अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026
Xi-Trump मुलाकात से पहले अमेरिका का बड़ा कदम
अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। Bloomberg News की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका चीन से आयात होने वाले सामान पर 7.5% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। यह कदम चीन की कथित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता यानी overcapacity को लेकर उठाया जा सकता है। खास बात यह है कि यह संभावित फैसला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अगले महीने संभावित शिखर वार्ता की तैयारी चल रही है। हालांकि Reuters ने Bloomberg की इस रिपोर्ट की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है, इसलिए फिलहाल इसे संभावित अमेरिकी नीति के रूप में देखा जाना चाहिए, अंतिम निर्णय के रूप में नहीं।
चीन की ‘ओवरकैपेसिटी’ पर अमेरिका की नजर
अमेरिका लंबे समय से चीन पर आरोप लगाता रहा है कि उसकी औद्योगिक क्षमता घरेलू मांग से कहीं अधिक है और सरकारी समर्थन के कारण चीनी कंपनियां सस्ते उत्पादों को वैश्विक बाजारों में तेजी से उतार रही हैं। वॉशिंगटन की चिंता विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, सोलर पैनल, स्टील, एल्युमिनियम और दूसरे औद्योगिक उत्पादों को लेकर रही है। अमेरिकी तर्क है कि यदि चीन में उत्पादन जरूरत से कहीं ज्यादा होता है और वह माल कम कीमत पर विदेशों में पहुंचता है, तो इससे अमेरिकी और दूसरे देशों के घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ता है। प्रस्तावित 7.5% टैरिफ इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
ट्रंप के लिए टैरिफ सिर्फ व्यापार नहीं, रणनीतिक हथियार
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में टैरिफ अमेरिका की आर्थिक और विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुके हैं। अमेरिका पहले भी चीन के साथ व्यापार को लेकर भारी शुल्क और प्रतिबंधों का इस्तेमाल कर चुका है। अब यदि चीन के अतिरिक्त उत्पादन को आधार बनाकर नया 7.5% शुल्क लगाया जाता है, तो इसका संदेश केवल चीनी कंपनियों के लिए नहीं होगा। यह बीजिंग को यह संकेत भी होगा कि अमेरिका चीन की औद्योगिक शक्ति और वैश्विक बाजार में उसकी बढ़ती हिस्सेदारी को सीमित करने के लिए व्यापार नीति का इस्तेमाल जारी रखेगा।
सबसे दिलचस्प बात—वार्ता से पहले दबाव
इस घटनाक्रम की टाइमिंग सबसे महत्वपूर्ण है। एक तरफ अगले महीने Xi-Trump मुलाकात की संभावनाएं हैं, दूसरी तरफ अमेरिका चीनी वस्तुओं पर नया शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। यानी वॉशिंगटन बातचीत की मेज पर बैठने से पहले बीजिंग पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना सकता है। यह अमेरिकी बातचीत की पुरानी शैली से भी मेल खाता है, जिसमें पहले दबाव बनाया जाता है और उसके बाद समझौते की संभावनाओं पर बातचीत होती है। लेकिन यही रणनीति उल्टा असर भी डाल सकती है और चीन को अमेरिकी दबाव के सामने और कठोर रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है।
Xi की भारत यात्रा और अमेरिका-चीन समीकरण
यह घटनाक्रम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। Reuters की 24 अगस्त की अलग रिपोर्ट के अनुसार, शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं और यह सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन करीब 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल भारत भेजने की तैयारी कर रहा है। यदि Xi भारत आते हैं और इसी अवधि में उनकी Trump के साथ बैठक भी होती है, तो नई दिल्ली कुछ समय के लिए वैश्विक कूटनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है।
भारत के लिए चीन-अमेरिका टकराव में अवसर भी, चुनौती भी
भारत के सामने यहां दोहरी स्थिति है। एक तरफ अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक संघर्ष भारत के लिए विनिर्माण, सप्लाई चेन और विदेशी निवेश आकर्षित करने का अवसर पैदा कर सकता है। यदि अमेरिकी कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं, तो भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और दूसरे एशियाई देश वैकल्पिक उत्पादन केंद्र बन सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ यदि अमेरिका-चीन टकराव बहुत ज्यादा बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, कमोडिटी कीमतों, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में औद्योगिक सामान और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट आयात करता है, इसलिए किसी बड़े व्यापार युद्ध का असर भारतीय उद्योग और उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।
2020 के बाद रिश्ते अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं
अमेरिका-चीन व्यापार विवाद को केवल टैरिफ की कहानी समझना गलत होगा। दोनों देशों के बीच तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दुर्लभ खनिज, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति को लेकर भी प्रतिस्पर्धा चल रही है। चीन और अमेरिका के बीच तनाव का असर ताइवान, दक्षिण चीन सागर और वैश्विक सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर भी पड़ता है। इसलिए 7.5% टैरिफ यदि लागू होता है तो यह चीन के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक रणनीति के बड़े ढांचे में एक और परत जोड़ सकता है।
असली सवाल—टैरिफ कितना असरदार होगा?
अमेरिका के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अतिरिक्त शुल्क लगाने से चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता वास्तव में कितनी प्रभावित होगी। चीन की कंपनियां केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर नहीं हैं। यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में चीनी उत्पादों की मजबूत मौजूदगी है। ऐसे में यदि अमेरिका चीनी सामान महंगा करता है तो चीन अपने निर्यात को दूसरे बाजारों की ओर मोड़ सकता है। इसके उलट अमेरिका में चीनी उत्पाद महंगे होने पर अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं की लागत भी बढ़ सकती है।
क्या फिर शुरू होगा टैरिफ वॉर?
अगर प्रस्तावित शुल्क लागू होता है और चीन इसके जवाब में अमेरिकी उत्पादों पर नया शुल्क या दूसरे व्यापारिक प्रतिबंध लगाता है, तो दुनिया फिर से एक नए US-China tariff war की तरफ बढ़ सकती है। दोनों अर्थव्यवस्थाओं का आकार इतना बड़ा है कि इनके बीच व्यापारिक तनाव का असर बाकी दुनिया से बच नहीं सकता। खासकर उन देशों के लिए जोखिम बढ़ेगा जो चीन और अमेरिका दोनों के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करते हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर—‘China+1’
इस पूरे घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर China+1 strategy हो सकता है। वैश्विक कंपनियां यदि चीन में उत्पादन बनाए रखते हुए एक अतिरिक्त उत्पादन केंद्र बनाना चाहती हैं, तो भारत अपनी विशाल घरेलू अर्थव्यवस्था, युवा कार्यबल और बढ़ते डिजिटल तथा औद्योगिक आधार के कारण महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। लेकिन केवल चीन पर टैरिफ लगने से निवेश भारत नहीं आएगा। इसके लिए भारत को लॉजिस्टिक्स, बिजली, भूमि, कौशल, कर व्यवस्था, निर्यात प्रतिस्पर्धा और कारोबारी नियमों में लगातार सुधार करना होगा।
आगे क्या?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 7.5% टैरिफ की रिपोर्ट की Reuters ने स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है। इसलिए इसे अमेरिकी सरकार का अंतिम फैसला मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन यदि यह कदम वास्तव में लागू होता है तो इसका महत्व केवल 7.5% शुल्क तक सीमित नहीं रहेगा। यह संकेत होगा कि Washington और Beijing के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा अभी खत्म नहीं हुई है और अगले महीने होने वाली संभावित Xi-Trump वार्ता से पहले दोनों पक्ष एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए यह समय केवल घटनाक्रम देखने का नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी जगह मजबूत करने का है।




