मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 15 अगस्त 2026
15 अगस्त 1947 को जब भारत ने आजादी की पहली सुबह देखी, तब देश के पास सपने बहुत थे और साधन सीमित। लेकिन इसी दौर में भारतीय सिनेमा भी अपने नए सफर पर निकल रहा था। फिल्मों की दुनिया तब आज की तरह चमकदार नहीं थी—न मल्टीप्लेक्स थे, न डिजिटल कैमरे, न सोशल मीडिया और न ही करोड़ों रुपये के भव्य प्रचार अभियान। फिर भी सिनेमा के पास एक ऐसी ताकत थी, जो आज भी कायम है—कहानी कहने की ताकत। आजादी के बाद भारतीय फिल्में सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं; उन्होंने बदलते भारत को देखा, समझा और कई बार उसे बदलने की कोशिश भी की। खेतों से लेकर शहरों तक, गरीबी से लेकर सपनों तक, प्रेम से लेकर राजनीति तक और सामाजिक संघर्ष से लेकर राष्ट्रवाद तक—भारतीय सिनेमा ने हर दौर की धड़कन को पर्दे पर उतारा।
1950 का दशक: नया देश, नए सपने और सिनेमा का सुनहरा जन्म
आजादी के बाद का भारत संघर्षों से भरा था। इसी संघर्ष की छाया फिल्मों में भी दिखाई दी। राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद जैसे सितारों ने एक नई फिल्मी त्रिमूर्ति को जन्म दिया। राज कपूर की फिल्मों का आम आदमी, दिलीप कुमार का गंभीर और संघर्षशील नायक तथा देव आनंद का शहरी आकर्षण—इन तीनों ने मिलकर उस दौर के भारतीय दर्शक के सपनों को आवाज दी।
‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्मों में भारत की गरीबी, मेहनतकश आदमी, सामाजिक असमानता और बेहतर भविष्य की चाह दिखाई दी। पर्दे पर किसान केवल कहानी का पात्र नहीं था, बल्कि वह नए भारत की पहचान था। ‘मदर इंडिया’ की राधा में भारतीय नारी, किसान और संघर्षशील भारत—तीनों की तस्वीर दिखाई दी। सिनेमा उस समय लोगों को केवल हंसाता या रुलाता नहीं था, वह उन्हें अपने देश और समाज के बारे में सोचने के लिए भी मजबूर करता था।
1960 का दशक: रंग, रोमांस और देशभक्ति का दौर
जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ा, फिल्मों का मिजाज भी बदलने लगा। रंगीन फिल्मों का आकर्षण बढ़ा और पर्दे पर रोमांस ने ज्यादा जगह बनाई। राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर, धर्मेंद्र, वैजयंतीमाला, वहीदा रहमान और साधना जैसे कलाकार दर्शकों के दिलों पर छाने लगे।
इसी दशक में देशभक्ति फिल्मों ने भी अपनी अलग पहचान बनाई। ‘हकीकत’ जैसी फिल्मों ने युद्ध और सैनिकों के बलिदान को पर्दे पर उतारा। गीत फिल्मों की आत्मा बन चुके थे। मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार और मुकेश की आवाजें देश के घर-घर में गूंजने लगीं। रेडियो पर बजता फिल्मी गीत उस दौर के भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गया।
1970 का दशक: जब आया ‘एंग्री यंग मैन’
फिर भारतीय सिनेमा में एक ऐसा मोड़ आया जिसने हिंदी फिल्मों की पूरी भाषा बदल दी। देश बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा था और पर्दे पर एक ऐसा नायक आया जो व्यवस्था से सवाल करता था।
अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ इसी बेचैनी की आवाज बन गया। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘डॉन’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को नई ऊर्जा दी। अमिताभ सिर्फ अभिनेता नहीं रहे; वे एक पूरे दौर की भावनाओं का चेहरा बन गए।
‘शोले’ ने तो भारतीय सिनेमा की परिभाषा ही बदल दी। दोस्ती, बदला, प्रेम, हास्य, एक्शन और संगीत—सब कुछ एक ही फिल्म में मिला। गब्बर सिंह से लेकर जय-वीरू तक के किरदार भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए। सिनेमा हॉल में सीटियां और तालियां बजना फिल्म की सफलता का पैमाना बन गया।
1980 का दशक: मसाला फिल्मों का राज
1980 के दशक में हिंदी सिनेमा पूरी तरह ‘मसाला’ दौर में पहुंच गया। एक ही फिल्म में एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, परिवार, खलनायक और दर्जनों गीत—दर्शक को पूरा मनोरंजन एक ही टिकट में मिलता था।
धर्मेंद्र, अनिल कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, श्रीदेवी, रेखा, हेमा मालिनी और जया प्रदा जैसे सितारों ने पर्दे पर अपनी मजबूत पहचान बनाई। दक्षिण भारतीय सिनेमा भी हिंदी दर्शकों तक तेजी से पहुंचने लगा। इसी समय वीडियो कैसेट ने मनोरंजन की दुनिया को बदलना शुरू किया। अब फिल्म देखने के लिए केवल सिनेमाघर ही एकमात्र रास्ता नहीं रहा।
