अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026
ताइवान के आसपास चीन की गतिविधियां अब केवल सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं रह गई हैं। बीजिंग ने पिछले तीन महीनों में ताइवान के आसपास अपने कोस्ट गार्ड, सर्वे और दूसरे सरकारी जहाजों की मौजूदगी लगातार बढ़ाई है। 24 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में ही ताइवान ने चीन के सरकारी जहाजों की 118 गतिविधियां दर्ज की हैं। जुलाई में यह संख्या 117 और जून में 111 थी। यानी लगातार तीसरे महीने रिकॉर्ड स्तर की गतिविधि सामने आई है। इससे पहले जुलाई 2024 से जब ताइवान ने इस तरह के आंकड़े सार्वजनिक करने शुरू किए थे, किसी एक महीने में सबसे ज्यादा गतिविधियां अप्रैल 2025 में 50 दर्ज हुई थीं। अब यह संख्या 100 के पार पहुंच चुकी है। यह बदलाव इसलिए गंभीर है क्योंकि चीन की गतिविधियां ताइवान के आसपास समुद्री मौजूदगी बढ़ाने से आगे बढ़कर लंबे समय तक नियंत्रण और निगरानी की तैयारी जैसी दिखाई दे रही हैं।
मामला सिर्फ चीन और ताइवान के बीच तनाव का नहीं है। इसके पीछे जापान और फिलीपींस के बीच समुद्री सीमा को लेकर बातचीत भी एक महत्वपूर्ण कारण बनती दिखाई दे रही है। मई के आखिर में जापान और फिलीपींस ने इस क्षेत्र में समुद्री सीमा तय करने के लिए बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी। इसके बाद चीन ने उस इलाके में अपनी कानून-प्रवर्तन और सर्वे गतिविधियां तेज कर दीं। अमेरिका स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की Asia Maritime Transparency Initiative (AMTI) की रिपोर्ट के मुताबिक जून से अगस्त के बीच चीनी जहाजों की गतिविधियां उन समुद्री क्षेत्रों में विशेष रूप से बढ़ीं जहां चीन, जापान और फिलीपींस के समुद्री दावे एक-दूसरे से टकराते हैं। जनवरी से मई के आखिर तक इस क्षेत्र में ऐसी गतिविधियां लगभग दिखाई नहीं दी थीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन की गतिविधियां केवल जापान और फिलीपींस के विवादित समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं रहीं। AMTI के विश्लेषण के अनुसार चीनी सर्वे जहाज ताइवान से करीब 50 नॉटिकल मील यानी लगभग 93 किलोमीटर तक की दूरी वाले समुद्री क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। रिपोर्ट के अनुसार यह क्षेत्र जापान और फिलीपींस के बीच प्रस्तावित समुद्री सीमा निर्धारण से सीधे तौर पर बहुत कम जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे केवल टोक्यो और मनीला को संदेश देने की कार्रवाई नहीं मान रहे हैं। आशंका यह है कि चीन इस गतिविधि के जरिए ताइवान के पूर्वी हिस्से में लगातार मौजूदगी स्थापित करने और भविष्य में अपने अधिकार का दावा मजबूत करने की जमीन तैयार कर रहा है।
यहां एक और तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है। AMTI के अनुसार जापान-फिलीपींस की घोषणा के कुछ ही दिनों के भीतर चीनी कानून-प्रवर्तन जहाजों ने इस क्षेत्र से गुजरने वाले 198 वाणिज्यिक जहाजों को रोका या उनसे संपर्क किया और उनके बंदरगाह, यात्रा और चालक दल से जुड़ी जानकारी मांगी। इसका मतलब यह है कि चीन की गतिविधियां केवल सैन्य या सरकारी जहाजों की आवाजाही तक सीमित नहीं हैं। वह समुद्र में आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों पर भी अपनी निगरानी और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अगर ऐसी गतिविधियां लंबे समय तक जारी रहती हैं तो इससे समुद्री व्यापार की स्वतंत्र आवाजाही पर दबाव बढ़ सकता है।
चीन ने हालांकि इन कार्रवाइयों को अलग नजरिए से पेश किया है। बीजिंग ने जापान-फिलीपींस की समुद्री सीमा वार्ता को “अवैध और निरर्थक” बताया है और संबंधित समुद्री क्षेत्र पर अपना अधिकार जताया है। चीन के कोस्ट गार्ड ने अपनी गश्त को जापान और फिलीपींस की कथित एकतरफा कार्रवाइयों का “जरूरी जवाब” बताया है। दूसरी तरफ ताइवान का कहना है कि चीन की सरकारी जहाजों की लगातार मौजूदगी का उद्देश्य समुद्र में धीरे-धीरे एक नया यथास्थिति यानी नया ‘स्टेटस क्वो’ स्थापित करना हो सकता है। यानी आज जहाज भेजे जा रहे हैं, कल वही मौजूदगी सामान्य मान ली जाए और कुछ समय बाद चीन उस मौजूदगी को अपने अधिकार के आधार के रूप में पेश करे।
चीन ने समुद्री सर्वेक्षण भी बढ़ाया है। जून में चीन के प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय ने ताइवान के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में तीन दिन का समुद्री पर्यावरण सर्वे किया था। चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार अब ऐसे सर्वे एक बार की गतिविधि नहीं बल्कि हर साल होने वाले अभियान का हिस्सा बन सकते हैं। यह बात इसलिए चिंता बढ़ाती है क्योंकि समुद्री सर्वे केवल पर्यावरण संबंधी जानकारी के लिए ही उपयोगी नहीं होते। समुद्र की गहराई, समुद्र के भीतर का भूगोल, पानी की स्थिति और समुद्री संरचना से जुड़ा डेटा सैन्य अभियानों में भी उपयोगी हो सकता है, खासकर पनडुब्बियों और समुद्र के भीतर होने वाले युद्ध की योजना में।
