Home » National » क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में तालीम पर ताला, सवालों पर पुलिस!

क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में तालीम पर ताला, सवालों पर पुलिस!

शिक्षा/ राष्ट्रीय/ दिल्ली एनसीआर | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026

जब विश्वविद्यालय में सवालों के सामने पुलिस खड़ी हो जाए

जिस विश्वविद्यालय के दरवाजे ज्ञान, संवाद और सवालों के लिए खुले होने चाहिए, अगर वहीं छात्रों की आवाज के सामने पुलिस खड़ी दिखाई देने लगे तो मामला सिर्फ 13 छात्रों का नहीं रह जाता। सवाल पूरे शिक्षा तंत्र की आत्मा पर उठता है। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के दिल्ली-एनसीआर कैंपस में बैकलॉग को लेकर 13 लॉ छात्रों का विवाद विरोध प्रदर्शन, प्रशासनिक शिकायत और पुलिस तक पहुंच गया है। विश्वविद्यालय ने एबीवीपी के करीब 20 कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायत की है और प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, यातायात बाधित करने तथा महिला सुरक्षा कर्मियों के साथ कथित मारपीट जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन इसके साथ विश्वविद्यालय से यह सवाल भी उतनी ही ताकत से पूछा जाना चाहिए कि आखिर 13 छात्रों के शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा विवाद बातचीत, अपील और अकादमिक समीक्षा से क्यों नहीं सुलझ सका? क्या किसी विश्वविद्यालय के पास छात्रों की समस्या सुनने और उसका समाधान निकालने का रास्ता पुलिस शिकायत से पहले खत्म हो जाता है?

13 छात्र, लेकिन सवाल पूरे सिस्टम का

मामला उन 13 लॉ छात्रों से जुड़ा है जिन्हें पहले और दूसरे वर्ष के बैकलॉग के कारण चौथे वर्ष में आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। विश्वविद्यालय का तर्क है कि नियम पहले से निर्धारित हैं और सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होते हैं। ठीक है—विश्वविद्यालय में नियम होने चाहिए, अनुशासन होना चाहिए और अकादमिक मानक भी कमजोर नहीं होने चाहिए। लेकिन शिक्षा संस्थान केवल नियमों की किताब का नाम नहीं है। शिक्षा का अर्थ यह भी है कि जिस छात्र से गलती हुई है, उसे सुधार का रास्ता मिले; जिस छात्र का प्रदर्शन कमजोर रहा है, उसे संभलने का अवसर मिले और जिस नियम का किसी छात्र के पूरे भविष्य पर असर पड़ रहा है, उसकी समीक्षा की व्यवस्था भी मौजूद हो। अगर सप्लीमेंटरी परीक्षा, बैकलॉग क्लियर करने और अकादमिक सुधार की व्यवस्थाएं हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन 13 छात्रों के मामले में सभी विकल्पों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? क्या नियमों का उद्देश्य छात्र को सुधारना है या एक अकादमिक गलती के कारण उसके भविष्य पर ब्रेक लगाना?

परीक्षा समिति या पुलिस—फैसला कौन करेगा?

इस पूरे विवाद का सबसे चुभता हुआ सवाल यही है—विश्वविद्यालय की समस्या का समाधान परीक्षा समिति करेगी या पुलिस? छात्र सवाल पूछे तो समिति बनाई जाए, छात्र विरोध करे तो पुलिस बुला ली जाए—यह कैसा शिक्षा मॉडल है? विश्वविद्यालय का मुख्य द्वार किताबों, बहस, विचार और संवाद के लिए खुलना चाहिए। अगर उसी दरवाजे पर छात्र खड़ा हो और दूसरी तरफ पुलिस दिखाई दे तो शिक्षा के पूरे चरित्र पर सवाल उठता है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकार हैं, लेकिन छात्रों के भी अधिकार हैं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन का अर्थ यह नहीं कि छात्र अपनी शिकायत लेकर भी प्रशासन के सामने खड़ा न हो सके। अगर प्रशासन के पास नियम हैं तो छात्रों के पास सवाल हैं, और लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था में सवाल का जवाब पुलिस की मौजूदगी नहीं, अकादमिक संवाद होना चाहिए।

