नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 17 अगस्त 2026
भारत में मैन्युअल स्कैवेंजिंग पर कानूनी प्रतिबंध है, लेकिन सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हर साल दर्जनों सफाईकर्मी जान गंवा देते हैं। सरकार के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर इस समस्या की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मौतों का आंकड़ा
संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (NCSK) के आंकड़ों में 1 जनवरी 2019 से 30 जून 2026 तक सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान 498 सफाईकर्मियों की मौत हुई। सालवार आंकड़े इस प्रकार हैं:
– 2019: 132 मौतें
– 2020: 34
– 2021: 62
– 2022: 88
– 2023: 65
– 2024: 54
– 2025: 47
– 2026 (जनवरी-जून): 16
जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच 18 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में 332 मौतें दर्ज हुईं। महाराष्ट्र, हरियाणा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और दिल्ली सबसे अधिक प्रभावित रहे। एक्टिविस्ट संगठन DASAM और सफाई कर्मचारी आंदोलन का कहना है कि असली आंकड़ा सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है, क्योंकि कई मौतें कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की होती हैं और उन्हें दर्ज नहीं किया जाता।
सरकार का रुख है कि “मैन्युअल स्कैवेंजिंग” से कोई मौत नहीं हुई। वह इन मौतों को “खतरनाक सीवर-सेप्टिक टैंक सफाई” की श्रेणी में रखती है। 2013 और 2018 के सर्वेक्षण में 58,098 मैन्युअल स्कैवेंजर पहचाने गए थे, लेकिन 2024-25 के नए सर्वेक्षण में सभी जिलों ने खुद को “मैन्युअल स्कैवेंजर-फ्री” घोषित कर दिया।
मुख्य समस्याएं
1. कानून और हकीकत का अंतर: 2013 का प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाता है। बिना सुरक्षा उपकरणों के खतरनाक सफाई भी प्रतिबंधित है। लेकिन जमीनी स्तर पर कॉन्ट्रैक्टर और स्थानीय निकाय अभी भी मजदूरों को मैनहोल में भेजते हैं।
2. सुरक्षा उपकरणों का अभाव: ज्यादातर मामलों में दस्ताने, मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर या गैस डिटेक्टर नहीं दिए जाते। जहरीली गैसें (हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन) ही मौत का मुख्य कारण बनती हैं।
3. जातीय और सामाजिक भेदभाव: सफाई का काम अभी भी मुख्य रूप से दलित समुदायों से जुड़े लोगों पर थोपा जाता है। यह काम सामाजिक कलंक से जुड़ा हुआ है।
4. कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम: स्थायी नौकरी कम, ठेकेदारों के जरिए काम ज्यादा। ठेकेदार जिम्मेदारी से बच जाते हैं।
5. मशीनीकरण अधूरा: NAMASTE योजना (2023) के तहत 89,000 से अधिक सफाईकर्मियों को वैलिडेट किया गया है और PPE उपलब्ध कराने की बात कही जाती है, लेकिन कई शहरों में मशीनें या तो नहीं हैं या उनका इस्तेमाल नहीं होता।
सरकार क्यों नहीं सुलझा पा रही?
– कार्यान्वयन की कमी: कानून मजबूत है, लेकिन एफआईआर और अभियोजन कमजोर। पिछले पांच वर्षों में सिर्फ 193 एफआईआर दर्ज हुईं। दोषियों पर सजा दुर्लभ है।
– जवाबदेही का अभाव: स्थानीय निकाय, ठेकेदार और अधिकारी अक्सर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं।
– आंकड़ों का खेल: “मैन्युअल स्कैवेंजिंग” और “खतरनाक सफाई” में फर्क करके सरकार मौतों को अलग श्रेणी में रखती है।
– राजनीतिक इच्छाशक्ति: मशीनीकरण और पुनर्वास पर बजट और निगरानी पर्याप्त नहीं। सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों (मुआवजा 30 लाख रुपये तक बढ़ाने सहित) के बावजूद मौतें जारी हैं।
– सामाजिक नजरिया: सफाईकर्मियों को “आवश्यक सेवा” मानने के बावजूद उनके जीवन की कीमत कम आंकी जाती है।
समाधान की दिशा
– हर मौत पर अनिवार्य एफआईआर और त्वरित मुआवजा।
– मैनहोल सफाई को पूरी तरह मशीनी बनाना।
– कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम खत्म कर स्थायी नौकरी और सामाजिक सुरक्षा।
– NAMASTE जैसी योजनाओं का जमीनी ऑडिट।
– सफाईकर्मियों को नीति-निर्माण में शामिल करना।
भारत में सफाईकर्मी शहरों को साफ रखते हैं, लेकिन खुद सबसे गंदा और खतरनाक काम करने को मजबूर हैं। कानून 13 साल पहले बन चुका है, योजनाएं चल रही हैं, फिर भी हर साल दर्जनों मौतें हो रही हैं। समस्या कानून की नहीं, उसके पालन और जवाबदेही की है। जब तक कोई अधिकारी या ठेकेदार जेल नहीं जाता और मशीनीकरण जमीनी हकीकत नहीं बनता, तब तक ये मौतें “दुर्घटना” नहीं, व्यवस्था की नाकामी ही कहलाएंगी।




