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स्वतंत्रता दिवस विशेष : पूर्वोत्तर में विद्रोह की दशकों पुरानी कहानी—बहिष्कार के पीछे क्या है?

पूर्वोत्तर की आवाज, भारत की ताकत : पूर्वोत्तर में विद्रोह और स्वतंत्रता दिवस के बहिष्कार की अपील को सिर्फ सुरक्षा का सवाल मानना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे पहचान, जमीन, राजनीतिक आकांक्षाओं और लंबे समय की असहमति की परतें हैं। समाधान का रास्ता सुरक्षा के साथ संवाद, विकास के साथ स्थानीय भागीदारी और राष्ट्रीय एकता के साथ सांस्कृतिक सम्मान से निकलता है। कुछ सशस्त्र संगठनों की आवाज को पूरे पूर्वोत्तर की आवाज मानना भी सही नहीं होगा। भारत की असली ताकत यही है कि विविध पहचानें साथ रहकर एक मजबूत राष्ट्र बनाती हैं। पूर्वोत्तर मजबूत होगा, तो भारत और मजबूत होगा। 🇮🇳

अर्पण आनंद शर्मा और अदिति सिंह | फैकल्टी ऑफ आर्ट्स, मीडिया एंड डिजाइन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अगस्त 2026

आजादी का उत्सव और पूर्वोत्तर का एक अलग सवाल

भारत जब 15 अगस्त को अपनी स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब देश के पूर्वोत्तर हिस्से से कुछ अलग आवाजें भी सुनाई दे रही हैं। 10 अगस्त को यूएलएफए-आई (ULFA-I) और एनएससीएन-वाईए (NSCN-YA) जैसे सशस्त्र संगठनों ने स्वतंत्रता दिवस समारोहों के बहिष्कार का आह्वान किया। इन संगठनों ने लोगों से घरों में रहने और राष्ट्रीय समारोहों में हिस्सा नहीं लेने की अपील की है। उनके तर्कों में अलग पहचान, इतिहास, जमीन, राजनीतिक अधिकार और लंबे समय से चली आ रही असहमति जैसे मुद्दे शामिल हैं। यह स्थिति निश्चित रूप से गंभीर है, लेकिन इसे केवल सुरक्षा की समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे इतिहास, पहचान, विकास, स्थानीय आकांक्षाओं और संवाद की कई परतें हैं। इसलिए जरूरी है कि इस विषय को भावनाओं के बजाय समझदारी, संवाद और राष्ट्रीय एकता की भावना से देखा जाए।

पूर्वोत्तर आखिर इतना अलग क्यों महसूस करता है?

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद खास है। यहां अनेक जनजातियां, भाषाएं, परंपराएं और जीवनशैलियां हैं। पहाड़, जंगल, नदियां और सीमावर्ती क्षेत्र इसकी पहचान का हिस्सा हैं। असम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम—हर राज्य की अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है। यही विविधता भारत की ताकत भी है। लेकिन जब किसी समुदाय को लगता है कि उसकी भाषा, संस्कृति, जमीन या स्थानीय परंपराओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा, तो असंतोष पैदा हो सकता है। इसलिए पूर्वोत्तर की समस्या को केवल ‘मुख्यधारा बनाम पूर्वोत्तर’ के रूप में देखना उचित नहीं होगा। बेहतर रास्ता यह है कि पूर्वोत्तर की विशिष्ट पहचान को भारत की व्यापक राष्ट्रीय पहचान के भीतर सम्मान और स्थान दिया जाए।

‘डब्ल्यूईएसईए’ की सोच क्या है?

यूएलएफए-आई और एनएससीएन-वाईए जैसे संगठन पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों को ‘डब्ल्यूईएसईए’ यानी वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया जैसे अलग भौगोलिक और राजनीतिक विचार से जोड़ते हैं। उनका दावा है कि क्षेत्र का अपना अलग इतिहास और राजनीतिक अस्तित्व रहा है। इसी सोच के आधार पर वे भारतीय स्वतंत्रता दिवस को अपनी दृष्टि से अलग तरीके से देखते हैं। हालांकि यह विचार पूरे पूर्वोत्तर या वहां रहने वाले सभी लोगों की सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करता। आज इस क्षेत्र के करोड़ों लोग भारतीय लोकतंत्र, शिक्षा, रोजगार, व्यापार, खेल, सेना, प्रशासन और राष्ट्रीय जीवन के दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसलिए कुछ सशस्त्र संगठनों की विचारधारा और पूरे पूर्वोत्तर के लोगों की इच्छा को एक जैसा मानना सही नहीं होगा।