तोड़फोड़ गलत है, लेकिन सवाल दबाना भी गलत है

विश्वविद्यालय ने प्रदर्शनकारियों पर गेट और फूलदान तोड़ने, सड़क जाम करने, यातायात बाधित करने और महिला सुरक्षा कर्मियों के साथ कथित मारपीट के आरोप लगाए हैं। इन आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। किसी भी आंदोलन के नाम पर हिंसा, तोड़फोड़ या महिला कर्मचारी के साथ दुर्व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। जिसने कानून तोड़ा है, उसके खिलाफ निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन कुछ प्रदर्शनकारियों पर लगे आरोपों को आधार बनाकर पूरे छात्र समुदाय की आवाज को दबाना भी उतना ही गलत होगा। अपराध व्यक्ति करता है तो जिम्मेदारी व्यक्ति की तय होनी चाहिए। छात्रों की अकादमिक शिकायत को अपराध की भाषा में बदल देना समस्या का समाधान नहीं है। अगर आंदोलन में किसी ने कानून तोड़ा है तो कार्रवाई हो, लेकिन साथ ही 13 छात्रों की मूल शिकायत का भी जवाब दिया जाए। एक गलत काम दूसरे सवाल को खत्म नहीं कर सकता।

कैंपस में छात्र कैदी क्यों महसूस करे?

यदि वायरल वीडियो में छात्रों को कैंपस के भीतर आने-जाने के लिए गेट खोलने की गुहार लगाते देखा गया है, तो यह भी गंभीर सवाल है। जिस विश्वविद्यालय में छात्र फीस देता है, कक्षाओं में पढ़ता है, परीक्षा देता है और अपने भविष्य के कई वर्ष लगाता है, उसी परिसर में वह अपने आपको बंद या नियंत्रित महसूस करे तो यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था का मामला नहीं है। छात्र विश्वविद्यालय की संपत्ति नहीं हैं। वे शिक्षा व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। उनके साथ सुरक्षा के नाम पर ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए जिससे उन्हें लगे कि वे अपने ही संस्थान में अपनी बात कहने के अधिकार से वंचित हैं।

नियम समान हों, लेकिन इंसानियत भी समान हो

विश्वविद्यालय यह कह सकता है कि नियम पहले से तय थे और प्रवेश के समय छात्रों को उनकी जानकारी दी गई थी। लेकिन नियमों की जानकारी होना और नियमों का हर परिस्थिति में कठोरतम तरीके से इस्तेमाल होना दो अलग बातें हैं। अगर किसी छात्र का बैकलॉग है तो उसे सुधारने का रास्ता होना चाहिए। अगर किसी छात्र को चौथे वर्ष में आगे बढ़ने से रोका जाता है तो स्पष्ट अपील व्यवस्था होनी चाहिए। अगर समान परिस्थितियों में किसी दूसरे छात्र को अलग अवसर मिला है तो उसका कारण सार्वजनिक रूप से समझाया जाना चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ केवल यह कहना नहीं कि “नियम सभी के लिए समान हैं।” पारदर्शिता का अर्थ यह भी है कि नियम कैसे लागू हुए, किस आधार पर लागू हुए और समान मामलों में क्या निर्णय लिए गए—इसका रिकॉर्ड सामने रखा जाए।

