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स्वतंत्रता दिवस विशेष : विकास की रफ्तार और आम आदमी की हिस्सेदारी—भारत की बदलती तस्वीर

भारत की 80 साल की विकास यात्रा केवल बड़े शहरों, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, हवाई अड्डों और औद्योगिक गलियारों की कहानी नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की कहानी भी है, जिनके श्रम ने इस बदलते भारत की नींव रखी है। विकास ने देश को नई गति दी है, नई सुविधाएं दी हैं और नए अवसर खोले हैं। अब अगली बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि विकास की इस रफ्तार में मजदूर, किसान, आदिवासी समुदाय और विस्थापित परिवार भी समान रूप से सुरक्षित, सम्मानित और सहभागी महसूस करें। भारत की असली ताकत तब और बढ़ेगी, जब विकास की ऊंचाई और आम नागरिक की जिंदगी की गुणवत्ता एक साथ ऊपर उठे। 🇮🇳

अनन्या बार्थवाल, लावण्या मिश्रा, नंदिनी राज और प्रीति | फैकल्टी ऑफ आर्ट्स, मीडिया एंड डिजाइन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अगस्त 2026

80 साल की यात्रा—बदलते भारत की सबसे बड़ी तस्वीर

स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में भारत को देखें तो तस्वीर बेहद तेजी से बदलती हुई दिखाई देती है। जिन जगहों पर कभी गांवों की पगडंडियां थीं, वहां आज एक्सप्रेसवे दिखाई देते हैं। जिन शहरों में कभी सार्वजनिक परिवहन सीमित था, वहां मेट्रो नेटवर्क फैल रहा है। नए हवाई अड्डे, रेलवे कॉरिडोर, औद्योगिक गलियारे, पुल, बंदरगाह और डिजिटल सुविधाएं भारत की विकास यात्रा की नई पहचान बन रहे हैं। यह बदलाव केवल सरकारी परियोजनाओं या बड़े निवेश का परिणाम नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की मेहनत, उद्यम और उम्मीदों से भी जुड़ा है। लेकिन विकास की यह कहानी हमें एक और महत्वपूर्ण सवाल की ओर ले जाती है—क्या विकास का लाभ उन लोगों तक भी उसी मजबूती से पहुंच रहा है, जिनके श्रम और संसाधनों ने इसकी नींव तैयार की है? यह सवाल विकास की गति पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए है कि विकास को और अधिक समावेशी कैसे बनाया जा सकता है।

विकास की इमारत के पीछे खड़ा मेहनतकश भारत

भारत के बड़े-बड़े निर्माण कार्यों की चमक के पीछे एक ऐसा श्रम संसार है, जो अक्सर दिखाई कम देता है। निर्माण स्थल पर काम करने वाला मजदूर, सड़क बनाने वाला श्रमिक, सामान ढोने वाला कर्मचारी, शहरों में सेवाएं देने वाला कामगार और रोज कमाकर परिवार चलाने वाला व्यक्ति—ये सभी आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सरकारी स्तर पर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की पहचान और पंजीकरण के लिए ई-श्रम जैसी पहलें इसी जरूरत को सामने रखती हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठनों की रिपोर्टें भी बताती रही हैं कि अनौपचारिक श्रमिकों के सामने सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल और विभिन्न श्रम अधिकारों तक पहुंच जैसी चुनौतियां रहती हैं। इसलिए भारत के विकास की अगली कहानी में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी सड़कें बनीं या कितने भवन खड़े हुए; यह भी देखना होगा कि उन्हें बनाने वाले श्रमिकों के जीवन में कितनी स्थिरता और सुरक्षा आई।

जो शहर बनाते हैं, उनके सपनों का शहर कैसा हो?