बहिष्कार की राजनीति नई नहीं है

पूर्वोत्तर में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के बहिष्कार का आह्वान कई दशकों से अलग-अलग विद्रोही संगठनों की रणनीति का हिस्सा रहा है। ऐसे संगठनों के पास अपनी राजनीतिक मांगें हैं और वे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में लोगों को राष्ट्रीय कार्यक्रमों से दूर रहने के लिए कहते रहे हैं। लेकिन समय के साथ हालात में बड़ा बदलाव आया है। कई विद्रोही संगठनों ने हथियार छोड़े हैं, शांति समझौतों का रास्ता चुना है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हुए हैं। इससे यह साबित होता है कि संवाद और राजनीतिक समाधान की संभावना हमेशा बनी रहती है। जहां बातचीत ने रास्ता खोला है, वहां हिंसा की जगह विकास और सामान्य जीवन को आगे बढ़ने का अवसर मिला है।

सिर्फ सुरक्षा नहीं, भरोसा भी जरूरी

पूर्वोत्तर में उग्रवाद से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। जहां हिंसा या सशस्त्र गतिविधि का खतरा हो, वहां नागरिकों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही, केवल सुरक्षा उपायों से स्थायी समाधान संभव नहीं होता। लंबे समय की शांति के लिए सुरक्षा के साथ संवाद और भरोसा भी जरूरी है। सरकार और स्थानीय समुदायों के बीच लगातार बातचीत, युवाओं की भागीदारी, स्थानीय नेताओं की भूमिका और समाज के अलग-अलग समूहों के बीच संवाद को मजबूत किया जा सकता है। इससे उन लोगों को भी लोकतांत्रिक रास्ता मिलता है जो अपनी समस्याओं को सामने रखना चाहते हैं।

शांति समझौतों ने बदली है तस्वीर

पिछले वर्षों में पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में शांति समझौतों के जरिए सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। कई संगठनों के सदस्यों ने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन अपनाया है। कुछ पूर्व उग्रवादी राजनीति, सामाजिक कार्य, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं। असम, मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैंड सहित कई क्षेत्रों में संवाद और समझौतों ने हिंसा कम करने में भूमिका निभाई है। यह अनुभव बताता है कि जब राजनीतिक मांगों को बातचीत की मेज पर लाया जाता है और सभी पक्ष समाधान खोजने की कोशिश करते हैं, तो लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का रास्ता निकल सकता है।

विकास ने बदली है जमीन की तस्वीर

आज का पूर्वोत्तर कई मायनों में कुछ दशक पहले के पूर्वोत्तर से अलग है। सड़कों और पुलों का विस्तार हुआ है, रेल संपर्क बढ़ा है, हवाई संपर्क मजबूत हुआ है और इंटरनेट ने दूरियां कम की हैं। शिक्षा, पर्यटन, स्वास्थ्य, कारोबार और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में भी नए अवसर बने हैं। युवा अब देश के दूसरे हिस्सों में पढ़ाई और रोजगार के लिए जा रहे हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों के युवा पूर्वोत्तर में नए अवसर तलाश रहे हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं है। बेहतर संपर्क लोगों के बीच संवाद और आपसी समझ भी बढ़ाता है। इसलिए विकास और कनेक्टिविटी पूर्वोत्तर में लंबे समय की शांति के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

लेकिन विकास का अगला कदम क्या होना चाहिए?

विकास का अर्थ केवल बड़ी सड़क या पुल बनाना नहीं है। आम नागरिक के लिए विकास तब महसूस होता है जब उसके गांव में अच्छी सड़क हो, बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, अस्पताल तक समय पर पहुंच हो, इंटरनेट उपलब्ध हो और स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार के अवसर मिलें। इसलिए पूर्वोत्तर में विकास की अगली प्राथमिकता स्थानीय जरूरतों के अनुरूप रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, कृषि, छोटे उद्योग और कौशल विकास को बढ़ावा देना हो सकती है। स्थानीय युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि उद्यमी और रोजगार देने वाला बनाने पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

जमीन और पहचान—सबसे संवेदनशील मुद्दे

पूर्वोत्तर में जमीन और पहचान का सवाल बेहद संवेदनशील है। कई समुदायों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का हिस्सा है। इसलिए किसी भी बड़े विकास कार्य में स्थानीय लोगों की बात सुनना और उनकी चिंताओं को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय समुदायों से समय पर संवाद, उचित पुनर्वास, पारदर्शी प्रक्रिया और पर्यावरणीय संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे विकास और स्थानीय हितों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।

युवाओं को बनाना होगा शांति का सबसे बड़ा साथी

पूर्वोत्तर की बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। अगर युवाओं को अच्छी शिक्षा, कौशल, खेल, रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिलते हैं तो वे किसी भी क्षेत्र की तस्वीर बदल सकते हैं। इसके लिए विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, स्टार्टअप कार्यक्रमों, खेल सुविधाओं और स्थानीय उद्योगों को और मजबूत किया जा सकता है। संगीत, फिल्म, खेल, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए बड़ी संभावनाएं हैं। जब युवा के सामने भविष्य का स्पष्ट रास्ता होता है, तो हिंसा और बंद रास्तों की राजनीति की जगह अवसर और विकास अधिक आकर्षक बनते हैं।