अगर छह कैंपसों में समस्या है तो मामला सिर्फ 13 छात्रों का नहीं

यदि विश्वविद्यालय के अपने अधिकारियों के अनुसार उसके छह कैंपसों में छात्र बैकलॉग जैसी समस्या से जूझ रहे हैं, तो फिर यह केवल 13 छात्रों का व्यक्तिगत मामला नहीं रह जाता। तब सवाल विश्वविद्यालय की अकादमिक नीति पर उठेगा। क्या बैकलॉग व्यवस्था छात्रों की पढ़ाई सुधारने के लिए बनाई गई है या उन्हें लंबे समय तक रोकने के लिए? क्या विश्वविद्यालय ने यह अध्ययन किया है कि बैकलॉग के कारण कितने छात्रों का एक साल, दो साल या उससे अधिक समय प्रभावित हुआ? कितने परिवारों पर अतिरिक्त फीस और रहने-खाने का आर्थिक बोझ पड़ा? कितने छात्रों को मानसिक दबाव से गुजरना पड़ा? और क्या विश्वविद्यालय ने कभी यह पूछा कि उसके नियमों का वास्तविक जीवन में छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? अगर नहीं पूछा तो फिर शिक्षा की गुणवत्ता का दावा केवल भवन और ब्रांडिंग तक सीमित रह जाता है।

फैकल्टी और स्टाफ भी दबाव में—कैंपस में तालीम कम, खौफ ज्यादा?

क्राइस्ट गाजियाबाद कैंपस को अब सिर्फ छात्रों के बैकलॉग और विरोध के सवालों का जवाब नहीं देना है; फैकल्टी और स्टाफ पर लगातार प्रशासनिक दबाव, मनमानी और मानसिक प्रताड़ना के जो आरोप सामने आ रहे हैं, उनका भी हिसाब देना होगा। अगर शिक्षक हर वक्त इस डर में काम करे कि सवाल पूछने, असहमति जताने या प्रशासन के किसी फैसले पर अपनी बात रखने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, कर्मचारी दबाव में रहें और छात्र अपनी समस्या लेकर सामने आने से घबराएं, तो फिर यह शिक्षा का वातावरण नहीं, डर और नियंत्रण का माहौल है। यूनिवर्सिटी की ऊंची इमारतें, चमकता कैंपस और बड़े-बड़े शैक्षणिक दावे उस समय खोखले हो जाते हैं जब भीतर काम करने वाले शिक्षक और कर्मचारी ही मानसिक दबाव की शिकायत करें। विश्वविद्यालय प्रशासन को समझना होगा कि शिक्षक मशीन नहीं, इंसान हैं और छात्र संख्या नहीं, भविष्य हैं। किसी भी संस्थान की प्रतिष्ठा शिकायतों को दबाने, आवाजों को डराने या प्रशासनिक ताकत दिखाने से नहीं बनती; प्रतिष्ठा बनती है निष्पक्षता, सम्मान और संवाद से। अगर आरोप गलत हैं तो स्वतंत्र जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी कर दीजिए; और अगर आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदारी तय कीजिए। क्योंकि तालीम के नाम पर ऐसा माहौल नहीं चल सकता जहां छात्र सवाल पूछने से डरें, शिक्षक बोलने से डरें और कर्मचारी प्रशासन के सामने खामोश खड़े रहें। यह विश्वविद्यालय है—किसी की निजी सल्तनत नहीं।

विश्वविद्यालय प्रशासन राजा नहीं, अकादमिक व्यवस्था का संरक्षक है

किसी भी विश्वविद्यालय का प्रशासन सर्वशक्तिमान सत्ता नहीं हो सकता। छात्र प्रजा नहीं हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन राजा नहीं। फीस देने वाला छात्र केवल पैसा देने वाली मशीन नहीं है और शिक्षक केवल आदेश पालन करने वाला कर्मचारी नहीं। विश्वविद्यालय एक अकादमिक समुदाय है जहां विचारों का टकराव, असहमति, बहस और सवाल शिक्षा का हिस्सा हैं। यदि प्रशासन हर सवाल को अनुशासनहीनता, हर विरोध को बाहरी साजिश और हर आलोचना को संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश मानने लगेगा तो विश्वविद्यालय धीरे-धीरे ज्ञान के केंद्र से आदेश के केंद्र में बदल जाएगा। जहां सवाल पूछना अपराध बन जाए, वहां डिग्री तो मिल सकती है, शिक्षा नहीं।