लेकिन इस दौर में समानांतर सिनेमा भी अपनी अलग पहचान बना रहा था। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सत्यजीत रे, मृणाल सेन और नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों और फिल्मकारों ने समाज की जटिल कहानियों को गंभीरता से पर्दे पर रखा।
1990 का दशक: उदारीकरण, केबल टीवी और प्रेम की वापसी
1991 के आर्थिक बदलावों के बाद भारत बदल रहा था और बॉलीवुड भी। केबल टीवी घरों में पहुंचा, विदेशी चैनल आए और भारतीय युवाओं की जीवनशैली तेजी से बदलने लगी। सिनेमा में भी एक नया रोमांस आया।
और फिर आया ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का दौर।
शाहरुख खान और काजोल की जोड़ी ने प्रेम को एक नए अंदाज में पेश किया—जहां प्रेमी सिर्फ परिवार से भागता नहीं, बल्कि परिवार को साथ लेकर अपना प्यार जीतना चाहता है। इसके साथ आमिर खान और सलमान खान भी नई पीढ़ी के बड़े सितारे बनकर उभरे।
‘हम आपके हैं कौन’, ‘दिल तो पागल है’, ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ जैसी फिल्मों ने परिवार, दोस्ती और प्रेम को बड़े पर्दे पर नए रंग दिए। फिल्मी शादियां, गीत और डांस भारतीय सामाजिक कल्पना का हिस्सा बन गए।
2000 का दशक: मल्टीप्लेक्स और नई कहानी
नई सदी के साथ सिनेमा भी बदलने लगा। मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने दर्शकों को अलग-अलग तरह की फिल्मों के लिए जगह दी। अब केवल बड़े बजट की मसाला फिल्में ही नहीं, बल्कि छोटे बजट की मजबूत कहानियां भी सफल होने लगीं।
‘लगान’, ‘दिल चाहता है’, ‘रंग दे बसंती’, ‘स्वदेस’, ‘3 इडियट्स’, ‘तारे जमीन पर’ जैसी फिल्मों ने युवाओं, शिक्षा, राष्ट्र और समाज से जुड़े सवालों को मनोरंजन के साथ जोड़ा। आमिर खान ने कहानी-केंद्रित सिनेमा को नई ताकत दी, जबकि शाहरुख खान और सलमान खान ने स्टारडम की अपनी अलग दुनिया कायम रखी।
दूसरी ओर क्षेत्रीय सिनेमा भी तेजी से मजबूत हुआ। तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और मराठी फिल्मों की कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर दर्शकों तक पहुंचने लगीं।
2010 का दशक: सिनेमा ने तोड़ी कई सीमाएं
इस दशक में भारतीय सिनेमा ने विषयों के स्तर पर बड़ी छलांग लगाई। ‘दंगल’, ‘बाहुबली’, ‘पीके’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘क्वीन’, ‘पिंक’, ‘आर्टिकल 15’, ‘उरी’ जैसी फिल्मों ने अलग-अलग तरह की कहानियों को लोकप्रिय बनाया।
विशेष रूप से ‘बाहुबली’ ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा भव्यता और तकनीक के मामले में दुनिया के बड़े फिल्म उद्योगों को चुनौती दे सकता है। दक्षिण भारतीय फिल्मों का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ा और हिंदी सिनेमा की पारंपरिक सीमाएं कमजोर होने लगीं।
इसी दौर में महिला-केंद्रित कहानियों ने भी मजबूत जगह बनाई। ‘क्वीन’, ‘पीकू’, ‘पिंक’, ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों ने महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और सामाजिक दबाव जैसे विषयों को मुख्यधारा में लाया।
फिर आया OTT: घर ही बन गया सिनेमा हॉल
और फिर मनोरंजन की दुनिया में वह बदलाव आया जिसने दर्शक और पर्दे के बीच की दूरी लगभग खत्म कर दी—OTT।
अब फिल्म देखने के लिए सिनेमाघर जाना जरूरी नहीं था। मोबाइल उठाइए, इंटरनेट चलाइए और दुनिया भर की कहानियां आपके हाथ में। वेब सीरीज ने कहानी कहने का समय बढ़ा दिया। आठ-दस एपिसोड में वह कहानी कही जाने लगी जिसे पहले दो-ढाई घंटे में समेटना पड़ता था।
OTT ने नए कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को भी अवसर दिया। अपराध, राजनीति, सामाजिक संघर्ष, ग्रामीण जीवन, रिश्ते और मनोवैज्ञानिक कहानियां नए अंदाज में सामने आईं। दर्शक भी बदल गया—अब वह केवल स्टार का नाम देखकर फिल्म देखने नहीं जाता, बल्कि कहानी, समीक्षा और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया भी उसके फैसले को प्रभावित करती है।
2020 के बाद: थिएटर बनाम OTT और ‘कंटेंट’ की नई ताकत
