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ईरान पर अमेरिका का ‘आर्थिक युद्ध’: नई पाबंदियों से दुनिया के कारोबार पर दबाव, होर्मुज में शिपिंग 90% तक गिरी

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन|/ तेहरान | 25 अगस्त 2026

अमेरिका का बड़ा आर्थिक दांव, ईरान को घेरने की तैयारी

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने अब सैन्य मोर्चे से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक युद्ध का रूप ले लिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट आज ईरान के खिलाफ नई और बेहद कड़ी आर्थिक पाबंदियों का ऐलान करने वाले हैं। Reuters के अनुसार, वॉशिंगटन उन देशों और कंपनियों पर भी कार्रवाई का दबाव बढ़ाने की तैयारी में है जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं। अमेरिकी प्रशासन का संदेश साफ है—ईरान के साथ आर्थिक संबंध रखेंगे तो अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से बाहर किए जाने का जोखिम उठाना होगा। इस कदम को वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ अपनी अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय कार्रवाई के तौर पर पेश कर रहा है।

होर्मुज पर संकट ने बढ़ाई पूरी दुनिया की चिंता

इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बन चुका है। यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। Reuters के मुताबिक, संघर्ष से पहले दुनिया के कारोबार होने वाले तेल का करीब पांचवां हिस्सा इस मार्ग से गुजरता था। लेकिन अब यहां जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर की तुलना में करीब 90 प्रतिशत तक गिर चुकी है। 21 अगस्त तक के सप्ताह में केवल 89 जहाज होर्मुज से बाहर निकले और 103 अंदर गए। सप्ताहांत में स्थिति और गंभीर रही—शनिवार को केवल 13 और रविवार को महज 4 कमोडिटी जहाजों ने इस मार्ग को पार किया।

ईरान ने 45 टैंकरों को दी कार्रवाई की चेतावनी

तनाव को और बढ़ाते हुए ईरान ने करीब 45 तेल टैंकरों को ब्लैकलिस्ट करने की बात कही है। Reuters के अनुसार, ईरान का कहना है कि जिन जहाजों ने होर्मुज पार करने के उसके नियमों का उल्लंघन किया है, उनके खिलाफ जुर्माना, हिरासत और माल जब्त करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक पर अनिश्चितता और बढ़ गई है। पहले से ही कम होती जहाजों की आवाजाही और अब टैंकरों पर कार्रवाई की धमकी का सीधा असर तेल कंपनियों, शिपिंग कारोबार, बीमा लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

अमेरिका का निशाना सिर्फ तेहरान नहीं, ईरान के कारोबारी साझेदार भी

अमेरिका की नई रणनीति का सबसे बड़ा असर ईरान के साथ व्यापार करने वाले तीसरे देशों पर पड़ सकता है। अमेरिकी अधिकारियों ने पहले ही संकेत दिया है कि ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक ‘लाइफलाइन’ देने वाले देशों को आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। बेसेंट ने इसे अमेरिकी रणनीति का “वन-टू पंच” बताया है—एक तरफ ईरान पर नाकेबंदी और दूसरी तरफ अब तक की सबसे कठोर वित्तीय पाबंदियां। वॉशिंगटन का उद्देश्य ईरान की तेल आय, वित्तीय व्यवस्था और सैन्य क्षमता को कमजोर करना है, जबकि ईरान ने अमेरिकी कदमों को आर्थिक दबाव बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है।

चीन सबसे बड़ी परीक्षा में, क्योंकि ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है

इस आर्थिक युद्ध में चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। Reuters के अनुसार, चीन हाल के वर्षों में ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और Kpler के आंकड़ों के मुताबिक ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80 प्रतिशत से अधिक चीन खरीदता है। अमेरिका पहले ही चीन से ईरान के साथ ऊर्जा कारोबार को सीमित करने का आग्रह कर चुका है और चीनी रिफाइनरियों पर कार्रवाई भी की जा चुकी है। अब अगर अमेरिकी प्रतिबंध सीधे चीनी बैंकों या बड़े वित्तीय संस्थानों तक पहुंचते हैं, तो मामला सिर्फ अमेरिका-ईरान विवाद नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिका-चीन आर्थिक टकराव का नया मोर्चा खुल सकता है।