आज देश के महानगर तेजी से फैल रहे हैं। नए आवासीय क्षेत्र बन रहे हैं, औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो रहे हैं और परिवहन की सुविधाएं विस्तार पा रही हैं। इन सबके बीच बड़ी संख्या में ऐसे श्रमिक हैं जो अपने गांवों और छोटे शहरों से रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों का रुख करते हैं। वे पुल बनाते हैं, इमारतें खड़ी करते हैं, सड़कें तैयार करते हैं और उन सेवाओं को चलाते हैं जिनके बिना आधुनिक शहरों की कल्पना मुश्किल है। लेकिन जब रोजगार अनौपचारिक होता है तो आय की स्थिरता, स्वास्थ्य सुरक्षा, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल भी सामने आते हैं। ऐसे में विकास की अगली मंजिल केवल आधुनिक शहर बनाना नहीं, बल्कि ऐसे शहर बनाना भी है जहां उन्हें बनाने वाले श्रमिकों के लिए सम्मानजनक जीवन की जगह हो। विकास की सफलता का एक पैमाना यह भी होना चाहिए कि निर्माण स्थल से घर लौटने वाला मजदूर अपने भविष्य को लेकर कितना आश्वस्त है।

जब विकास के लिए घर और जमीन बदलती है

कई बार बड़े विकास कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता होती है और इसके कारण कुछ परिवारों को अपनी जमीन या घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ता है। सड़क, बांध, औद्योगिक परियोजना, रेलवे या अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण व्यापक सामाजिक लाभ पैदा कर सकता है, लेकिन जिन परिवारों का जीवन सीधे प्रभावित होता है, उनके लिए यह बदलाव बहुत व्यक्तिगत होता है। घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं है। उसके साथ जमीन, रोजगार, पड़ोस, रिश्ते, स्थानीय बाजार, स्कूल, मंदिर-मस्जिद, सामुदायिक संबंध और पीढ़ियों की यादें जुड़ी होती हैं। इसलिए पुनर्वास का अर्थ केवल नया मकान उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और आजीविका को फिर से व्यवस्थित करने में मदद करना भी है। यही कारण है कि विकास परियोजनाओं में पारदर्शी संवाद, उचित मुआवजा, समयबद्ध पुनर्वास और प्रभावित परिवारों की भागीदारी को लगातार मजबूत करना महत्वपूर्ण है।

आदिवासी समाज—जमीन से आगे, पहचान का रिश्ता

भारत के आदिवासी समुदायों के लिए जमीन और जंगल का अर्थ अक्सर केवल संपत्ति नहीं होता। वह उनके जीवन, आजीविका, संस्कृति, परंपरा और पहचान का हिस्सा होता है। देश के कई आदिवासी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं और इसी कारण वहां खनन तथा अन्य विकास परियोजनाओं की संभावनाएं भी रहती हैं। यहां चुनौती विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की है। पंचायतों को अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित करने वाला कानून यानी पेसा और वन अधिकार कानून जैसे प्रावधान आदिवासी समुदायों के अधिकारों और भागीदारी को मान्यता देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं। आगे की जरूरत यह है कि इन प्रावधानों का प्रभाव जमीन पर भी उतना ही मजबूत दिखाई दे, ताकि विकास परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों के बीच भरोसे की नींव और मजबूत हो।

ग्रामसभा की आवाज—विकास में भागीदारी का रास्ता

किसी परियोजना के बारे में स्थानीय समुदाय को जानकारी देना और उनकी चिंताओं को सुनना विकास प्रक्रिया को अधिक मजबूत बना सकता है। विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय लोग अपने क्षेत्र की जमीन, जंगल, जलस्रोत और सामाजिक परिस्थितियों को सबसे बेहतर तरीके से समझते हैं। यदि किसी परियोजना से उनका जीवन प्रभावित होने वाला है तो उनकी आशंकाओं, सुझावों और अधिकारों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाना जरूरी है। इससे केवल समुदाय का विश्वास नहीं बढ़ता, बल्कि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में भी अनावश्यक विवाद कम हो सकते हैं। विकास और जनभागीदारी को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलना अधिक टिकाऊ रास्ता हो सकता है।