कोरोना महामारी ने फिल्म उद्योग को अभूतपूर्व झटका दिया। सिनेमाघर बंद हुए और OTT मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरा। लेकिन थिएटर खत्म नहीं हुए। महामारी के बाद ‘KGF’, ‘RRR’, ‘पुष्पा’, ‘जवान’, ‘पठान’, ‘गदर 2’ और कई अन्य फिल्मों की सफलता ने दिखाया कि बड़े पर्दे का जादू अभी बाकी है।
फर्क सिर्फ इतना आया कि दर्शक अब ज्यादा समझदार और चयनशील हो चुका है। वह अच्छी कहानी के लिए भाषा की दीवार पार कर लेता है। दक्षिण की फिल्में उत्तर भारत में हिट होती हैं और हिंदी फिल्मों को दक्षिण में दर्शक मिलते हैं। भारतीय सिनेमा अब धीरे-धीरे ‘बॉलीवुड’ से आगे बढ़कर एक बड़े इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की पहचान बना रहा है।
सिनेमा ने भारत को भी बदला और भारत ने सिनेमा को भी
आजादी के बाद भारतीय फिल्मों को देखें तो उनमें सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्री नहीं दिखाई देते, बल्कि भारत की बदलती तस्वीर दिखाई देती है। 1950 का किसान, 1970 का गुस्सैल युवा, 1990 का प्रेम में डूबा मध्यमवर्गीय परिवार, 2000 का महत्वाकांक्षी युवा और आज का डिजिटल युग का स्वतंत्र सोच वाला दर्शक—हर पीढ़ी ने अपने समय की कहानी फिल्मों में देखी है।
कभी फिल्म का नायक गरीबी से लड़ता था, फिर भ्रष्ट व्यवस्था से भिड़ा, उसके बाद प्रेम और परिवार के लिए संघर्ष करने लगा और आज वह मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, पहचान, पर्यावरण, शिक्षा, युद्ध, तकनीक और सामाजिक न्याय जैसे जटिल विषयों पर भी बात करता है।
गीतों के बिना भारतीय सिनेमा की कहानी अधूरी है
भारतीय फिल्मों की एक खास पहचान उसका संगीत है। आजादी के बाद से लेकर आज तक फिल्मी गीतों ने पीढ़ियों को जोड़ा है। साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलजार, आनंद बख्शी जैसे गीतकारों ने प्रेम के साथ समाज और जीवन की सच्चाइयों को भी शब्द दिए।
लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, आशा भोसले, मुकेश से लेकर कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याग्निक, सोनू निगम, श्रेया घोषाल और आज की नई पीढ़ी तक—भारतीय सिनेमा की संगीत यात्रा भी अपने आप में एक शानदार इतिहास है।
सितारों से आगे: अब कहानी भी स्टार है
एक समय था जब किसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा नाम अभिनेता या अभिनेत्री होता था। आज समीकरण बदल रहा है। दर्शक कहता है—“कहानी अच्छी है तो फिल्म चलेगी।”
यही भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। स्टारडम आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन मजबूत कहानी, शानदार अभिनय और नए विषयों ने अपनी स्वतंत्र जगह बना ली है।
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े फिल्म बाजारों में है। अलग-अलग भाषाओं में हर वर्ष सैकड़ों फिल्में बनती हैं और भारतीय कलाकार तथा तकनीशियन वैश्विक परियोजनाओं में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।
80 साल का फिल्मी सफर: असली कहानी अभी बाकी है
1947 में भारत आजाद हुआ था। उसी दौर में भारतीय सिनेमा भी अपने नए अध्याय लिख रहा था। तब पर्दे पर भारत अपने संघर्ष को देखता था। आज वह अपने सपनों को देख रहा है।
राज कपूर के आवारा से लेकर अमिताभ के एंग्री यंग मैन तक, शाहरुख के राज से लेकर बाहुबली के महेंद्र बाहुबली तक और थिएटर की टिकट से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक—भारतीय सिनेमा ने लगभग हर भारतीय के जीवन का कोई न कोई हिस्सा अपने भीतर समेट लिया है।
सिनेमा ने हमें हंसाया, रुलाया, डराया, प्रेम करना सिखाया, सवाल पूछना सिखाया और कई बार आईना भी दिखाया। यही कारण है कि भारत की फिल्मी कहानी केवल फिल्मों की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो आजादी के बाद बदला, सपने देखने लगा, संघर्ष करता रहा और हर नई पीढ़ी के साथ अपने पर्दे का रंग भी बदलता गया।
आजादी के 80वें वर्ष में अगर भारत की यात्रा को एक फिल्म माना जाए, तो अब तक उसके कई शानदार दृश्य आ चुके हैं—लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फिल्म की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अगला दृश्य उस भारत का है, जो दुनिया को केवल फिल्में नहीं दिखाएगा, बल्कि अपनी कहानियों से दुनिया को प्रभावित भी करेगा।




