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SC/ST, दलितों और रोहिंग्या को लेकर UN की गंभीर चिंता, भारत में भेदभाव और नफरत पर जवाबदेही की मांग

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति यानी UNCERD ने भारत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, दलितों और रोहिंग्या शरणार्थियों समेत समाज के कमजोर और हाशिए पर मौजूद तबकों के मानवाधिकारों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। समिति ने भारत में कथित भेदभाव, नफरत भरे भाषण और हेट क्राइम से जुड़ी घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत बताई है। खास तौर पर बंगाली भाषी मुसलमानों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं में बढ़ोतरी का उल्लेख करते हुए समिति ने भारत सरकार से इन मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने की अपील की है। यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब रोहिंग्या संकट को नौ वर्ष पूरे हो रहे हैं और भारत में अल्पसंख्यकों, दलितों तथा आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर बहस लगातार तेज होती रही है।

UN समिति ने जताई गंभीर चिंता

UNCERD ने अपनी टिप्पणी में भारत में मानवाधिकारों से जुड़े कई मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भेदभाव और नफरत के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। समिति ने विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दलित समुदायों के साथ-साथ रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े मामलों को गंभीरता से लिया है। समिति का कहना है कि सरकार को ऐसे मामलों में केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भेदभाव और नफरत फैलाने वालों की जवाबदेही तय हो।

बंगाली भाषी मुसलमानों को लेकर भी सवाल

संयुक्त राष्ट्र समिति ने भारत में बंगाली भाषी मुसलमानों को निशाना बनाए जाने वाली घटनाओं में कथित बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया है। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि भाषा, धर्म और नागरिकता को लेकर होने वाले विवादों का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है। समिति ने ऐसे मामलों में नफरत और भेदभाव को रोकने तथा पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई है। उसका जोर इस बात पर है कि किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

SC-ST और दलितों के अधिकारों पर भी सवाल

भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए लंबे समय से कई कानून और योजनाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद जमीन पर भेदभाव, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। UNCERD की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि कानून और सरकारी योजनाओं के बावजूद समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक न्याय और समानता का लाभ पूरी तरह क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।

नफरत भरे भाषण पर लगाम की मांग

समिति ने हेट स्पीच और हेट क्राइम को लेकर भी चिंता जताई है। सोशल मीडिया के दौर में किसी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक भाषा, अफवाह और नफरत फैलाने वाली सामग्री तेजी से फैल सकती है। ऐसी स्थिति में केवल पोस्ट हटाना या बयान की निंदा करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि कानून के तहत निष्पक्ष कार्रवाई हो और यह संदेश जाए कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा या नफरत को राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

रोहिंग्या संकट के नौ साल

संयुक्त राष्ट्र समिति की यह टिप्पणी रोहिंग्या संकट के नौ वर्ष पूरे होने के मौके पर आई है। रोहिंग्या शरणार्थियों की स्थिति लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बहस का विषय रही है। भारत में भी उनकी मौजूदगी, सुरक्षा, हिरासत और निर्वासन से जुड़े मुद्दों पर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे में समिति ने भारत से आग्रह किया है कि रोहिंग्या समेत सभी प्रभावित लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

सरकार के सामने जवाबदेही की बड़ी चुनौती

UNCERD की टिप्पणी को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मानवाधिकार प्रश्न के रूप में देखा जा सकता है। सरकार का दायित्व केवल विकास और आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि यह भी है कि देश का कोई नागरिक या शरणार्थी समूह भेदभाव, हिंसा और नफरत का शिकार न बने। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का पैमाना यही है कि कमजोर व्यक्ति को भी वही सुरक्षा और न्याय मिले जो ताकतवर व्यक्ति को मिलता है।

अब असली सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र की इस चिंता पर भारत सरकार क्या जवाब देती है। क्या सरकार ऐसे मामलों के आंकड़े सार्वजनिक करेगी? क्या हेट क्राइम और हेट स्पीच के मामलों में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या SC, ST, दलितों और अन्य कमजोर समुदायों के खिलाफ होने वाले अपराधों में तेजी से न्याय सुनिश्चित किया जाएगा? और क्या बंगाली भाषी मुसलमानों तथा रोहिंग्या समुदाय से जुड़े मामलों में मानवाधिकारों और कानून के बीच संतुलन का स्पष्ट रास्ता सामने रखा जाएगा?क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा बहुमत की ताकत में नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा में होती है।

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