अल्पसंख्यक संस्थान है तो जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती

यहां अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान से जुड़े अधिकारों और नियामकीय व्यवस्था का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। अल्पसंख्यक दर्जा संविधान और कानून के तहत संस्थानों को विशेष संरक्षण देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि छात्रों के अधिकार, प्राकृतिक न्याय, पारदर्शिता और अकादमिक निष्पक्षता जैसे प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। यदि यह मामला राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग यानी NCMEI के अधिकार क्षेत्र या किसी अन्य सक्षम प्राधिकरण के सामने जाता है, तो असली परीक्षा यही होगी कि फैसला केवल संस्थान के प्रशासनिक अधिकारों को देखकर होता है या छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों और न्यायसंगत प्रक्रिया को भी बराबर महत्व मिलता है। अल्पसंख्यक अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।

एबीवीपी का आंदोलन भी सवालों से ऊपर नहीं

यह भी साफ होना चाहिए कि यह लेख किसी राजनीतिक संगठन को क्लीन चिट देने के लिए नहीं है। एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर लगाए गए तोड़फोड़, सड़क बाधित करने या महिला सुरक्षा कर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि कोई दोषी है तो कार्रवाई हो। लेकिन किसी राजनीतिक संगठन की मौजूदगी से छात्रों की मूल शिकायत स्वतः झूठी नहीं हो जाती। 13 छात्रों की समस्या का फैसला इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उनके समर्थन में कौन खड़ा हुआ। सवाल यह होना चाहिए कि छात्रों की अकादमिक स्थिति क्या है, विश्वविद्यालय के नियम क्या हैं, समान मामलों में क्या फैसले हुए और छात्रों के पास न्याय पाने की उचित प्रक्रिया क्या है।

छात्र का एक साल किसी अधिकारी की फाइल नहीं है

यह बात विश्वविद्यालयों को सबसे पहले समझनी चाहिए—एक छात्र के लिए एक साल केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं होता। उसके लिए वह फीस है, परिवार की बचत है, माता-पिता की उम्मीद है, करियर का समय है और कई बार मानसिक संघर्ष का पूरा दौर है। किसी अधिकारी की मेज पर छात्र का एक वर्ष शायद एक फाइल नंबर हो सकता है, लेकिन छात्र के जीवन में वही वर्ष उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल सकता है। इसलिए जब किसी नियम से छात्र का पूरा अकादमिक वर्ष प्रभावित होता है तो संस्थान का कर्तव्य केवल नियम दिखाना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और मानवीय समाधान तलाशना भी है।

पुलिस से कैंपस शांत हो सकता है, सवाल नहीं

प्रशासन चाहे तो पुलिस बुला सकता है, गेट बंद कर सकता है, शिकायत दर्ज करा सकता है और कैंपस में सुरक्षा बढ़ा सकता है। इससे कुछ समय के लिए परिसर शांत हो सकता है। लेकिन छात्रों के सवाल खत्म नहीं होंगे। जिस छात्र का भविष्य बैकलॉग से प्रभावित है, वह सवाल पूछता रहेगा। जिस अभिभावक ने फीस भरी है, वह सवाल पूछेगा। जिस शिक्षक को प्रशासनिक दबाव महसूस होता है, वह सवाल पूछेगा। और समाज भी पूछेगा कि शिक्षा के संस्थान में असहमति का जवाब संवाद से क्यों नहीं दिया गया। गेट बंद किए जा सकते हैं, लेकिन सवालों पर ताला नहीं लगाया जा सकता।