यही वह बिंदु है जहां यह मामला सीधे सुरक्षा और युद्ध की तैयारी से जुड़ जाता है। AMTI के अनुसार ताइवान के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में लंबे समय तक कोस्ट गार्ड और सर्वे जहाजों की मौजूदगी भविष्य में वाणिज्यिक जहाजों की समुद्री आवाजाही को नियंत्रित या सीमित करने की संभावित तैयारी के रूप में इस्तेमाल हो सकती है। किसी युद्ध की स्थिति में ताइवान को समुद्र के रास्ते मिलने वाली आपूर्ति रोकना या नियंत्रित करना चीन के लिए महत्वपूर्ण रणनीति हो सकती है। इसी तरह समुद्र के भीतर लगातार सर्वेक्षण से मिलने वाली जानकारी संभावित पनडुब्बी अभियानों और समुद्री युद्ध की योजना में काम आ सकती है। इसलिए इन गतिविधियों को केवल “कोस्ट गार्ड की गश्त” मानकर नजरअंदाज करना जोखिम भरा होगा।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और बड़ा पहलू है—ताइवान का भूगोल। ताइवान पूर्वी एशिया में चीन और खुले प्रशांत महासागर के बीच बेहद महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। इसे तथाकथित First Island Chain का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह श्रृंखला जापान के आसपास से शुरू होकर ताइवान, फिलीपींस और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक जाती है। चीन के लिए इस क्षेत्र में अपनी समुद्री और सैन्य पहुंच बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जबकि अमेरिका, जापान, फिलीपींस और ताइवान के लिए यह क्षेत्र चीन की बढ़ती शक्ति को संतुलित करने की दृष्टि से अहम है।
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग से उसे अपने नियंत्रण में लेने का विकल्प खुला रखता है। दूसरी ओर अमेरिका समेत अधिकांश देश ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं देते, लेकिन वे ताइवान की मौजूदा स्थिति को बलपूर्वक बदलने के खिलाफ हैं। यही कारण है कि ताइवान के आसपास चीन की हर बड़ी सैन्य या समुद्री गतिविधि केवल बीजिंग और ताइपे के बीच का मामला नहीं रहती, बल्कि इसका असर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र और अमेरिका-चीन संबंधों पर पड़ता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि चीन की मौजूदगी किसी एक-दो दिन के सैन्य अभ्यास जैसी नहीं है। जून, जुलाई और अगस्त में गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। ताइवान के आंकड़ों में जून में 111, जुलाई में 117 और अगस्त के केवल पहले 24 दिनों में 118 गतिविधियां दर्ज होना बताता है कि यह एक लगातार चलने वाला पैटर्न बन रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक चीन पहले भी दूसरे विवादित समुद्री क्षेत्रों में किसी तत्काल घटना के जवाब के नाम पर अपनी मौजूदगी बढ़ाता रहा है और बाद में उस मौजूदगी को लंबे समय तक बनाए रखता है।
यही कारण है कि जापान और फिलीपींस के बीच समुद्री सीमा को लेकर बातचीत इस पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। समुद्री सीमा तय करने की प्रक्रिया कुछ महीनों में खत्म नहीं होती; इसमें कई साल लग सकते हैं। अगर चीन इस प्रक्रिया को अपनी मौजूदगी बढ़ाने के आधार के रूप में इस्तेमाल करता रहा तो उसके जहाजों की ताइवान के पूर्वी हिस्से में लगातार मौजूदगी लंबे समय तक बनी रह सकती है। यानी आज की अस्थायी गश्त भविष्य में स्थायी समुद्री मौजूदगी का रूप ले सकती है।
ताइवान के लिए खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उसका ज्यादातर ध्यान लंबे समय से चीन की सैन्य शक्ति और संभावित नाकेबंदी की आशंका पर रहा है। ताइवान हाल में अपने वार्षिक सैन्य अभ्यासों में भी संभावित चीनी समुद्री नाकेबंदी से निपटने की तैयारी करता रहा है। ऐसे में चीन का लगातार कोस्ट गार्ड और सर्वे जहाज भेजना ताइवान के लिए केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि वास्तविक सुरक्षा चुनौती है।
पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश साफ है—चीन शायद एक ही झटके में ताइवान के आसपास अपना नियंत्रण स्थापित करने के बजाय धीरे-धीरे समुद्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर नई वास्तविकता बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। ज्यादा जहाज, ज्यादा गश्त, ज्यादा सर्वे, व्यापारिक जहाजों की निगरानी और लगातार समुद्री मौजूदगी—इन सभी को एक साथ देखें तो तस्वीर ज्यादा गंभीर दिखाई देती है। यह जरूरी नहीं कि चीन तत्काल युद्ध की तैयारी कर रहा हो, लेकिन इतना स्पष्ट है कि बीजिंग ताइवान के आसपास अपनी समुद्री पहुंच, निगरानी और कानून-प्रवर्तन क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।
और यही वह स्थिति है जिस पर भारत सहित पूरे एशिया को गंभीरता से नजर रखनी होगी। क्योंकि ताइवान के आसपास किसी भी बड़े सैन्य या समुद्री संकट का असर केवल ताइवान तक सीमित नहीं रहेगा। जापान, फिलीपींस, अमेरिका और चीन सीधे प्रभावित होंगे, जबकि दुनिया की सप्लाई चेन, समुद्री व्यापार, सेमीकंडक्टर उद्योग और एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। ताइवान के आसपास बढ़ती चीनी गतिविधि इसलिए सिर्फ एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की एशियाई सुरक्षा व्यवस्था का बड़ा संकेत है।