ईरान से चीन जाने वाला तेल भी घटा

अमेरिकी दबाव का असर ईरानी तेल की चीन तक पहुंच पर दिखाई देने लगा है। Reuters के मुताबिक, अगस्त में ईरान से चीन को भेजे जाने वाले तेल की मात्रा घटकर करीब 5.34 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि जुलाई में यह करीब 8.23 लाख बैरल प्रतिदिन थी। हालांकि इस साल की शुरुआत में चीन को ईरानी तेल की आपूर्ति 15.8 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई थी। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां रियायती ईरानी तेल खरीदती रही हैं और कई मामलों में तेल की उत्पत्ति छिपाने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।

भारत के लिए संकट सिर्फ तेल का नहीं, व्यापार और भुगतान का भी

ईरान संकट का असर भारत तक भी पहुंच रहा है। Reuters के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों और UAE द्वारा ईरान के साथ व्यापार तथा वित्तीय लेन-देन रोकने के बाद भारत का ईरान को निर्यात और मुश्किल में पड़ सकता है। भारत के चावल, चाय और दवाओं जैसे उत्पादों का एक हिस्सा पहले दुबई के रास्ते ईरान पहुंचता रहा है। 2018-19 में भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार करीब 17 अरब डॉलर था, जो अब 90 प्रतिशत से अधिक घट चुका है और मुख्यतः मानवीय जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं तक सीमित है। 2026 की पहली छमाही में भारत ने ईरान को करीब 70.7 करोड़ डॉलर का तेल भी आयात किया था, लेकिन नए अमेरिकी प्रतिबंध इस व्यापार के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।

तेल बाजार में फिर 100 डॉलर का खतरा

संकट का अगला बड़ा असर पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर पड़ सकता है। पिछले सप्ताह अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकी के बाद Brent crude 93 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया था। Reuters के अनुसार, Morgan Stanley को आशंका है कि मौजूदा परिस्थितियों में Brent चौथी तिमाही में 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। वैश्विक तेल भंडार पर भी दबाव बढ़ चुका है। Saudi Aramco के प्रमुख के अनुसार फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद वैश्विक बाजार को 2.6 अरब बैरल से अधिक तेल का नुकसान हुआ है और होर्मुज पूरी तरह सामान्य हो जाने के बाद भी भंडार को फिर से भरने में लंबा समय लग सकता है।

असली खतरा युद्ध से ज्यादा लंबा आर्थिक झटका

सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि होर्मुज में सामान्य आवाजाही लंबे समय तक बहाल नहीं होती और अमेरिका प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाता है, तो इसका असर सिर्फ ईरान पर नहीं रहेगा। तेल की कीमत, जहाजों का बीमा, माल ढुलाई, ऊर्जा आयात, पेट्रोकेमिकल उद्योग और खाद्य परिवहन—सबकी लागत बढ़ सकती है। Reuters के अनुसार, वैश्विक बाजार पहले ही इस अनिश्चितता को लेकर सतर्क है और निवेशक अमेरिकी प्रतिबंधों के विवरण का इंतजार कर रहे हैं। यानी लड़ाई भले ईरान और अमेरिका के बीच हो, लेकिन उसकी आर्थिक कीमत कई देशों के आम उपभोक्ताओं और उद्योगों को चुकानी पड़ सकती है।

अब अगली चाल ईरान, अमेरिका और चीन—तीनों पर निर्भर

अब दुनिया की नजर तीन मोर्चों पर है—अमेरिका कितने व्यापक प्रतिबंध लगाता है, ईरान उसका जवाब किस स्तर पर देता है और चीन अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरानी तेल कारोबार को किस हद तक जारी रखता है। यदि चीन और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर टकराव बढ़ता है, तो यह पहले से मौजूद व्यापारिक तनाव को और गहरा कर सकता है। वहीं होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और बाधित हुई तो ऊर्जा बाजार पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए 24 अगस्त 2026 का यह घटनाक्रम केवल एक नए प्रतिबंध पैकेज की खबर नहीं है—यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, अमेरिका-चीन संबंधों और भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी परीक्षा की शुरुआत हो सकता है।

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