नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 11 अगस्त 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम मामले में दो वयस्क हिंदू महिलाओं के इस्लाम धर्म अपनाने के फैसले को उनके व्यक्तिगत अधिकार के दायरे में माना है। अदालत ने दोनों महिलाओं को रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि वयस्क होने के नाते उन्हें अपना धर्म, रहने की जगह और निजी जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने का अधिकार है। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति संदीप जैन ने 6 अगस्त को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। अदालत ने यह भी माना कि महिलाओं के पिता ने उनकी धार्मिक पसंद के कारण उन्हें कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से रोके रखा था। इसी आधार पर पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को मिलकर ₹25 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
35 और 20 साल की बहनों के फैसले को माना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा
मामले में दोनों महिलाएं 35 और 20 वर्ष की हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों बालिग हैं और अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने की कानूनी क्षमता रखती हैं। इसका अर्थ केवल धर्म बदलने के फैसले तक सीमित नहीं है। वयस्क नागरिक के तौर पर व्यक्ति को अपने रहने, व्यक्तिगत संबंधों, जीवनशैली और निजी मामलों से जुड़े निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी संविधान से मिलती है। हाईकोर्ट का फैसला इसी व्यापक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या परिवार किसी वयस्क महिला को उसकी धार्मिक पसंद के कारण अपनी निगरानी या नियंत्रण में रख सकता है। अदालत का रुख साफ रहा कि बालिग व्यक्ति की इच्छा को केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति ने अपनी इच्छा से कोई धर्म अपनाया है और वह अपने फैसले पर कायम है, तो उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य और कानून की जिम्मेदारी है।
धर्म परिवर्तन पर बहस से अलग, केंद्र में है व्यक्ति की आजादी
भारत में धर्म परिवर्तन हमेशा से राजनीतिक और सामाजिक बहस का संवेदनशील विषय रहा है। कई राज्यों में धर्म परिवर्तन को लेकर अलग-अलग कानूनी प्रावधान और प्रक्रियाएं लागू हैं। ऐसे मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ है या किसी दबाव, लालच या धोखे के कारण। लेकिन मौजूदा मामले में हाईकोर्ट के सामने तत्काल सवाल यह था कि दो वयस्क महिलाएं अपनी इच्छा से कहां और किस तरह रहना चाहती हैं तथा अपने धर्म के बारे में क्या निर्णय लेती हैं।
अदालत ने कथित अवैध हिरासत के संदर्भ में उनकी स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी। इसका व्यापक संदेश यह है कि परिवार की पसंद और वयस्क व्यक्ति की अपनी पसंद में टकराव होने पर कानून व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा को नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालांकि, किसी भी धर्म परिवर्तन की वैधता से जुड़े अलग कानूनी सवाल हों तो उनका परीक्षण संबंधित कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है।
₹25 लाख मुआवजा—राज्य की जिम्मेदारी पर भी सवाल
अदालत का ₹25 लाख का मुआवजा देने का आदेश इस मामले को और महत्वपूर्ण बना देता है। यह केवल दो महिलाओं की रिहाई का आदेश नहीं है, बल्कि कथित अवैध हिरासत के लिए जवाबदेही तय करने का भी संदेश है। पिता और राज्य सरकार को संयुक्त रूप से मुआवजा देने के निर्देश से यह संकेत मिलता है कि मौलिक अधिकारों की रक्षा में राज्य की जिम्मेदारी केवल कागजी नहीं हो सकती।
अगर किसी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोका गया है, तो केवल बाद में उसे रिहा कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने मुआवजे के जरिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन को गंभीरता से लिया है। यह फैसला उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है जहां वयस्क व्यक्ति की पसंद और परिवार या समाज की अपेक्षाओं के बीच टकराव पैदा होता है।
फैसले का बड़ा संदेश—आस्था निजी है, स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार
इस फैसले का सबसे बड़ा महत्व यही है कि भारत जैसे विविधता वाले लोकतंत्र में नागरिक की धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन संविधान के मूल सिद्धांतों से तय होना चाहिए। किसी व्यक्ति का धर्म चाहे जो हो, यदि वह बालिग है और अपने निर्णय लेने में सक्षम है, तो उसकी इच्छा का सम्मान कानून के शासन की बुनियादी शर्त है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि क्या परिवार या समाज किसी वयस्क की धार्मिक पसंद को केवल इसलिए नियंत्रित कर सकता है क्योंकि वह पसंद उन्हें स्वीकार्य नहीं है? अदालत का संदेश स्पष्ट है—वयस्क नागरिक को अपने विश्वास और निजी जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है और राज्य का दायित्व उस स्वतंत्रता की रक्षा करना है।