पर्यावरण—विकास का साथी, बाधा नहीं

भारत जैसे तेजी से विकसित होते देश के सामने पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। सड़कें, रेलवे, उद्योग, ऊर्जा परियोजनाएं और शहरी विस्तार देश की जरूरत हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए स्वीकृतियों के आंकड़े बताते हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती कितनी बड़ी है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर परियोजना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है या हर भूमि परिवर्तन गलत है। कई परियोजनाएं रोजगार, संपर्क, ऊर्जा और क्षेत्रीय विकास के लिए आवश्यक होती हैं। असली चुनौती यह है कि जहां प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग हो, वहां पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन, क्षतिपूर्ति, पुनर्स्थापन और दीर्घकालीन निगरानी भी उतनी ही गंभीरता से हो।

नर्मदा की कहानी—बड़े सपने और बड़ी जिम्मेदारी

भारत की विकास यात्रा में नर्मदा घाटी और सरदार सरोवर परियोजना एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। परियोजना का उद्देश्य सिंचाई, पेयजल और बिजली जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना था और इसके संभावित लाभ व्यापक रहे हैं। साथ ही, परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका से जुड़े प्रश्नों ने लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया। नर्मदा की कहानी हमें यह समझाती है कि बड़ी परियोजनाएं केवल इंजीनियरिंग की उपलब्धियां नहीं होतीं। उनके पीछे लाखों लोगों की उम्मीदें, हजारों परिवारों की जिंदगी और पर्यावरण से जुड़े अनेक प्रश्न भी होते हैं। इसलिए किसी भी बड़े विकास कार्य की सफलता को उसके आर्थिक लाभ के साथ-साथ पुनर्वास, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक प्रभाव के आधार पर भी देखना अधिक उपयोगी होगा।

आधुनिक भारत का नया चेहरा—हवाई अड्डों और तेज परिवहन की कहानी

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ विमानन और आधुनिक परिवहन का विस्तार भी तेजी से हुआ है। नए हवाई अड्डे छोटे शहरों और उभरते आर्थिक केंद्रों को देश-दुनिया से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट इसी बदलती परिवहन व्यवस्था का हिस्सा हैं। ऐसे प्रोजेक्ट क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, रोजगार, पर्यटन और कारोबार के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं। लेकिन किसी भी बड़े प्रोजेक्ट की वास्तविक सफलता केवल उसके उद्घाटन से तय नहीं होती। उससे जुड़ी सड़क, मेट्रो, सार्वजनिक परिवहन, जल निकासी, पर्यावरण संरक्षण और आसपास रहने वाले लोगों की जरूरतों को भी साथ लेकर चलना पड़ता है। यही वह जगह है जहां विकास की अगली पीढ़ी की परियोजनाओं को और अधिक समन्वित और नागरिक-केंद्रित बनाने का अवसर है।

बड़े प्रोजेक्ट, बड़ी उम्मीदें और बेहतर योजना की जरूरत

आधुनिक बुनियादी ढांचा केवल एक इमारत या सड़क नहीं होता। उसके साथ पूरा एक पारिस्थितिकी तंत्र जुड़ा होता है। हवाई अड्डा बने तो वहां तक पहुंचने के लिए सड़क और सार्वजनिक परिवहन चाहिए। नया औद्योगिक क्षेत्र बने तो पानी, बिजली, आवास, अस्पताल और स्कूलों की भी जरूरत होगी। नया शहर विकसित हो तो जल निकासी और पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्था भी साथ चलनी चाहिए। इसलिए आने वाले वर्षों में भारत के लिए ‘इंटीग्रेटेड प्लानिंग’ यानी समेकित विकास एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता हो सकती है। इससे परियोजनाओं की उपयोगिता बढ़ेगी, नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और भविष्य में होने वाली समस्याओं को पहले ही कम किया जा सकेगा।

