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दिल्ली प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद की समिति में हंगामा, विपक्ष ने मांगा जवाब

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026

दिल्ली में 20 जुलाई को हुए युवा प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित कार्रवाई और कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर मंगलवार को संसद की गृह मामलों की स्थायी समिति की बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। विपक्षी सदस्यों ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल के कथित अत्यधिक इस्तेमाल पर चर्चा की मांग की, लेकिन समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद राधा मोहन दास अग्रवाल ने इस मांग को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। इसके बाद बैठक में तीखी बहस हुई और विपक्षी सदस्यों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई।

बच्चों के अपराध पर बैठक, लेकिन उठ गया पुलिस कार्रवाई का मुद्दा

गृह मामलों की स्थायी समिति की बैठक का निर्धारित एजेंडा ‘बच्चों के खिलाफ अपराध’ था। बैठक में चार मंत्रालयों के अधिकारी भी मौजूद थे। लेकिन बैठक शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद अजय माकन ने समिति अध्यक्ष के सामने पहले भेजे गए अपने पत्र का मुद्दा उठाया। उन्होंने मांग की कि अन्य एजेंडा को फिलहाल अलग रखकर 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवा प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित कार्रवाई पर चर्चा की जाए।

माकन ने पुलिस द्वारा कथित रूप से अत्यधिक बल प्रयोग का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस मामले पर संसदीय स्तर पर चर्चा जरूरी है। विपक्ष का तर्क था कि जब प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं तो गृह मामलों से संबंधित संसदीय समिति को इस पर विचार करना चाहिए।

पैलेट गन के कथित इस्तेमाल पर विपक्ष के सवाल

विपक्षी सदस्यों ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा कथित रूप से पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि शांतिपूर्ण या लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग रखने वाले युवाओं के खिलाफ पुलिस बल के इस्तेमाल की शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़पों तथा बल प्रयोग से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग भी लगातार उठती रही है।

विपक्ष का कहना है कि अगर किसी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी थी तो उसकी जांच अलग विषय है, लेकिन पुलिस ने किस स्तर तक बल का इस्तेमाल किया और क्या वह परिस्थितियों के अनुपात में था, यह सवाल भी सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आता है।

अध्यक्ष ने कहा- मामला न्यायालय में विचाराधीन

समिति अध्यक्ष राधा मोहन दास अग्रवाल ने विपक्ष की मांग को स्वीकार नहीं किया। रिपोर्ट के अनुसार उनका कहना था कि मामला sub judice, यानी न्यायिक विचाराधीन है। इसी आधार पर उन्होंने इस मुद्दे को समिति की बैठक के एजेंडे में शामिल करने से इनकार किया। इस फैसले के बाद विपक्षी सदस्यों ने कड़ा विरोध जताया और बैठक में माहौल गर्म हो गया।

विपक्ष का सवाल है कि पुलिस कार्रवाई को लेकर तथ्यात्मक और प्रशासनिक पहलुओं पर संसदीय सवाल उठाना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप कैसे माना जा सकता है। हालांकि, इस मुद्दे पर समिति की अध्यक्षता कर रहे पक्ष का अपना कानूनी और प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण है।

प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई पर बढ़ी राजनीतिक बहस

20 जुलाई के प्रदर्शन को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। युवा प्रदर्शनकारियों की मांगों, पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान कथित बल प्रयोग को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। अब मामला संसद की स्थायी समिति तक पहुंचने से राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

विपक्ष इस घटना को युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों और पुलिस जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में प्रशासन की भूमिका और परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा। यही वजह है कि इस विवाद में राजनीतिक आरोपों से अलग तथ्यों और स्वतंत्र जांच का महत्व और बढ़ जाता है।

सवाल सिर्फ प्रदर्शन का नहीं, पुलिस जवाबदेही का भी

लोकतंत्र में प्रदर्शन और असहमति व्यक्त करने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या कानून-व्यवस्था भंग करने की स्थिति में पुलिस की जिम्मेदारी भी होती है। इसी तरह पुलिस को भी बल प्रयोग करते समय आवश्यकता, अनुपात और कानून की सीमाओं का पालन करना होता है।

इसलिए इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या पुलिस ने परिस्थितियों के अनुरूप कार्रवाई की या जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल हुआ? यदि अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप गलत हैं तो सरकार और पुलिस के पास तथ्यों के साथ उन्हें स्पष्ट करने का रास्ता होना चाहिए। और यदि कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

संसद में जवाबदेही का सवाल

गृह मामलों की स्थायी समिति में हुआ यह टकराव एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है—क्या संसद की समितियां ऐसे मामलों पर चर्चा का मंच बन सकती हैं जिनमें प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक अधिकार दोनों जुड़े हों? विपक्ष का कहना है कि संसदीय निगरानी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं समिति के अध्यक्ष ने न्यायिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए चर्चा रोक दी।

फिलहाल दिल्ली के 20 जुलाई के प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर सवाल बने हुए हैं। पुलिस कार्रवाई सही थी या अत्यधिक, प्रदर्शनकारियों की भूमिका क्या थी और कथित पैलेट गन के इस्तेमाल की वास्तविक स्थिति क्या थी—इन सवालों का अंतिम जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यात्मक साक्ष्यों से ही सामने आएगा।

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