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बच्चों के सोशल मीडिया पर लगाम की तैयारी, BJP सांसद का निजी विधेयक

13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट पर रोक का प्रस्ताव; माता-पिता की सत्यापित मंजूरी और कंपनियों के लिए पैरेंटल कंट्रोल अनिवार्य करने की सिफारिश

राष्ट्रीय/संसद/टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | 10 अगस्त 2026

बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर संसद में बहस तेज होने के बीच भाजपा सांसद बैजयंत पांडा ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर उम्र आधारित नियंत्रण का प्रस्ताव रखा है। पांडा की ओर से सूचीबद्ध ‘Safeguarding Healthy Internet Environments for Little Digital-Natives (SHIELD) Bill, 2025’ में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट बनाने पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है। हालांकि, माता-पिता की सत्यापित सहमति होने पर ऐसे अकाउंट की अनुमति देने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।

13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्या बदलेगा?

प्रस्तावित निजी सदस्य विधेयक के मुताबिक 13 वर्ष से कम उम्र का कोई बच्चा सत्यापित अभिभावकीय अनुमति के बिना सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर अकाउंट नहीं बना सकेगा। इसका उद्देश्य बच्चों को ऐसे डिजिटल वातावरण से बचाना है जहां कम उम्र में उन्हें हिंसक, अश्लील, भ्रामक या मानसिक रूप से प्रभावित करने वाली सामग्री का सामना करना पड़ सकता है।

विधेयक में डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालकों के लिए अभिभावकों को पैरेंटल कंट्रोल डैशबोर्ड उपलब्ध कराने का भी प्रस्ताव है। इसके जरिए माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नियंत्रण और निगरानी से जुड़े विकल्पों का इस्तेमाल कर सकेंगे।

सोशल मीडिया कंपनियों की भी बढ़ेगी जवाबदेही

विधेयक केवल बच्चों की उम्र पर रोक लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और इंटरमीडियरी के लिए बच्चों की सुरक्षा से जुड़े अतिरिक्त दायित्व प्रस्तावित किए गए हैं। इसके तहत कंपनियों को सालाना चाइल्ड सेफ्टी और रिस्क असेसमेंट करना होगा।

इस आकलन में यह देखा जाना प्रस्तावित है कि प्लेटफॉर्म के कंटेंट एल्गोरिद्म और यूजर इंटरैक्शन से बच्चों को किस तरह के जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे जोखिमों की पहचान कर रिपोर्ट सरकार को देने का भी प्रस्ताव है। इसका सीधा मतलब है कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों को केवल कंटेंट उपलब्ध कराने वाली कंपनियों के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाओं के रूप में भी देखा जाएगा।

विधेयक अभी कानून नहीं

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह निजी सदस्य विधेयक है और अभी कानून नहीं बना है। इसे 7 अगस्त को लोकसभा में सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन दोनों सदनों की कार्यवाही समय से पहले स्थगित होने के कारण इसे पेश नहीं किया जा सका। इसलिए प्रस्तावित प्रावधानों को फिलहाल लागू नियम नहीं माना जा सकता।

फिर भी इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की उम्र सीमा और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया के कई देशों की तरह यहां भी बहस तेज हो रही है।

बच्चों की सुरक्षा बनाम डिजिटल आजादी की बहस

बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना जरूरी है, लेकिन उम्र आधारित प्रतिबंधों के साथ निजता और डिजिटल स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भी उठेंगे। किसी बच्चे की उम्र सत्यापित करने के लिए कंपनियां कौन-सा डेटा लेंगी और उस डेटा को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा, यह बड़ा सवाल होगा। यदि माता-पिता की अनुमति अनिवार्य होती है तो उसकी सत्यापन प्रक्रिया कितनी सुरक्षित और व्यावहारिक होगी, यह भी तय करना होगा।

इसीलिए बच्चों की सुरक्षा के नाम पर ऐसा सिस्टम नहीं बनाया जा सकता जो स्वयं बच्चों और परिवारों की निजी जानकारी के लिए नया जोखिम बन जाए।

एल्गोरिद्म पर भी नजर जरूरी

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का सवाल केवल अकाउंट बनाने की उम्र तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किस तरह की सामग्री बच्चों को बार-बार दिखाते हैं, उनकी स्क्रीन पर क्या प्राथमिकता से पहुंचता है और एल्गोरिद्म उनकी आदतों को किस तरह प्रभावित करते हैं—ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

SHIELD Bill में प्रस्तावित वार्षिक रिस्क असेसमेंट इसी दिशा में एक कदम हो सकता है। लेकिन इसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियों से केवल रिपोर्ट मांगी जाती है या जोखिम पाए जाने पर उन पर ठोस कार्रवाई की व्यवस्था भी होती है।

संसद में बहस से निकलेगा रास्ता

बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखना शायद लंबे समय तक व्यावहारिक समाधान न हो, क्योंकि इंटरनेट अब शिक्षा, मनोरंजन, संवाद और जानकारी का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। चुनौती यह है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से काटे बिना उन्हें उसके खतरों से कैसे सुरक्षित रखा जाए।

SHIELD Bill ने बहस का दरवाजा जरूर खोल दिया है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया की अनुमति मिले या नहीं; असली सवाल यह है कि भारत बच्चों के लिए ऐसा डिजिटल माहौल कैसे बनाए, जहां सुरक्षा, निजता, अभिभावकीय नियंत्रण और इंटरनेट तक उचित पहुंच—चारों के बीच संतुलन कायम हो।

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