नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 11 अगस्त 2026
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल अब और गंभीर हो गए हैं। RTI से सामने आए अस्पतालों के रिकॉर्ड में कम से कम 10 लोगों के पैलेट से घायल होने की बात सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता साकेत गोखले द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज ने बताया कि नौ लोग पैलेट इंजरी के साथ अस्पताल पहुंचे, जबकि सफदरजंग अस्पताल के जवाब में एक व्यक्ति के पैलेट से घायल होने की पुष्टि हुई है। अस्पताल सूत्रों ने इन RTI जवाबों की प्रामाणिकता की पुष्टि की है। यह जानकारी उस पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसे लेकर विपक्ष और छात्र संगठन पहले से ही सरकार से जवाब मांग रहे हैं।
RTI के आंकड़ों ने बढ़ाया सरकार पर दबाव
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संख्या केवल राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि दो सरकारी अस्पतालों से प्राप्त RTI जवाबों पर आधारित है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में नौ लोगों के पैलेट से घायल होकर पहुंचने का रिकॉर्ड सामने आया है। सफदरजंग अस्पताल ने भी एक पैलेट-इंजरी केस दर्ज होने की जानकारी दी। ऐसे में अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग किया या नहीं, बल्कि यह भी है कि पैलेट का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में हुआ, किस आदेश के तहत हुआ और इसकी जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
छात्रों का प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर था। प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों ने पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, सरकार और पुलिस का पक्ष भी सामने आना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कानून-व्यवस्था की स्थिति उस समय क्या थी और बल प्रयोग का आधिकारिक आधार क्या था।
संसद से महज कुछ दूरी पर छात्रों पर पैलेट—सबसे बड़ा सवाल
20 जुलाई की घटना ने इसलिए भी गंभीर राजनीतिक बहस पैदा की है क्योंकि प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च कर रहे थे। लोकतंत्र में संसद जनता की आवाज का सर्वोच्च राजनीतिक मंच है। ऐसे में संसद के आसपास किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन बल प्रयोग की सीमा और उसकी आवश्यकता पर सवाल उठना भी उतना ही स्वाभाविक है।
विपक्ष लगातार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से संसद में जवाब देने की मांग कर रहा है। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया गया। सरकार ने अब संसद में छात्रों के आंदोलन पर विस्तृत चर्चा और गृह मंत्री के जवाब की पेशकश की है। सरकार का कहना है कि विपक्ष चर्चा के दौरान सदन को बाधित न करे और गृह मंत्री का जवाब सुने। लेकिन विपक्ष का दबाव इस बात पर है कि कार्रवाई की जिम्मेदारी तय हो और यह स्पष्ट हो कि छात्रों पर पैलेट चलाने का आदेश किसने दिया।
छात्रों के सवाल का जवाब लाठी और पैलेट से नहीं
पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक और लोकतांत्रिक सवाल यही है कि अगर छात्रों की मांगों में कोई कमी थी, अगर उनका प्रदर्शन नियमों का उल्लंघन कर रहा था या अगर संसद की सुरक्षा को खतरा था, तो प्रशासन के पास प्रदर्शन को नियंत्रित करने के कई कानूनी और कम घातक विकल्प मौजूद थे। ऐसे में पैलेट से चोट लगने के अस्पताल रिकॉर्ड सामने आने के बाद सरकार की जवाबदेही और बढ़ जाती है।
सरकार के लिए यह मौका भी है कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर 20 जुलाई की कार्रवाई की पारदर्शी जांच, आदेशों की जांच और घायल छात्रों की स्थिति पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करे। यदि पुलिस कार्रवाई कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई है तो सरकार को तथ्य सामने रखने चाहिए; और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
RTI के बाद अब जवाबदेही से बचना मुश्किल
इस पूरे मामले में RTI से सामने आए अस्पताल रिकॉर्ड ने बहस को एक नया आधार दिया है। अब सवाल केवल प्रदर्शनकारियों के दावों और राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है। कम से कम 10 पैलेट इंजरी के आधिकारिक अस्पताल रिकॉर्ड सामने आने के बाद सरकार और पुलिस से ठोस जवाब की मांग और तेज होगी।
लोकतंत्र में सरकार की ताकत केवल कानून लागू करने में नहीं, बल्कि कानून लागू करने के तरीके पर जनता के सवालों का जवाब देने में भी होती है। छात्रों के हाथों में सवाल हों और जवाब में पैलेट—यह तस्वीर किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए असहज करने वाली है। अब सरकार के सामने चुनौती साफ है: 20 जुलाई की कार्रवाई पर राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि तथ्य, आदेश, जिम्मेदारी और जवाबदेही सामने रखनी होगी।