राष्ट्रीय एकता का अर्थ एक जैसी पहचान नहीं

भारत की खूबसूरती इस बात में है कि यहां एकता के लिए हर व्यक्ति का एक जैसा होना जरूरी नहीं है। नागालैंड की संस्कृति अलग हो सकती है, असम की भाषा और परंपरा अलग हो सकती है, मणिपुर की सामाजिक संरचना अलग हो सकती है और अरुणाचल की जनजातीय विविधता अलग हो सकती है—फिर भी सभी भारत की व्यापक राष्ट्रीय यात्रा का हिस्सा हैं। इसलिए राष्ट्रीय एकता का अर्थ स्थानीय पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान देते हुए साथ आगे बढ़ना है। विविधता को सम्मान और राष्ट्र को साझा पहचान—यही संतुलन पूर्वोत्तर के लिए सबसे मजबूत रास्ता हो सकता है।

बहिष्कार की अपील और आम नागरिक की इच्छा

कुछ सशस्त्र संगठनों द्वारा बहिष्कार की अपील चिंता का विषय हो सकती है, लेकिन इसे पूरे पूर्वोत्तर के लोगों की राय मानना उचित नहीं होगा। आज क्षेत्र के अनेक नागरिक स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तिरंगा फहराते हैं, राष्ट्रीय संस्थानों में काम करते हैं, सेना और सुरक्षा बलों में सेवा देते हैं, खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और देश के विकास में योगदान करते हैं। इससे पता चलता है कि जमीन पर तस्वीर केवल विरोध की नहीं है। वहां सामान्य जीवन, विकास और बेहतर भविष्य की आकांक्षा भी उतनी ही मजबूत है।

आगे का रास्ता—सुरक्षा, संवाद और विकास साथ-साथ

पूर्वोत्तर में स्थायी शांति के लिए तीन चीजें साथ लेकर चलना उपयोगी होगा—सुरक्षा, संवाद और विकास। जहां हिंसा का खतरा है वहां नागरिकों की सुरक्षा जरूरी है। जहां राजनीतिक या सामाजिक शिकायतें हैं वहां बातचीत का रास्ता खुला रहना चाहिए। और जहां विकास की जरूरत है वहां सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और डिजिटल कनेक्टिविटी को स्थानीय आवश्यकताओं के साथ आगे बढ़ाना चाहिए। इन तीनों में संतुलन जितना बेहतर होगा, उतना ही स्थायी समाधान की संभावना बढ़ेगी।

भारत@80—पूर्वोत्तर की आवाज भी भारत की आवाज है

भारत की 80 साल की यात्रा तभी पूरी दिखाई देगी जब इसमें देश के हर हिस्से की कहानी शामिल हो। पूर्वोत्तर की कहानी केवल विद्रोह और सुरक्षा की कहानी नहीं है। यह प्रतिभा, संस्कृति, खेल, संगीत, प्रकृति, उद्यमिता और विकास की भी कहानी है। आज जरूरत इस बात की है कि कुछ सशस्त्र संगठनों की असहमति को पूरे क्षेत्र की पहचान न माना जाए और न ही क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज किया जाए। लोकतांत्रिक भारत में असहमति के लिए भी रास्ता है और समाधान के लिए भी। आने वाले वर्षों में अगर पूर्वोत्तर में सुरक्षा के साथ भरोसा, विकास के साथ स्थानीय भागीदारी और राष्ट्रीय एकता के साथ सांस्कृतिक सम्मान को और मजबूत किया जाता है, तो यह क्षेत्र भारत की सबसे बड़ी विकास और समृद्धि की कहानियों में से एक बन सकता है।

स्वतंत्रता दिवस का संदेश—साथ चलने का संकल्प

15 अगस्त केवल आजादी का उत्सव नहीं, बल्कि यह याद करने का दिन भी है कि भारत की ताकत उसके लोगों की विविधता और एकजुटता में है। पूर्वोत्तर की चुनौतियां आसान नहीं हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएं भी उतनी ही मजबूत हैं। हिंसा की जगह संवाद, अलगाव की जगह सहभागिता, अविश्वास की जगह भरोसा और सीमित अवसरों की जगह विकास के नए रास्ते—यही भविष्य की दिशा हो सकती है। भारत की आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा संकल्प यही हो सकता है कि देश का कोई भी क्षेत्र खुद को पीछे छूटा हुआ महसूस न करे और हर नागरिक को यह भरोसा मिले कि उसकी पहचान, उसकी आवाज और उसका भविष्य भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूर्वोत्तर मजबूत होगा तो भारत और मजबूत होगा।

_ डॉ. निपुनिका शाहिद, सहायक प्रोफेसर, कला, मीडिया एवं डिजाइन संकाय, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के मार्गदर्शन में।

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