अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 26 अगस्त 2026
ईरान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक टकराव अब एक बेहद अहम मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने ईरान के साथ कारोबार और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाली कंपनियों और बैंकों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। इसका सीधा असर चीन के बड़े बैंकों पर पड़ सकता है, क्योंकि बीजिंग ईरान का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है, जबकि चीन की बैंकिंग व्यवस्था अभी भी अमेरिकी डॉलर और वैश्विक वित्तीय प्रणाली से गहराई से जुड़ी हुई है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने चेतावनी दी है कि ईरान की प्रतिबंधों से बचने में मदद करने या उसके तेल कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन को आसान बनाने वाले संस्थानों को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर किया जा सकता है।
यानी चीन के सामने एक मुश्किल सवाल खड़ा है—क्या वह ईरान के साथ अपने आर्थिक रिश्ते बचाए या अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था तक अपनी पहुंच सुरक्षित रखे?
चीन के लिए ईरानी तेल बेहद महत्वपूर्ण
अमेरिकी विश्लेषणों के मुताबिक युद्ध से पहले चीन ईरान के निर्यात होने वाले तेल का करीब 90 प्रतिशत खरीदता था। मार्च में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार ईरानी तेल चीन के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 12 प्रतिशत था।
इसका मतलब साफ है कि ईरान चीन के लिए केवल एक सामान्य व्यापारिक साझेदार नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी तेहरान बीजिंग के लिए महत्वपूर्ण है।
चीन के कई स्वतंत्र रिफाइनरियां ईरानी तेल की खरीद में सक्रिय रही हैं। प्रतिबंधों के कारण इस कारोबार में भुगतान के वैकल्पिक तरीकों और बिचौलियों का इस्तेमाल भी बढ़ा है।
लेकिन समस्या यह है कि चीन की बड़ी बैंकिंग संस्थाएं अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से पूरी तरह अलग होकर काम नहीं कर सकतीं।
डॉलर से दूरी आसान नहीं
चीन लंबे समय से अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ावा देने, दूसरे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में बीजिंग ने कई कदम उठाए हैं।
लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद चीन के लिए अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
चीन की बड़ी कंपनियों, बैंकों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को वैश्विक वित्तीय बाजारों से जुड़े रहने की जरूरत है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरान के साथ कारोबार जारी रखना चीन के बड़े बैंकों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
अमेरिका का दबाव क्यों बढ़ा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन ईरान पर आर्थिक दबाव को और मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देश और वित्तीय संस्थान अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करें।
अमेरिका की रणनीति का एक अहम हिस्सा सेकेंडरी सैंक्शंस हैं। इनके तहत केवल ईरानी संस्थाओं को ही निशाना नहीं बनाया जाता, बल्कि दूसरे देशों की उन कंपनियों और बैंकों पर भी कार्रवाई की जा सकती है जो प्रतिबंधित कारोबार में मदद करते हैं।
यही नीति चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन रही है।
अगर कोई चीनी बैंक ईरानी तेल से जुड़े वित्तीय लेनदेन को सुविधाजनक बनाता है और उसके खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई होती है, तो मामला सिर्फ चीन और ईरान के बीच व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। उसका असर उस बैंक की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों और डॉलर तक उसकी पहुंच पर भी पड़ सकता है।
चीन के पास विकल्प हैं, लेकिन सीमाएं भी
चीन के पास अमेरिकी दबाव से निपटने के लिए कुछ विकल्प जरूर हैं। वह युआन में व्यापार बढ़ा सकता है, डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में भुगतान कर सकता है और वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकता है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के लिए अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से पूरी तरह अलग होना अभी व्यावहारिक नहीं है।
यही वजह है कि बीजिंग एक तरफ अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध कर रहा है, तो दूसरी तरफ अपनी वित्तीय व्यवस्था को संभावित अमेरिकी दबाव से बचाने के लिए वैकल्पिक रास्ते भी तैयार कर रहा है।
ईरान बना अमेरिका-चीन टकराव का नया मोर्चा
ईरान को लेकर पैदा हुआ यह विवाद अब केवल वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संघर्ष नहीं रह गया है। इसमें चीन के आर्थिक हित और अमेरिकी वित्तीय ताकत सीधे आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।
चीन ईरान से तेल खरीदना जारी रखकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना चाहता है, लेकिन वह अपने बड़े बैंकों को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर किए जाने का जोखिम भी नहीं लेना चाहता।
यही विरोधाभास आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होगा।
चीन डॉलर से पूरी तरह बाहर निकलना नहीं चाहता, लेकिन वह यह भी नहीं चाहता कि अमेरिकी डॉलर उसकी आर्थिक नीति को नियंत्रित करने का माध्यम बन जाए। ईरान को लेकर अमेरिका का बढ़ता दबाव इसी बड़े संघर्ष को और तेज कर रहा है—एक तरफ डॉलर की ताकत, दूसरी तरफ उससे बाहर निकलने की चीन की लंबी रणनीति।




