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छात्रों की आवाज़ सुन रहा कांग्रेस का ‘फोकस ग्रुप’, राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की तैयारी

प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर भर्ती में देरी और बेरोजगारी तक—छात्रों की समस्याओं को समझने के लिए कांग्रेस ने तीन शहरों में अब तक 16 संवाद सत्र किए

शिक्षा/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अगस्त 2026

युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश के तहत कांग्रेस देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों के साथ फोकस ग्रुप डिस्कशन कर रही है। इन बैठकों में छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं से सीधे बातचीत कर उनकी समस्याओं, अनुभवों और अपेक्षाओं को समझने की कोशिश की जा रही है। द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक तीन शहरों में ऐसे 16 सत्र आयोजित किए जा चुके हैं। इन संवादों से सामने आए मुद्दों और छात्रों के अनुभवों को कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों के लिए आधार बनाया जा रहा है।

कांग्रेस का यह प्रयास ऐसे समय में हो रहा है जब देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया, भर्ती परीक्षाओं के परिणाम में देरी, पेपर लीक के आरोप, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों में आयु सीमा जैसे मुद्दे युवाओं के बीच लगातार चर्चा में हैं। पार्टी का फोकस केवल परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन युवाओं की समस्याओं को भी सामने लाने की कोशिश है जो वर्षों तक सरकारी भर्ती का इंतजार करते हैं और प्रक्रिया लंबी खिंचने के कारण उम्र सीमा पार कर जाते हैं।

एक भर्ती परीक्षा, आठ साल का इंतजार और उम्र सीमा का संकट

बिहार का एक मामला इस समस्या की गंभीरता को समझने का उदाहरण है। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) ने वर्ष 2014 में वनरक्षक, सहायक अवर निरीक्षक, लोअर डिवीजन क्लर्क और स्टेनोग्राफर जैसे विभिन्न पदों के लिए रिक्तियां निकाली थीं। इन पदों के लिए लिखित परीक्षा 2018 में हुई, लेकिन परिणाम वर्ष 2022 में घोषित किया गया—यानी भर्ती विज्ञापन जारी होने के करीब आठ साल बाद।

पटना के 32 वर्षीय राकेश चंदन (बदला हुआ नाम) भी इस परीक्षा में शामिल हुए थे। उनका कहना है कि जब परिणाम आया, तब कई सफल अभ्यर्थी निर्धारित आयु सीमा पार कर चुके थे और इस वजह से नियुक्ति के लिए पात्र नहीं रह गए। यानी जिस सरकारी नौकरी के लिए युवाओं ने वर्षों तैयारी की, परीक्षा दी और परिणाम का इंतजार किया, उसी प्रक्रिया की लंबी अवधि ने कुछ उम्मीदवारों को नौकरी के लिए अयोग्य बना दिया।

यही वह समस्या है जिसे कांग्रेस अपने छात्र संवादों में प्रमुखता से उठाने की तैयारी कर रही है—अगर परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया में वर्षों लग जाएं तो उम्मीदवार की उम्र, करियर और भविष्य की जिम्मेदारी किसकी होगी?

‘छात्रों की गूंज’ में सामने आएगा युवाओं का अनुभव

राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों का उद्देश्य छात्रों को मंच देकर उनकी वास्तविक समस्याओं को सामने लाना बताया जा रहा है। प्रयागराज में 8 अगस्त को हुए कार्यक्रम में भी राहुल गांधी ने छात्रों से बातचीत की थी। कांग्रेस के फोकस ग्रुप इन कार्यक्रमों से पहले जमीनी स्तर पर युवाओं की चिंताओं को समझने का काम कर रहे हैं।

इन बैठकों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, भर्ती प्रक्रिया में देरी, परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों से जुड़े सवालों के अलावा युवाओं की शिक्षा और भविष्य से संबंधित व्यापक चिंताओं पर चर्चा की जा रही है। कांग्रेस इन संवादों के माध्यम से यह समझने की कोशिश कर रही है कि छात्रों की सबसे बड़ी परेशानी केवल नौकरी की कमी है या उससे पहले परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रिया पर भरोसे का संकट भी उतना ही बड़ा मुद्दा बन चुका है।

NEET विवाद के बीच युवाओं पर कांग्रेस का फोकस

यह पहल ऐसे समय में और महत्वपूर्ण हो जाती है जब प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों के विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हाल में NEET से जुड़े कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों और युवाओं के आंदोलनों ने सरकार और परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस छात्रों की शिकायतों को सीधे राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस के लिए यह सिर्फ छात्र राजनीति का सवाल नहीं है। देश की बड़ी युवा आबादी में प्रतियोगी परीक्षाएं सरकारी रोजगार हासिल करने का प्रमुख रास्ता हैं। जब परीक्षा आयोजित होने, परिणाम आने, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति तक की प्रक्रिया लंबी होती है, तो उम्मीदवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ता है। कई छात्र वर्षों तक कोचिंग, किराए, यात्रा और अध्ययन पर खर्च करने के बाद भी यह सुनिश्चित नहीं कर पाते कि उन्हें समय पर परिणाम या नियुक्ति मिलेगी।

सरकारी भर्ती व्यवस्था पर बड़ा सवाल

बिहार का उदाहरण इसी व्यापक समस्या की ओर इशारा करता है। किसी पद के लिए विज्ञापन निकलने और नियुक्ति होने के बीच यदि कई वर्ष गुजर जाएं, तो उम्मीदवारों की उम्र सीमा, परीक्षा पैटर्न, पाठ्यक्रम और व्यक्तिगत परिस्थितियां तक बदल सकती हैं। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया की समयबद्धता केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि अभ्यर्थियों के करियर और समान अवसर के अधिकार से जुड़ा विषय बन जाती है।

कांग्रेस इन मुद्दों को छात्रों की आवाज के रूप में पेश करने की तैयारी में है। फोकस ग्रुप से मिले अनुभवों को बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में उठाकर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि युवाओं की समस्याओं पर केवल चुनावी भाषणों में चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा और भर्ती व्यवस्था को लेकर संस्थागत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

हालांकि कांग्रेस के इन कार्यक्रमों का राजनीतिक उद्देश्य भी स्पष्ट है। विपक्षी पार्टी युवाओं और छात्रों के मुद्दों को सरकार के खिलाफ जवाबदेही के सवाल के रूप में पेश कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में ‘छात्रों की गूंज’ के मंच से प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती में देरी, बेरोजगारी और परीक्षा व्यवस्था को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से सरकार पर और तीखे सवाल उठाए जाने की संभावना है।

फिलहाल तीन शहरों में हुए 16 फोकस ग्रुप सत्र यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस छात्रों की समस्याओं को केवल विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि युवाओं के अनुभवों और शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से राजनीतिक एजेंडे में शामिल करने की कोशिश कर रही है। आने वाले कार्यक्रमों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन संवादों से सामने आने वाली छात्र-आवाजें किस तरह कांग्रेस की नीतियों और संसद में उसके सवालों का हिस्सा बनती हैं।

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