अब विश्वविद्यालय को प्रेस नोट नहीं, समाधान देना होगा

अब जरूरत प्रेस नोट और पुलिस शिकायतों से आगे बढ़ने की है। विश्वविद्यालय को प्रभावित 13 छात्रों के मामलों की पारदर्शी अकादमिक समीक्षा करनी चाहिए। नियमों का स्पष्ट दस्तावेज सामने रखना चाहिए। समान परिस्थितियों वाले छात्रों के निर्णयों की तुलना करनी चाहिए। छात्रों को अपील और समीक्षा का उचित अवसर देना चाहिए। प्रदर्शन के दौरान यदि हिंसा या तोड़फोड़ हुई है तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। फैकल्टी और स्टाफ पर मानसिक प्रताड़ना या प्रशासनिक दबाव के आरोप हैं तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि कहीं विश्वविद्यालय की प्रक्रिया में गलती सामने आती है तो उसे स्वीकार करना कमजोरी नहीं होगी—बल्कि संस्थान की वास्तविक मजबूती का प्रमाण होगा।

तालीम पर ताला नहीं, संवाद के दरवाजे खोलिए

क्राइस्ट यूनिवर्सिटी को अब तय करना होगा कि वह किस तरह का विश्वविद्यालय बनना चाहती है। ऐसा परिसर जहां छात्र किताब लेकर आए और डर लेकर लौटे? ऐसा संस्थान जहां प्रशासन का आदेश अंतिम हो और छात्र की आवाज केवल अनुशासनहीनता कहलाए? या ऐसा विश्वविद्यालय जहां छात्र नियमों का सम्मान करे, लेकिन नियमों पर सवाल भी पूछ सके; जहां शिक्षक स्वतंत्र होकर पढ़ा सके; जहां कर्मचारी बिना भय के काम कर सके और जहां विवाद का पहला रास्ता पुलिस नहीं, संवाद हो?

तालीम के दरवाजे पर ताला नहीं, संवाद के दरवाजे खोलिए

तालीम के दरवाजे पर ताला लगाकर शिक्षा की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती। पुलिस बुलाकर कैंपस को कुछ देर के लिए शांत कराया जा सकता है, लेकिन छात्रों के सवालों को हमेशा के लिए शांत नहीं किया जा सकता। गेट बंद किया जा सकता है, रास्ते रोके जा सकते हैं, आवाज दबाई जा सकती है—लेकिन किसी छात्र के भविष्य पर ताला नहीं लगाया जा सकता। सबसे बड़ा सवाल यही है कि विश्वविद्यालय छात्रों को शिक्षा देने आया है या केवल नियम मनवाने? अगर मकसद सचमुच शिक्षा है, तो दरवाजे खोलिए, छात्रों को बुलाइए, उनकी बात सुनिए, तथ्यों के साथ जवाब दीजिए, नियम समझाइए और जहां गलती हुई है वहां उसे सुधारने का साहस दिखाइए। और अगर किसी छात्र से गलती हुई है तो उसे भविष्य से बाहर धकेलने के बजाय सुधारने का रास्ता दीजिए। क्योंकि विश्वविद्यालय की असली ताकत पुलिस की मौजूदगी, बंद गेट या कठोर आदेश में नहीं, बल्कि उस भरोसे में होती है जिसमें छात्र बिना डर के कह सके—“मेरी बात सुनी जाएगी।” जिस दिन किसी विश्वविद्यालय को अपने ही छात्रों के सवालों से डर लगने लगे, उस दिन उसे छात्रों को कटघरे में खड़ा करने से पहले अपने आईने के सामने खड़ा होना चाहिए। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी को तय करना होगा—वह तालीम का दरवाजा खोलेगी या सवालों पर ताला लगाएगी। क्योंकि तालीम पर ताला लग सकता है, लेकिन ज्ञान की तलाश, न्याय की मांग और भविष्य की उम्मीद पर कभी ताला नहीं लगाया जा सकता।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted