक चीन ईरान के गैर-तेल विदेशी व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा रखता है और ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है।
2025 में दोनों देशों के बीच करीब 9.96 अरब डॉलर का आधिकारिक द्विपक्षीय व्यापार दर्ज किया गया था। हालांकि, अमेरिकी आकलनों के अनुसार ईरानी कच्चे तेल की ऐसी बड़ी खेपें भी चीन पहुंचीं, जो आधिकारिक व्यापार आंकड़ों में पूरी तरह दर्ज नहीं थीं।
Kpler के अनुमान के अनुसार 2025 में चीन ने प्रतिदिन औसतन करीब 13.8 लाख बैरल ईरानी तेल खरीदा। यही ऊर्जा कारोबार दोनों देशों के रिश्तों की सबसे अहम कड़ी है।
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल कारोबार में डॉलर से बाहर भुगतान, बिचौलियों और वैकल्पिक व्यापारिक व्यवस्थाओं के इस्तेमाल की खबरें भी सामने आती रही हैं।
मामला सिर्फ तेल का नहीं
चीन के लिए ईरान केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं है। पश्चिम एशिया में बीजिंग अपने आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव को लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे में तेहरान के साथ संबंध चीन की ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ उसके व्यापक भू-राजनीतिक हितों से भी जुड़े हैं।
यही वजह है कि बीजिंग अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शंस की नीति को लेकर विशेष रूप से चिंतित है। चीन का तर्क है कि किसी संप्रभु देश के साथ उसके वैध व्यापारिक रिश्तों को तीसरे देश के दबाव से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
अमेरिका पहले ही ईरानी तेल खरीदने वाली एक चीनी रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगा चुका है। इसके अलावा चीनी बैंकों को भी चेतावनी दी गई है कि अगर वे ईरानी तेल कारोबार को सुविधाजनक बनाते हैं तो उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
चीन ने युद्धविराम की अपील भी की
बीजिंग ने अमेरिका और ईरान से तनाव कम करने और युद्धविराम की दिशा में आगे बढ़ने की अपील भी की है। चीन का कहना है कि आर्थिक प्रतिबंध किसी संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं हो सकते।
चीन की ताजा चेतावनी से साफ है कि ईरान को लेकर अमेरिका की रणनीति अब केवल वॉशिंगटन और तेहरान के बीच का मामला नहीं रह गई है। इसमें चीन के आर्थिक और रणनीतिक हित भी सीधे जुड़ गए हैं।
अगर अमेरिका ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर सेकेंडरी सैंक्शंस का दबाव बढ़ाता है और चीन इसके बावजूद तेहरान के साथ अपने आर्थिक रिश्ते जारी रखता है, तो इसका असर अमेरिका-चीन संबंधों पर भी पड़ सकता है। बीजिंग का संदेश बेहद स्पष्ट है—ईरान के साथ चीन के आर्थिक रिश्तों पर अमेरिकी दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। अपने हितों की रक्षा के लिए चीन जरूरी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।




