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2029 में ही ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’? NDA के 22 राज्यों में बड़ा प्लान

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अगस्त 2026

2034 का इंतजार क्यों, 2029 में ही साथ चुनाव की तैयारी?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर दिल्ली से बड़ी राजनीतिक खबर सामने आई है। संसद की संयुक्त समिति जहां इस प्रस्ताव से जुड़े विधेयकों पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत विभिन्न पक्षों से विचार-विमर्श कर रही है, वहीं NDA के भीतर 2029 में ही देश में पहले बड़े स्तर पर एक साथ चुनाव कराने की संभावनाओं पर मंथन चलने की खबर है। मौजूदा विधायी प्रक्रिया का संभावित टाइमलाइन 2034 बताया जा रहा है, लेकिन अब NDA 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ 22 NDA-शासित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनावों को भी एक साथ कराने के विकल्प पर विचार कर रहा है। इसके लिए उन राज्यों की विधानसभाओं को उनका मौजूदा कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग करने की संभावना पर भी चर्चा बताई जा रही है।

NDA के पास 22 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश

मामले से परिचित एक सूत्र के मुताबिक NDA के 22 शासित राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में से 11 में अगले दो वर्षों के दौरान विधानसभा चुनाव होने हैं, यानी ये चुनाव 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रस्तावित मौजूदा चुनावी चक्र के तहत आते हैं। ऐसे में अगर 2029 में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की रणनीति आगे बढ़ती है, तो इन राज्यों की चुनावी समय-सारिणी को बदलना पड़ेगा। इसके लिए संबंधित विधानसभाओं को निर्धारित कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग करने का विकल्प विचाराधीन बताया जा रहा है। यह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं होगा, बल्कि इसके साथ संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन भी जरूरी होगा।

चार राज्यों में पहले से लोकसभा के साथ चुनाव

मौजूदा व्यवस्था में चार NDA-शासित राज्यों—आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा—में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही होते हैं। यानी इन राज्यों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। प्रस्तावित रणनीति का बड़ा सवाल यह है कि क्या इसी मॉडल को NDA के शासन वाले दूसरे राज्यों तक विस्तार दिया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो 2029 का लोकसभा चुनाव केवल केंद्र की सत्ता चुनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़ी संख्या में राज्यों की सरकारों के लिए भी एक साथ जनादेश का चुनाव बन सकता है।

सबसे बड़ा सवाल—कार्यकाल से पहले विधानसभा भंग होगी?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के तहत सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक राज्यों की मौजूदा विधानसभाओं के कार्यकाल का है। अगर किसी राज्य में चुनाव 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ कराना है, लेकिन उसकी विधानसभा का कार्यकाल उस तारीख से आगे तक है, तो उसे पहले भंग करने की जरूरत पड़ सकती है। यही वह बिंदु है जिस पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज हो सकती है। किसी निर्वाचित विधानसभा को उसका सामान्य कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग करने का फैसला राज्यों की राजनीति, सरकारों की स्थिरता और लोकतांत्रिक जनादेश से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए इस प्रस्ताव पर केवल चुनावी सुविधा के नजरिए से नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था और राज्यों के अधिकारों के संदर्भ में भी चर्चा जरूरी होगी।

चुनाव आयोग और कानून की भूमिका भी अहम

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनाव कराने की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया है। किसी विधानसभा के भंग होने के बाद चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की होती है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत विधानसभा भंग होने के बाद छह महीने के भीतर चुनाव कराना होता है। इसलिए यदि अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग करने का विकल्प अपनाया जाता है, तो चुनावी कार्यक्रम, विधानसभा की अवधि और लोकसभा के कार्यकाल के बीच तालमेल बैठाना बड़ी प्रशासनिक और संवैधानिक चुनौती होगी।

2034 बनाम 2029—अब असली बहस इसी पर

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की बहस अब केवल यह नहीं रह गई है कि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने चाहिए या नहीं। असली सवाल यह बनता जा रहा है कि अगर ऐसा करना है तो कब से किया जाए और मौजूदा चुनावी चक्र को कैसे बदला जाए। मौजूदा विधेयकों की टाइमलाइन 2034 बताई जा रही है, जबकि NDA के भीतर 2029 को ही पहला बड़ा अवसर बनाने की संभावना पर विचार होने की खबर है। अगर 2029 का विकल्प आगे बढ़ता है तो देश की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है और कई राज्यों के मौजूदा चुनावी कैलेंडर को पुनर्गठित करना पड़ेगा।

फैसला आसान नहीं, राजनीतिक असर बहुत बड़ा

इस पूरी कवायद का राजनीतिक असर भी व्यापक हो सकता है। एक साथ चुनाव कराने के समर्थक लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च कम होगा, चुनावी आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में आने वाली रुकावट घटेगी और सरकारों को लंबे समय तक नीतियों पर काम करने का अवसर मिलेगा। दूसरी तरफ, आलोचकों की चिंता यह है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने पर राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के स्थानीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं और राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। इसलिए 2029 में इसे लागू करने की कोई भी कोशिश सिर्फ चुनावी कैलेंडर बदलने का मामला नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक बड़े संस्थागत बदलाव की प्रक्रिया होगी। फिलहाल अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन NDA के भीतर 2029 को लेकर चल रही चर्चा ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

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