अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अगस्त 2026
सोशल मीडिया पर एक सामान्य बातचीत से शुरू होने वाला संपर्क किस तरह युवाओं को अपराध और कथित आतंकी नेटवर्क तक पहुंचा सकता है, सुरक्षा एजेंसियों की हालिया जांच ने इसकी गंभीर तस्वीर सामने रखी है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों में कई राज्यों की एजेंसियों ने ऐसे दर्जनों युवाओं का पता लगाया है, जिन्हें कथित तौर पर पाकिस्तान स्थित गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके सहयोगियों ने ऑनलाइन संपर्क के जरिए अपने नेटवर्क में शामिल किया। एजेंसियों का आरोप है कि यह नेटवर्क आईएसआई के निर्देश पर काम कर रहा था।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस नेटवर्क की नजर खासतौर पर ऐसे युवाओं पर होती थी जो आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, नशे की लत या शिक्षा की कमी जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हों। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खासकर इंस्टाग्राम के कमेंट सेक्शन और प्रोफाइल के जरिए संभावित युवाओं को तलाशने का आरोप है।
पहले दोस्ती, फिर पैसों का लालच
जांच से जुड़े अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि युवाओं से पहले सोशल मीडिया पर दोस्ती की जाती थी। भरोसा कायम होने के बाद उन्हें दूसरे मैसेजिंग ग्रुप में जोड़ा जाता और कथित तौर पर सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत के जरिए उनकी मानसिकता को प्रभावित करने की कोशिश की जाती। इसके बाद उन्हें छोटे-छोटे काम सौंपे जाने का आरोप है। शुरुआत में इन कामों के लिए कथित तौर पर 12 हजार से 25 हजार रुपये तक की रकम दी जाती थी। कुछ मामलों में यह राशि और भी कम बताई गई है।
काम की ‘सीढ़ी’ बढ़ती गई
रिपोर्ट के अनुसार, नेटवर्क में शामिल युवाओं को धीरे-धीरे अधिक गंभीर कामों की ओर ले जाने का कथित तरीका अपनाया जाता था। शुरुआत में किसी स्थान की निगरानी या वीडियो बनाने जैसे काम से लेकर आगे चलकर पुलिस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने तक की कथित ‘सीढ़ी’ तैयार की जाती थी। यानी आर्थिक जरूरत और आसान कमाई के लालच से शुरू हुआ संपर्क धीरे-धीरे युवाओं को ऐसे नेटवर्क में फंसा सकता था, जहां बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
कई राज्यों में सामने आए मामले
रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से जुड़े 23 वर्षीय अशरफ दानियाल (भीवांडी, महाराष्ट्र में रह रहे हैं), मुंबई के कुर्ला इलाके में काम करने वाले 21 वर्षीय साजिद मेहबूब शेख, गोरखपुर के 20 वर्षीय कृष्ण मिश्रा और पंजाब के गुरदासपुर के 19-22 वर्षीय युवाओं (अमरजीत सिंह, करनजीत सिंह और सतनाम सिंह) का उल्लेख किया गया है। यूपी एटीएस ने दानियाल और मिश्रा को गिरफ्तार किया था। दोनों से कथित तौर पर हथियार और मोबाइल फोन बरामद हुए थे। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल और महाराष्ट्र एटीएस ने भी कई गिरफ्तारियां की हैं। महाराष्ट्र एटीएस ने राज्यभर में 200 से अधिक संदिग्धों की पहचान की है, जिन्होंने कथित तौर पर इन खातों से इंटरैक्ट किया था।
इन मामलों की जांच उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र की एजेंसियों के साथ एनआईए ने भी की है। अधिकारियों के अनुसार, युवाओं को कथित तौर पर सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में लाकर ‘स्लीपर सेल’ के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की गई।
मामला सिर्फ सुरक्षा का नहीं, युवाओं की कमजोरी का भी
इन घटनाओं से एक बड़ा सवाल यह भी सामने आता है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर युवाओं को ऑनलाइन नेटवर्क किस तरह आसानी से अपने प्रभाव में ले सकते हैं। ऐसे मामलों में सिर्फ गिरफ्तारी और कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। परिवार, स्कूल, स्थानीय प्रशासन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—सभी के स्तर पर युवाओं को ऑनलाइन कट्टरपंथ, अपराध और लालच के जाल से बचाने की चुनौती है।
सोशल मीडिया आज अवसर का मंच है, लेकिन कमजोर परिस्थितियों में फंसे युवाओं के लिए यही मंच शोषण और अपराध का रास्ता भी बन सकता है। पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स और आईएसआई की कथित भूमिका की जांच अपने स्थान पर है, लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि आर्थिक मजबूरी, बेरोजगारी और डिजिटल अकेलेपन से जूझ रहे भारतीय युवाओं को ऐसे नेटवर्क अपने निशाने पर क्यों और कैसे ले पा रहे हैं।