विकास की कीमत नहीं, विकास का बेहतर तरीका

विकास और मानवीय हितों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करना शायद सही दृष्टिकोण नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि विकास किस तरह किया जाए ताकि उसके लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें और प्रभावित परिवारों पर पड़ने वाला बोझ कम से कम हो। एक मजबूत भारत को सड़कें भी चाहिए, उद्योग भी चाहिए, ऊर्जा भी चाहिए, शहर भी चाहिए और रोजगार भी चाहिए। साथ ही उसे पर्यावरण की रक्षा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रभावित लोगों के पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था भी चाहिए। जब ये सभी पहलू साथ चलते हैं तो विकास केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं रहता, बल्कि सामाजिक प्रगति में बदल जाता है।

आम आदमी के लिए विकास का असली मतलब

किसी बड़े शहर की चमक आम आदमी के लिए तभी मायने रखती है जब उसका असर उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे। उसके बच्चे को बेहतर स्कूल मिले, अस्पताल में समय पर इलाज मिले, यात्रा आसान हो, रोजगार के अवसर बढ़ें, घर सुरक्षित हो और परिवार का भविष्य पहले से अधिक स्थिर हो—यही विकास का सबसे सीधा अर्थ है। एक किसान के लिए विकास का मतलब बेहतर बाजार और सिंचाई हो सकता है, एक मजदूर के लिए स्थिर रोजगार और सामाजिक सुरक्षा, एक विद्यार्थी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और एक छोटे कारोबारी के लिए आसान परिवहन और डिजिटल सुविधाएं। इसलिए भारत के अगले 20 वर्षों की विकास कहानी जितनी बड़ी परियोजनाओं की होगी, उतनी ही छोटे-छोटे जीवन सुधारों की भी होनी चाहिए।

80 साल बाद—आसमान ऊंचा है, अब आधार और मजबूत करना है

स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में भारत की उपलब्धियां निश्चित रूप से गर्व का विषय हैं। आज देश के पास पहले से बेहतर सड़कें, तेज परिवहन, आधुनिक उद्योग, डिजिटल सेवाएं, वैज्ञानिक क्षमता और वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक भूमिका है। लेकिन किसी भी विकसित और आत्मविश्वासी राष्ट्र की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। हर उपलब्धि अगली जिम्मेदारी लेकर आती है। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि विकास की रफ्तार को बनाए रखते हुए उसे और अधिक समावेशी, टिकाऊ और मानवीय बनाया जाए। जिन हाथों ने सड़कें बनाईं, जिन किसानों ने जमीन दी, जिन समुदायों ने बदलाव का सामना किया और जिन श्रमिकों ने शहरों को आकार दिया—उन सभी को विकास की कहानी का सहभागी बनाना ही अगले चरण की बड़ी प्राथमिकता हो सकती है।

भारत@80—विकास ऐसा, जिसमें कोई पीछे न छूटे

80 साल की स्वतंत्रता के बाद भारत एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहां उसकी महत्वाकांक्षाएं पहले से कहीं बड़ी हैं। दुनिया भारत को तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, बड़े बाजार, युवा आबादी, तकनीकी क्षमता और बढ़ते वैश्विक प्रभाव वाले देश के रूप में देख रही है। यह उपलब्धि गर्व देती है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी आती है। आने वाले वर्षों में भारत को ऐसी विकास व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जहां बड़े प्रोजेक्ट और छोटे सपने एक-दूसरे से अलग न हों; जहां आधुनिक शहर और ग्रामीण भारत एक-दूसरे के पूरक हों; जहां उद्योग और पर्यावरण के बीच संतुलन हो और जहां विकास के कारण प्रभावित होने वाला परिवार भी अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हो। भारत की असली विकास यात्रा तब पूरी मानी जाएगी, जब देश की ऊंची इमारतों के साथ आम भारतीय की जिंदगी भी ऊंची उठे। यही भारत@80 का सपना है—तेज विकास, मजबूत आधार और ऐसा भविष्य जिसमें प्रगति का लाभ हर नागरिक तक पहुंचे। 🇮🇳

__डॉ. निपुनिका शाहिद, सहायक प्रोफेसर, कला, मीडिया एवं डिजाइन संकाय, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के मार्गदर्शन में।

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