अंतरराष्ट्रीय/अमेरिका-रूस/भारत | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ वॉशिंगटन/ मॉस्को | 10 अगस्त 2026
रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। इस सूची में भारत और चीन भी शामिल हैं। सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 और विरोध में 11 वोट पड़े।
अब इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। प्रतिनिधि सभा 31 अगस्त को दोबारा बैठक करेगी। वहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।
भारत और चीन पर सबसे बड़ा असर
प्रस्तावित कानून के तहत रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों को निशाना बनाया जा सकता है। इनमें भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। यदि अमेरिकी प्रशासन इस कानून के तहत भारत पर भारी टैरिफ लगाता है, तो इसका असर केवल भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा लागत, आयात बिल और वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है।
रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति
विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना है, जिससे यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को की आर्थिक क्षमता को कमजोर किया जा सके।
कानून में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ रूसी राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, रूसी वित्तीय संस्थानों तथा ऊर्जा परियोजनाओं पर नए प्रतिबंधों का भी प्रावधान है।
इसके अलावा उन पुराने या नए झंडे वाले तेल टैंकरों को भी निशाना बनाने की व्यवस्था है जिनका इस्तेमाल रूस मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए कर रहा है।
राष्ट्रपति को छूट देने का अधिकार भी
प्रस्तावित कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंधों और टैरिफ से छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। इसके लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस को यह प्रमाणित करना होगा कि ऐसा फैसला अमेरिकी राष्ट्रीय हित में है।
कुछ ऐसे देशों के लिए भी अपवाद का प्रावधान है जो अपनी प्राकृतिक गैस की 15 प्रतिशत से कम जरूरत रूस से पूरी करते हैं और रूसी आयात कम करने के लिए कदम उठा रहे हैं।
यूक्रेन युद्ध को लेकर सख्त संदेश
सीनेट में विधेयक के समर्थन में बोलते हुए डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने यूक्रेन के समर्थन को दोहराया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन के लोग अकेले नहीं हैं और रूस को यूक्रेन पर कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
विधेयक को रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस में लंबे समय से चल रही द्विदलीय कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।
ईरान पर भी बढ़ेगा अमेरिकी दबाव
रूस से जुड़े प्रतिबंधों के अलावा विधेयक में 1996 के Iran Sanctions Act की अवधि 2031 तक बढ़ाने का प्रावधान भी शामिल है। यह कानून ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध का आधार बनता है।
यानी प्रस्तावित कानून का दायरा केवल रूस तक सीमित नहीं है। इसमें रूस और ईरान दोनों पर अमेरिकी आर्थिक दबाव को बनाए रखने और बढ़ाने की व्यवस्था की गई है।
भारत के लिए आगे की चुनौती
अमेरिकी सीनेट की मंजूरी के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतिनिधि सभा इस विधेयक को किस रूप में स्वीकार करती है और राष्ट्रपति ट्रंप इसका इस्तेमाल किस हद तक करते हैं।
भारत के सामने चुनौती यह है कि उसे एक तरफ अपनी ऊर्जा जरूरतों और किफायती तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करनी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी संतुलित रखना है।
यदि 100 प्रतिशत टैरिफ का विकल्प वास्तव में लागू होता है, तो इसका असर भारत के लिए महज कूटनीतिक विवाद नहीं रहेगा। यह व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक बाजार—तीनों के लिए बड़ा आर्थिक सवाल बन सकता है।




